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दीपावली- तिथि और शुभ मुहूर्त

Images 1 |दिवाली हिन्दू धर्म का मुख्य पर्व है। रोशनी का पर्व दिवाली कार्तिक अमावस्या के दिन मनाया जाता है। दिवाली को दीपावली  के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि दीपों से सजी इस रात में लक्ष्मीजी भ्रमण के लिए निकलती हैं और अपने भक्तों को खुशियां बांटती हैं।

घर में धनतेरस से लेकर भाईदूज तक शुद्ध देसी घी का दीपक सुबह-शाम घर के पूजा स्थल एवं तुलसीजी के पास अवश्य जलाना चाहिए। दीपावली की रात को पूजन के उपरांत रातभर लक्ष्मी-गणेश के आगे घी, तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाए रखना चाहिए।

इस साल, दिवाली 14 नवंबर, 2020 (शनिवार) को पड़ेगी. दिवाली का उत्सव 13 नवंबर से शुरू होता है, इस दिन धनतेरस (शुक्रवार) होगा. 15 नवंबर (रविवार) को गोवर्धन पूजा और 16 नवंबर (सोमवार) को भैया दूज भी मनाया जाता है.

इस साल दिवाली 2020 का पर्व 14 नवंबर को मनाया जाएगा. शास्त्रों के अनुसार दीवाली कार्तिक मास की अमावस्या तिथि महानिशीथ काल में मनाया जाता है। जानें इन सभी त्योहारों के शुभ मुहूर्त। जिससे आप आसानी से कर सके पूजन संबंधी हर काम समय से।

दिवाली पूजा का समय | प्रमुख भारतीय शहरों में लक्ष्मी पूजा का समय

दीपावली के दिन देवी लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है. कई लोग इस शुभ दिन पर धन की देवी से प्रार्थना करने के लिए उपवास भी रखते हैं.
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त – 05:28 बजे से 07:24 बजे (नई दिल्ली, भारत में)
अवधि – 01 घंटा 56 मिनट
प्रदोष काल – प्रातः 05:23 से प्रातः 08:07 तक
वृषभ काल – शाम 05:28 से प्रातः 07:24 तक
अमावस्या तिथि शुरू होती है – 02:17 दोपहर 14 नवंबर, 2020 को
अमावस्या तिथि समाप्त – 10:36 शाम 15 नवंबर, 2020 को

अन्य शहरों में लक्ष्मी पूजा मुहूर्त

शाम 05:58 से शाम 07:59 – पुणे
शाम 05:41 से शाम 07:43 – चेन्नई
शाम 05:37 से शाम 07:33 – जयपुर
शाम 05:42 से शाम 07:42 – हैदराबाद
शाम 05:29 से शाम 07:25 – गुड़गांव
शाम 05:26 से शाम 07:21 – चंडीगढ़
शाम 04:54 से शाम 06:52 – कोलकाता
शाम 06:01 से शाम 08:01 – मुंबई
शाम 05:52 से शाम 07:54 – बेंगलुरु
शाम 05:57 से शाम 07:55 – अहमदाबाद
शाम 05:28 से शाम 07:23 – नोएडा
(स्रोत: द्रिकपंचाग डॉटकॉम)

 

कहा जाता है कि इस दिन दीप जलाकर रोशनी करने से मां लक्ष्मी घर में आती है. दिवाली के दिन खुशहाली के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है. पूजन शुरू करने से पहले चौकी को धोकर उस पर रंगोली बनाएं और चौकी के चारों तरफ चार दीपक जलाएं.

जिस जगह पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा को स्‍थापित करने जा रहे हैं, वहां पर थोड़ा सा चावल रखकर लक्ष्मी की प्रतिमा को रखें.  लक्ष्मी को प्रसन्‍न करने के लिए उनके बाईं ओर भगवान विष्‍णु की प्रतिमा को स्‍थापित करें.

इनकी पूजा करने से घर की निगेटिव एनर्जी बाहर जाती है और सुख समृद्धि घर में आती है.

