Allahabad High Court Maintenance Verdict: सक्षम पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं मिलेगा—31 लाख आय दिखाने वाली डॉक्टर की याचिका खारिज
Allahabad High Court ने गुजारा भत्ता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि पत्नी स्वयं आय अर्जित करने में सक्षम है, तो केवल काम न करने का आधार बनाकर पति से भरण-पोषण की मांग नहीं की जा सकती। अदालत ने स्त्री रोग विशेषज्ञ पत्नी की याचिका खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।
यह फैसला वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण से जुड़े मामलों की न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और भविष्य के मामलों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
31 लाख रुपये वार्षिक आय दर्शाने वाली पत्नी को नहीं मिला भरण-पोषण
प्रकरण की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रस्तुत आयकर विवरण से यह तथ्य सामने आया कि संबंधित पत्नी प्रति वर्ष लगभग 31 लाख रुपये की आय का आयकर रिटर्न दाखिल कर रही थीं। अदालत ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को भरण-पोषण देना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल नौकरी छोड़ देना या कार्य न करना, भरण-पोषण का स्वतः आधार नहीं बन सकता।
दोनों पक्ष पेशे से डॉक्टर, तीन बच्चों के भरण-पोषण पर अलग आदेश
मामले में पति प्रयागराज निवासी न्यूरोसर्जन हैं, जबकि पत्नी एमडी स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। पत्नी ने अपने तथा तीन बच्चों के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 और धारा 26 के अंतर्गत भरण-पोषण की मांग की थी।
परिवार न्यायालय ने सुनवाई के बाद पत्नी के लिए गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया था, लेकिन बच्चों के लिए पति को प्रति माह 60,000 रुपये देने का आदेश दिया गया था। अदालत ने यह भी माना कि बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अलग कानूनी आधार पर तय होती है और यह आदेश यथावत लागू रहेगा।
पत्नी का तर्क—अस्पताल से हटाए जाने के कारण आय प्रभावित हुई
पत्नी की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि वैवाहिक विवाद के बाद उन्हें अस्पताल से हटा दिया गया और वर्तमान में वे कार्यरत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पहले जैसी जीवनशैली बनाए रखने के लिए पति से आर्थिक सहायता आवश्यक है।
इस आधार पर उन्होंने अदालत से अंतरिम भरण-पोषण की मांग की थी।
पति का पक्ष—विशेषज्ञ डॉक्टर होने के कारण आय अर्जित करने में सक्षम
पति की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि पत्नी एक प्रशिक्षित विशेषज्ञ डॉक्टर हैं और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में उनके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि पत्नी की शैक्षणिक योग्यता और पेशेवर क्षमता को देखते हुए यह मानना उचित नहीं है कि वह आर्थिक रूप से निर्भर हैं। ऐसे में भरण-पोषण देना न्यायसंगत नहीं होगा।
अदालत की टिप्पणी—स्वेच्छा से काम न करना भरण-पोषण का आधार नहीं
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि पत्नी की पेशेवर योग्यता और पूर्व आय का रिकॉर्ड यह दर्शाता है कि वह स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से कार्य नहीं करता, तो उसे भरण-पोषण का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता। इस आधार पर पत्नी की याचिका खारिज कर दी गई।
परिवार न्यायालय के आदेश को हाईकोर्ट ने बरकरार रखा
उच्च न्यायालय ने परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को उचित मानते हुए उसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि बच्चों के भरण-पोषण के संबंध में दिया गया आदेश प्रभावी रहेगा और उसका पालन जारी रहना चाहिए।
यह निर्णय पारिवारिक विवादों में आर्थिक निर्भरता के सिद्धांत को लेकर महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
भरण-पोषण कानून की व्याख्या में महत्वपूर्ण माना जा रहा फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में मार्गदर्शक साबित हो सकता है, जहां भरण-पोषण की मांग आर्थिक क्षमता के बावजूद की जाती है।
अदालत ने यह संकेत दिया कि भरण-पोषण का उद्देश्य आर्थिक रूप से असहाय पक्ष को सहायता प्रदान करना है, न कि सक्षम व्यक्ति को अतिरिक्त लाभ उपलब्ध कराना।
कार्य करने की क्षमता और वास्तविक आय दोनों पर अदालत का जोर
निर्णय में अदालत ने केवल वर्तमान रोजगार स्थिति ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की पेशेवर योग्यता और आय अर्जित करने की क्षमता को भी महत्वपूर्ण आधार माना।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायालय वास्तविक आर्थिक क्षमता को भी गंभीरता से परखेगा।

