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US-India Tariff Tensions: रूस के तेल पर घिरी राजनीति, स्कॉट बेसेंट का यूरोप पर आरोप और भारत को राहत के संकेत

US-India Tariff Tensions:अब केवल व्यापारिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीति का बड़ा केंद्र बन गया है। अमेरिका, भारत, यूरोप और रूस—चारों के हित इस तेल-राजनीति के जाल में उलझे हुए दिखाई दे रहे हैं। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के ताजा बयान ने इस पूरे समीकरण में एक नया मोड़ ला दिया है, जहां एक ओर भारत को टैरिफ में राहत के संकेत मिले हैं, वहीं दूसरी ओर यूरोप पर रूस की अप्रत्यक्ष मदद का गंभीर आरोप लगाया गया है।


🔴 स्कॉट बेसेंट का बयान: टैरिफ पर नरमी के संकेत

अमेरिकी मीडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन भारत पर लगाए गए कुल 50% टैरिफ में से आधा हटाने पर विचार कर सकता है। उनके मुताबिक, हाल के महीनों में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय कमी की है, जिससे अमेरिका को यह संकेत मिला है कि उसकी टैरिफ नीति असरदार रही है।

बेसेंट ने दावा किया कि भारत पर लगाया गया शुरुआती 25% टैरिफ “काफी प्रभावी” साबित हुआ और इसके चलते भारत ने रूसी तेल आयात में कटौती की। उन्होंने इसे अमेरिका की “बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत” बताया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल टैरिफ पूरी तरह हटाए नहीं गए हैं, लेकिन बातचीत और राहत का रास्ता खुल गया है।


🔴 दो चरणों में लगाए गए टैरिफ: कैसे बढ़ा दबाव

अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत पर दो बार टैरिफ लगाया।
पहली बार 1 अगस्त को, जब अमेरिका ने भारत के साथ बढ़ते व्यापार घाटे का हवाला देते हुए 25% टैरिफ लागू किया।
दूसरी बार 27 अगस्त को, रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाया गया।

इस तरह कुल मिलाकर 50% टैरिफ ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तनाव पैदा कर दिया। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम केवल व्यापारिक दबाव नहीं था, बल्कि रूस पर वैश्विक दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा भी माना गया।


🔴 यूरोप पर बड़ा आरोप: ‘भारत से रिफाइंड तेल खरीदकर रूस की मदद’

US India tariff Russia oil विवाद के बीच स्कॉट बेसेंट ने यूरोप पर सीधा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यूरोपीय देश भारत पर टैरिफ इसलिए नहीं लगा रहे, क्योंकि वे भारत के साथ बड़े व्यापार समझौते की तैयारी में हैं।

बेसेंट के मुताबिक, यूरोप खुद भारत से रिफाइंड तेल खरीद रहा है, जो मूल रूप से रूसी कच्चे तेल से तैयार किया गया होता है। इस तरह, यूरोपीय देश अप्रत्यक्ष रूप से रूस की मदद कर रहे हैं, जबकि सार्वजनिक रूप से वे रूस पर प्रतिबंधों की बात करते हैं।

यह बयान ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में भी तनाव पैदा कर सकता है, क्योंकि अमेरिका और यूरोप अक्सर रूस के खिलाफ एकजुट रुख अपनाने की बात करते रहे हैं।


🔴 अमेरिका का दबाव और भारत की प्रतिक्रिया

अमेरिका लंबे समय से भारत समेत कई देशों से कह रहा है कि वे रूस से तेल खरीदना बंद करें, ताकि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सके।

भारत ने इस दबाव को “अनुचित और अव्यावहारिक” बताया है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि देश की ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों पर आधारित होती है, न कि किसी एक देश के राजनीतिक दबाव पर।

विदेश मंत्रालय और वित्त मंत्रालय दोनों ने साफ शब्दों में कहा है कि भारत सस्ता, भरोसेमंद और स्थिर ऊर्जा स्रोत तलाशने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करता रहेगा।


🔴 यूक्रेन युद्ध के बाद बदला भारत-रूस तेल समीकरण

यूक्रेन युद्ध से पहले भारत का रूस से तेल आयात बेहद सीमित था। लेकिन जैसे ही पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए और रूस ने अपने तेल पर भारी छूट देनी शुरू की, भारत ने मौके का फायदा उठाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवंबर 2025 में भारत का रूसी तेल आयात छह महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। उस महीने भारत ने रूस से करीब 77 लाख टन कच्चा तेल खरीदा, जो भारत के कुल तेल आयात का 35% से ज्यादा था।

यह आंकड़ा दिखाता है कि भारत कुछ ही महीनों में रूस का सबसे बड़ा खरीदार बन गया था।


🔴 दिसंबर में गिरावट: तीन साल का निचला स्तर

हालांकि यह रफ्तार ज्यादा समय तक नहीं बनी रही। दिसंबर में रूस से भारत को तेल की सप्लाई तीन साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई।

आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 में रूसी तेल आयात घटकर करीब 12.4 लाख बैरल प्रति दिन रह गया, जो दिसंबर 2022 के बाद सबसे कम स्तर था।

विशेषज्ञों का कहना है कि कुल आयात में गिरावट जरूर आई है, लेकिन भारत की सरकारी तेल कंपनियां अब भी रूस से सीमित मात्रा में तेल खरीद रही हैं। मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, बल्कि खरीद की रणनीति बदली है।


🔴 डिस्काउंट का खेल: रूस ने घटाई छूट

यूक्रेन युद्ध के शुरुआती दौर में रूस ने अपने कच्चे तेल पर 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट दी थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल के करीब थीं, जिससे भारत को बड़ा फायदा हुआ।

अब स्थिति बदल चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटकर लगभग 63 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं। रूस ने भी अपनी छूट कम कर दी है और अब यह सिर्फ 1.5 से 2 डॉलर प्रति बैरल रह गई है।

इतनी कम छूट में भारत को पहले जैसा आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा, खासकर जब रूस से तेल लाने में शिपिंग और बीमा का खर्च ज्यादा पड़ता है।


🔴 भरोसेमंद सप्लायर्स की ओर वापसी

इसी वजह से भारत ने दोबारा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अमेरिका जैसे स्थिर और भरोसेमंद सप्लायर्स की ओर रुख करना शुरू किया है।

इन देशों से तेल खरीदने में कीमत का अंतर अब ज्यादा नहीं बचा है, लेकिन सप्लाई चेन और पेमेंट सिस्टम ज्यादा आसान और सुरक्षित हैं।

ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत अब “मल्टी-सोर्स स्ट्रेटेजी” अपना रहा है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता न बढ़े।


🔴 पेमेंट की चुनौती: रुपए में भुगतान पर अड़चन

US India tariff Russia oil विवाद का एक बड़ा पहलू भुगतान प्रणाली से जुड़ा है। पिछले दो वर्षों में भारत ने रूस से भारी मात्रा में तेल खरीदा, लेकिन बदले में रूस को भारत से बहुत कम निर्यात मिला। इससे रूस के पास बड़ी मात्रा में भारतीय रुपया जमा हो गया।

रुपया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह से परिवर्तनीय मुद्रा नहीं है, यानी रूस इसे आसानी से डॉलर या अन्य वैश्विक मुद्राओं में बदल नहीं सकता। न ही इसे तीसरे देशों के साथ व्यापार में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस वजह से रूस अब रुपये में भुगतान लेने से बचने लगा है।


🔴 सैंक्शन का असर: बैंकिंग सिस्टम में अड़चन

अमेरिका और यूरोप द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय बैंक रूस से जुड़े लेन-देन को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं।

जब भारत रूस को भुगतान करता है, तो कई बार ट्रांजैक्शन रुक जाते हैं या मंजूरी में काफी समय लग जाता है। डॉलर में भुगतान करने पर अमेरिकी सैंक्शन का खतरा रहता है, इसलिए कई बार तीसरे देश के बैंकों के जरिए पैसा भेजना पड़ता है।

इस पूरी प्रक्रिया का असर भारतीय तेल कंपनियों पर पड़ता है। तेल भले ही सस्ता हो, लेकिन पेमेंट में देरी होने से शिपमेंट भी देर से पहुंचता है और सप्लाई चेन प्रभावित होती है।


🔴 व्यापार समझौते की पृष्ठभूमि: नरमी के संकेत

अमेरिका और भारत के बीच इस समय एक बड़े व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। ऐसे में टैरिफ घटाने के संकेत दोनों देशों के रिश्तों में संभावित नरमी का संकेत माने जा रहे हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और डिफेंस सेक्टर में भारत-अमेरिका साझेदारी पहले से मजबूत है। टैरिफ में राहत से द्विपक्षीय व्यापार को नई गति मिल सकती है।


🔴 वैश्विक राजनीति में तेल की भूमिका

US India tariff Russia oil विवाद यह दिखाता है कि आज के दौर में तेल केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि कूटनीति और भू-राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।

अमेरिका रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए अपने व्यापारिक साझेदारों का इस्तेमाल कर रहा है, जबकि भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है। यूरोप अपने औद्योगिक और ऊर्जा जरूरतों को संतुलित करने की कोशिश में है।


अमेरिका, भारत, रूस और यूरोप के बीच तेल और टैरिफ का यह खेल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। स्कॉट बेसेंट के बयान से साफ है कि आने वाले समय में ऊर्जा नीति और व्यापार समझौते वैश्विक रिश्तों की दिशा तय करेंगे, जहां हर फैसला सिर्फ बैरल की कीमत नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन भी बदल सकता है।

 

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