सबसे पहले गजानंद की पूजा करें और इसके बाद स्‍थापित सभी देवी-देवताओं का पूजन करें. मां लक्ष्मी का ध्यान करें. मां लक्ष्मी को इस दिन लाल वस्‍त्र जरूर पहनाएं.

 यह माना जाता है कि जब भगवान राम अयोध्या पहुंचे थे तब पूरे शहर को हजारों तेल के दीपकों (दीया) को जला कर उनका स्वागत किया गया था। पूरी अयोध्या को फूलों और सुंदर रंगोली से सजाया गया था।

तब से, दिवाली को रोशनी का त्योहार कहा जाता है। भगवान राम का अपने घरों में स्वागत करने के लिए लोग तेल के लैंप के साथ सजावट करते हैं यही कारण है कि इस त्योहार को ‘दीपावली’ भी कहा जाता है।

तेल के दीयों की परंपरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। लोग अपने घरों के प्रवेश द्वार पर सुंदर रंगोली और पादुका (पादलेख) चित्रण करके देवी लक्ष्मी का स्वागत करते हैं। दिवाली के त्योहार को मनाने के लिए लोग दोस्तों, रिश्तेदार और पड़ोसियों को मिठाई और फल बांटते है।

दिवाली का जश्न पांच दिनों की अवधि में फैला हुआ है जिसमे प्रत्येक दिन का अपना महत्व है और जिसमे परंपरागत अनुष्ठानों का पालन किया जाता है। जश्न ‘धनतेरस’ के साथ आरम्भ होता है

यह वह शुभ दिन है जिसमे पर लोग बर्तन, चांदी के बर्तन या सोना खरीदते हैं। यह माना जाता है कि नए “धन” या कीमती वास्तु की खरीदार शुभ हैं। इसके बाद छोटी दिवाली आती है जिसमें बड़ी दिवाली की तैयारी होती है। लोग अपने घरों को सजाने की शुरुआत करते हैं, और एक दुसरे से मिलते-जुलते है।

अगले दिन बड़ी दीवाली मनाई जाती है। इस दिन, लोग लक्ष्मी पूजा करते हैं, मिठाई और उपहार के साथ एक दूसरे के घर जाते हैं, पटाखे जलाते हैं और अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताते हैं।

दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है और अंततः पांच दिवसीय उत्सव भाई दूज के साथ समाप्त होता है जहां बहने अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं और भाई बहन एक-दूसरे की भलाई के लिए प्रार्थना करते हैं।

हमेशा ध्यान रखें कि लक्ष्मी गणेश कभी भी एक साथ जुड़े हुए नहीं खरीदने चाहिए। पूजाघर में रखने के लिए लक्ष्मी और गणेश की ऐसी मूर्ति लेने चाहिए, जिनमें दोनों विग्रह अलग-अलग हों।

गणेश की मूर्ति में उनकी सूंड बाएं हाथ की तरफ मुड़ी होनी चाहिए। दाईं तरफ मुड़ी हुई सूंड शुभ नहीं होती है। सूंड में दो घुमाव भी ना हों मूर्ति खरीदते समय हमेशा गणेश जी के हाथ में मोदक वाली मूर्ति खरीदें। ऐसी मूर्ति सुख-समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। गणेश जी की मूर्ति में उनके वाहन मूषक की उपस्थिति अनिवार्य है।

सोने, चांदी, पीतल या अष्टधातु की मूर्ति खरीदने के साथ क्रिस्टल के लक्ष्मी-गणेश की पूजा करना शुभ होता है।लक्ष्मी मां की ऐसी मूर्ति न खरीदें जिसमें मां लक्ष्मी उल्लू पर विराजमान हों।

ऐसी मूर्ति को काली लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। लक्ष्मी माता की ऐसी मूर्ति ऐसी लेनी चाहिए जिसमें वो कमल पर विराजमान हों। उनका हाथ वरमुद्रा में हो और धन की वर्षा करता हो।

कभी भी लक्ष्मी मां की ऐसी मूर्ति ना लेकर आएं जिसमें वो खड़ी हों। ऐसी मूर्ति लक्ष्मी मां के जाने की मुद्रा में तैयार माना जाता है।

