क्या है El Niño? कैसे बढ़ाता है भारत में सूखा, गर्मी और महंगाई; 1950 से अब तक 16 बार दिखा असर
दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक एक बार फिर El Niño को लेकर चेतावनी दे रहे हैं। कहा जा रहा है कि आने वाले महीनों में इसका असर भारत के मौसम, मॉनसून, खेती और अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है। बढ़ती गर्मी, कम बारिश, सूखा और फसलों को नुकसान जैसी स्थितियां अल नीनो के दौरान आम मानी जाती हैं।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहां आज भी बड़ी आबादी खेती और मानसून पर निर्भर है, वहां अल नीनो किसी बड़े संकट से कम नहीं माना जाता। यही वजह है कि जब भी प्रशांत महासागर में इसकी गतिविधियां बढ़ती हैं, तो भारत में चिंता बढ़ जाती है।
आखिर क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म हो जाने पर बनता है।
सामान्य परिस्थितियों में पूर्वी प्रशांत महासागर की तुलना में पश्चिमी प्रशांत में गर्म पानी अधिक रहता है, जिससे हवा और बारिश का एक संतुलित चक्र बना रहता है। लेकिन जब समुद्र की सतह असामान्य रूप से गर्म होने लगती है, तो यह संतुलन बिगड़ जाता है। इसी स्थिति को एल नीनो कहा जाता है।
इसका सीधा असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है, खासकर भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर।
भारत में क्यों कमजोर पड़ जाता है मॉनसून?
जब अल नीनो सक्रिय होता है तो भारत में मॉनसून की हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इसका असर बारिश पर पड़ता है और देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार अल नीनो के दौरान भारत में औसतन 10 से 20 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज की जा सकती है। कई बार यह कमी और भी ज्यादा गंभीर हो जाती है, जिससे सूखे जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।
कम बारिश का सबसे ज्यादा असर खेती और जल स्रोतों पर पड़ता है। इससे खेत सूखने लगते हैं, जलाशयों में पानी कम हो जाता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ जाता है।
अल नीना क्या है और यह कैसे अलग है?
La Niña अल नीनो का ठीक उल्टा माना जाता है। इसमें प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है।
अल नीना के दौरान भारत में आमतौर पर मॉनसून मजबूत होता है और ज्यादा बारिश देखने को मिलती है। हालांकि कई बार अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी स्थितियां भी पैदा हो सकती हैं।
1950 से अब तक 16 बार आया अल नीनो
मौसम रिकॉर्ड के अनुसार 1950 से 2025 तक भारत में लगभग 16 बार अल नीनो का प्रभाव देखा गया है। इनमें से कई बार इसका असर बेहद गंभीर रहा।
विशेषज्ञों के मुताबिक 5 से 6 बार अल नीनो “स्ट्रॉन्ग” या “सुपर एल नीनो” की श्रेणी में रहा, जिसने देश में सूखा, फसल बर्बादी और महंगाई जैसी समस्याएं पैदा कीं।
1972 का एल नीनो: जब देश ने झेला बड़ा सूखा
1972 का एल नीनो भारत के इतिहास में सबसे गंभीर घटनाओं में गिना जाता है। उस समय मानसून में लगभग 24 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई थी।
देश के कई हिस्सों में भीषण सूखा पड़ा। खाद्यान्न उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक गिरावट आई। चावल, बाजरा और गन्ने जैसी फसलें बुरी तरह प्रभावित हुईं।
इसका असर अगले कई महीनों तक बाजार में दिखाई दिया। खाद्यान्न की कीमतें बढ़ीं और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक संकट गहरा गया।
1987 और 2002: जब खेती और अर्थव्यवस्था दोनों हिल गए
1987-88 और 2002 के अल नीनो ने भी भारत को बड़ा झटका दिया।
2002 में मानसून लगभग 19 प्रतिशत कमजोर रहा। इसका असर इतना बड़ा था कि खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 38 मिलियन टन की गिरावट दर्ज की गई। कृषि जीडीपी में करीब 7 प्रतिशत की कमी आई।
विशेषज्ञों के अनुसार यह नुकसान अरबों डॉलर तक पहुंच गया था। कई राज्यों में किसान भारी आर्थिक संकट में आ गए।
1997-98 का सुपर एल नीनो और भारत की किस्मत
1997-98 का एल नीनो दुनिया के सबसे शक्तिशाली एल नीनो में से एक माना जाता है। हालांकि उस समय भारत कुछ हद तक बच गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि उस दौरान Indian Ocean Dipole यानी इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) सकारात्मक स्थिति में था, जिसने मॉनसून को सहारा दिया।
इसी वजह से भारत में बारिश सामान्य के करीब रही, हालांकि गर्मी और कुछ क्षेत्रों में अनियमित बारिश जरूर देखने को मिली।
किन फसलों पर पड़ता है सबसे ज्यादा असर?
अल नीनो का सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों पर पड़ता है। इनमें शामिल हैं:
- चावल
- बाजरा और ज्वार
- गन्ना
- कपास
- मूंगफली
कम बारिश और मिट्टी में नमी घटने से इन फसलों की पैदावार प्रभावित होती है। कई बार उत्पादन 10 से 30 प्रतिशत तक घट सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार जब फसलें खराब होती हैं तो कुछ महीनों बाद बाजार में खाद्यान्न और कृषि उत्पादों की कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं।
महंगाई और बिजली संकट भी बढ़ाता है अल नीनो
अल नीनो का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता। गर्मी बढ़ने से बिजली की मांग तेजी से बढ़ती है। एयर कंडीशनर, कूलर और सिंचाई उपकरणों के ज्यादा इस्तेमाल से बिजली व्यवस्था पर दबाव पड़ता है।
इसके अलावा खाद्यान्न उत्पादन घटने से महंगाई बढ़ती है, जिसका असर गरीब और मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा पड़ता है।
छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित
भारत में आज भी बड़ी मात्रा में खेती बारिश पर निर्भर है। ऐसे में अल नीनो का सबसे ज्यादा असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है।
कम बारिश की वजह से उनकी फसलें खराब होती हैं, आय घटती है और कई बार कर्ज का बोझ बढ़ जाता है। पशुधन, भूजल और ग्रामीण रोजगार पर भी इसका असर पड़ता है।
क्या भारत अब पहले से ज्यादा तैयार है?
विशेषज्ञों का कहना है कि पहले की तुलना में भारत अब काफी हद तक तैयार है। बेहतर मौसम पूर्वानुमान, सूखा-रोधी बीज, फसल बीमा और सिंचाई सुविधाओं ने जोखिम कम करने में मदद की है।
हालांकि जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो की तीव्रता और असर दोनों बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
2026 में क्यों बढ़ी चिंता?
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार समुद्री तापमान में बदलाव और वैश्विक जलवायु पैटर्न को देखते हुए अल नीनो की स्थिति बन सकती है।
अगर ऐसा होता है तो भारत में गर्मी, हीटवेव और कमजोर मॉनसून जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं। कृषि विशेषज्ञ पहले से ही किसानों को जल संरक्षण और वैकल्पिक फसल रणनीति अपनाने की सलाह दे रहे हैं।

