Bareilly DIG विवाद: 3.22 लाख की बकाया राशि नहीं चुकाने पर हाईकोर्ट सख्त, डीएम से मांगा जवाब
Bareilly में डीआईजी (पुलिस उपमहानिरीक्षक) की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। विमला देवी बनाम पुलिस उप महानिरीक्षक, बरेली मामले में मोटर दुर्घटना दावा अभिकरण (MACT) द्वारा पारित आदेश के तहत ₹3.22 लाख की मुआवजा राशि सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करनी थी, लेकिन अब तक यह राशि जमा नहीं की गई।
इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती देना पुलिस विभाग को महंगा पड़ गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस देरी को गंभीरता से लेते हुए बरेली के जिलाधिकारी (DM) अविनाश सिंह से 5 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया है।
मुआवजा नहीं, न ही स्थगन आदेश, पुलिस की चुप्पी बनी परेशानी का सबब
बरेली के एसडीएम सदर प्रमोद कुमार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के बाद पुलिस विभाग के खिलाफ वसूली प्रक्रिया शुरू की जा चुकी थी। आरसी (रिकवरी सर्टिफिकेट) भी जारी हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद न तो मुआवजे की राशि जमा की गई और न ही किसी प्रकार का स्थगन आदेश (Stay Order) न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
इस स्थिति में तहसील प्रशासन को चल संपत्ति की कुर्की का आदेश जारी करना पड़ा है। बार-बार पत्राचार के बावजूद पुलिस विभाग की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया।
हाईकोर्ट का पत्र मिलते ही प्रशासन में हड़कंप: वसूली के निर्देश जारी
हाईकोर्ट का पत्र 21 जुलाई को डीएम कार्यालय को प्राप्त हुआ, जिसके बाद डीएम अविनाश सिंह ने उसी दिन गंभीरता से मामले का संज्ञान लिया और एसडीएम सदर को निर्देशित किया कि पुलिस विभाग से संबंधित ₹3.22 लाख की राशि को सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ तत्काल वसूला जाए।
एसडीएम प्रमोद कुमार ने तुरंत एसएसपी/डीआईजी बरेली को पत्र लिखते हुए पूरी स्थिति से अवगत कराया और स्पष्ट किया कि धनराशि शीघ्र जमा कराई जाए ताकि न्यायालय के समक्ष समुचित कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत की जा सके।
कुर्की का आदेश: DIG की प्रतिष्ठा पर सीधा असर
मामले की गंभीरता इस बात से भी स्पष्ट है कि अब प्रशासन चल संपत्ति की कुर्की की प्रक्रिया की ओर बढ़ चुका है। आमतौर पर ऐसे आदेश उन मामलों में दिए जाते हैं, जिनमें आरोपी पक्ष न तो न्यायालय का सम्मान करता है और न ही प्रशासनिक निर्देशों की अनुपालना करता है।
DIG जैसे उच्च अधिकारी के खिलाफ इस प्रकार की कार्यवाही होना प्रशासनिक प्रतिष्ठा और कानून व्यवस्था की छवि पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पुलिस विभाग कब तक यह राशि जमा कर अदालत की अवमानना से बच पाता है।
क्या है पूरा मामला? जानिए पृष्ठभूमि
यह मामला विमला देवी बनाम पुलिस उपमहानिरीक्षक, बरेली से जुड़ा है। विमला देवी द्वारा मोटर दुर्घटना में क्षतिपूर्ति के लिए दावा किया गया था, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने ₹3.22 लाख मुआवजा राशि का आदेश पारित किया था।
यह आदेश पुलिस विभाग के खिलाफ था, जिसमें यह तय हुआ कि उक्त राशि का भुगतान DIG कार्यालय द्वारा किया जाएगा। लेकिन पुलिस विभाग ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी और भुगतान रोक दिया।
अब हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि जब तक स्थगन आदेश नहीं है, आदेश को निष्पादित करना होगा। इसी के तहत अब डीएम से व्यक्तिगत स्पष्टीकरण मांगा गया है।
डीएम और एसडीएम की सक्रियता: पुलिस पर बढ़ा दबाव
हाईकोर्ट के आदेश और प्रशासनिक सख्ती के बाद अब पुलिस विभाग पर भारी दबाव है कि वह इस लंबित राशि को जल्द से जल्द अदा करे। प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि अब भी राशि जमा नहीं की गई, तो न केवल कुर्की की प्रक्रिया पूरी की जाएगी बल्कि इसकी सूचना हाईकोर्ट को भी दी जाएगी, जिससे गंभीर कानूनी परिणाम सामने आ सकते हैं।
क्या अब DIG उठाएंगे जिम्मेदारी? या फिर बढ़ेगी मुश्किलें?
बरेली जैसे संवेदनशील जिले में DIG स्तर के अधिकारी के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई पुलिस विभाग की छवि पर गहरी चोट है। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अब DIG खुद सामने आकर इस विवाद को सुलझाएंगे या फिर प्रशासन को मजबूरन आगे की सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी?
हाईकोर्ट की नाराज़गी और डीएम को अदालत में तलब किया जाना कोई साधारण घटना नहीं है। यह स्पष्ट संकेत है कि न्यायपालिका अब किसी भी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करने वाली।
कानूनी विश्लेषण: प्रशासन बनाम पुलिस, कौन ज़िम्मेदार?
इस मामले ने प्रशासन और पुलिस के बीच कर्तव्यों की सीमा और जवाबदेही को लेकर भी एक नई बहस छेड़ दी है। जब न्यायालय आदेश पारित करता है और उच्च अधिकारी उसकी अनुपालना नहीं करते, तो संपूर्ण शासन-प्रशासन की साख पर असर पड़ता है।
इस केस में DIG की निष्क्रियता या लापरवाही ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि हाईकोर्ट की निगाहों में संदेह भी पैदा कर दिया है।