छोटी दिवाली

दंतकथाओं के अनुसार नरकासुर नाम का एक राक्षस था जो प्रागज्योतिषपुर राज्य का राजा था। उसने इंद्र को युद्ध में परास्त करके माँ देवी की कान की बालियों को छीन लिया था। येही नहीं उसने देवताओं और रिशिओं की 16 हज़ार बेटियों का अपहरण करके उनको अपने इस्त्रिग्रह में बंदी बना रखा था। इस्त्रियों के प्रति नरकासुर के द्वेष को देख कर सत्यभामा ने कृष्णा से यह निवेदन किया की उन्हें नरकासुर का वध करने का अवसर प्रदान किया जाये। यह भी मान्यता है की नरकासुर को यह श्राप था की उसकी मृत्यु एक इस्त्री के हाथ ही होगी। सत्यभामा कृष्ण द्वारा चलाय जा रहे रथ में बेठ कर युद्ध करने के लिए गयी। उस युद्ध में सत्यभामा ने नरकासुर को परास्त करके उसका वध किया और सभी कन्याओं को छुडवा लिया।इसी दिन को नरका चतुर्दशी कहते है। छोटी दिवाली भी इसी दिन मनाई जाती है। इसका कारण यह है ही नरकासुर की माता भूदेवी ने यीह घोषणा की थी की उसके पुत्र की मृत्यु के दिन को मातम के तौर पर नहीं बल्कि त्यौहार के तौर पर याद रखा जाये।​

दीपावली उत्सव
अपने प्रिय राजा श्री राम के वनवास समाप्त होने की खुशी में अयोध्यावासियों ने कार्तिक अमावस्या की रात्रि में घी के दिए जलाकर उत्सव मनाया था। तभी से हर वर्ष दीपावली का पर्व मनाया जाता है। इस त्यौहार का वर्णन विष्णु पुराण के साथ-साथ अन्य कई पुराणों में किया गया है।

 लक्ष्मी पूजा 
अधिकांश घरों में दीपावली के दिन लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा  की जाती है। हिन्दू मान्यतानुसार अमावस्या की रात्रि में लक्ष्मी जी धरती पर भ्रमण करती हैं और लोगों को वैभव का आशीष देती है। दीपावली के दिन गणेश जी की पूजा का यूं तो कोई उल्लेख नहीं परंतु उनकी पूजा के बिना हर पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए लक्ष्मी जी के साथ विघ्नहर्ता श्री गणेश जी की भी पूजा की जाती है।

पूजा विधि 

दिवाली पूजन में सबसे पहले श्री गणेश जी का ध्यान करें। इसके बाद गणपति को स्नान कराएं और नए वस्त्र और फूल अर्पित करें। इसके बाद देवी लक्ष्मी का पूजन शुरू करें। मां लक्ष्मी की प्रतिमा को पूजा स्थान पर रखें। मूर्ति में मां लक्ष्मी का आवाहन करें। हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करें कि वे आपके घर आएं। अब लक्ष्मी जी को स्नान कराएं।

स्नान पहले जल फिर पंचामृत और फिर वापिस जल से स्नान कराएं। उन्हें वस्त्र अर्पित करें। वस्त्रों के बाद आभूषण और माला पहनाएं। इत्र अर्पित कर कुमकुम का तिलक लगाएं।

अब धूप व दीप जलाएं और माता के पैरों में गुलाब के फूल अर्पित करें। इसके बाद बेल पत्थर और उसके पत्ते भी उनके पैरों के पास रखें। 11 या 21 चावल अर्पित कर आरती करें। आरती के बाद परिक्रमा करें। अब उन्हें भोग लगाएं।

 

 

दीपदान 
दीपावली के दिन दीपदान का विशेष महत्त्व होता है। नारदपुराण के अनुसार इस दिन मंदिर, घर, नदी, बगीचा, वृक्ष, गौशाला तथा बाजार में दीपदान देना शुभ माना जाता है। 

मान्यता है कि इस दिन यदि कोई श्रद्धापूर्वक मां लक्ष्मी की पूजा करता है तो, उसके घर में कभी भी दरिद्रता का वास नहीं होता। इस दिन गायों के सींग आदि को रंगकर उन्हें घास और अन्न देकर प्रदक्षिणा की जाती है।

 दीपावली पर्व भारतीय सभ्यता की एक अनोखी छठा को पेश करता है। आज अवश्य पटाखों की शोर में माता लक्ष्मी की आरती का शोर कम हो गया है लेकिन इसके पीछे की मूल भावना आज भी बनी हुई है।

लक्ष्मी व गणेश पूजन 

माता लक्ष्मीजी के पूजन की सामग्री अपने सामर्थ्य के अनुसार होना चाहिए। इसमें लक्ष्मीजी को कुछ वस्तुएँ विशेष प्रिय हैं। उनका उपयोग करने से वे शीघ्र प्रसन्न होती हैं।

इनका उपयोग अवश्य करना चाहिए। वस्त्र में इनका प्रिय वस्त्र लाल-गुलाबी या पीले रंग का रेशमी वस्त्र है।माताजी को पुष्प में कमल व गुलाब प्रिय है। फल में श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े प्रिय हैं। सुगंध में केवड़ा, गुलाब, चंदन के इत्र का प्रयोग इनकी पूजा में अवश्य करें। अनाज में चावल तथा मिठाई में घर में बनी शुद्धता पूर्ण केसर की मिठाई या हलवा, शिरा का नैवेद्य उपयुक्त है। 

प्रकाश के लिए गाय का घी, मूंगफली या तिल्ली का तेल इनको शीघ्र प्रसन्न करता है। अन्य सामग्री में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर, भोजपत्र का पूजन में उपयोग करना चाहिए।चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजनकर्ता मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है।

दो बड़े दीपक रखें। एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अतिरिक्त एक दीपक गणेशजी के पास रखें।मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।

इसके बीच में सुपारी रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचोंबीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक। इन थालियों के सामने यजमान बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे।

आप हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा सा जल ले लें और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दःकूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥
अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-

                       ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः| अब आचमन करें

 

पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-ॐ केशवाय नमःऔर फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-ॐ नारायणाय नमःफिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-ॐ वासुदेवाय नमः| फिर ॐ हृषिकेशाय नमः कहते हुए हाथों को खोलें और अंगूठे के मूल से होंठों को पोंछकर हाथों को धो लें।

पुनः तिलक लगाने के बाद प्राणायाम व अंग न्यास आदि करें। आचमन करने से विद्या तत्व, आत्म तत्व और बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है तथा तिलक व अंग न्यास से मनुष्य पूजा के लिए पवित्र हो जाता है।

आचमन आदि के बाद आंखें बंद करके मन को स्थिर कीजिए और तीन बार गहरी सांस लीजिए। यानी प्राणायाम कीजिए क्योंकि भगवान के साकार रूप का ध्यान करने के लिए यह आवश्यक है

फिर पूजा के प्रारंभ में स्वस्तिवाचन किया जाता है। उसके लिए हाथ में पुष्प, अक्षत और थोड़ा जल लेकर स्वतिनः इंद्र वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए परम पिता परमात्मा को प्रणाम किया जाता है। फिर पूजा का संकल्प किया जाता है। संकल्प हर एक पूजा में प्रधान होता है।

संकल्प – आप हाथ में अक्षत लें, पुष्प और जल ले लीजिए। कुछ द्रव्य भी ले लीजिए। द्रव्य का अर्थ है कुछ धन। ये सब हाथ में लेकर संकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं

जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों। सबसे पहले गणेशजी व गौरी का पूजन कीजिए। उसके बाद वरुण पूजा यानी कलश पूजन करनी चाहिए।हाथ में थोड़ा सा जल ले लीजिए

आह्वान व पूजन मंत्र बोलिए और पूजा सामग्री चढ़ाइए। फिर नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में अक्षत और पुष्प ले लीजिए और नवग्रह स्तोत्र बोलिए। इसके बाद भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है।

हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प ले लीजिए। सोलह माताओं को नमस्कार कर लीजिए और पूजा सामग्री चढ़ा दीजिए।

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