क्या लोकप्रिय रक्षा मंत्री से असहज हुए Zelensky? यूक्रेन की सत्ता में बड़ा फेरबदल, फेदोरोव की विदाई पर उठे कई सवाल
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर Zelensky द्वारा रक्षा मंत्री मिखाइलो फेदोरोव को नियुक्ति के महज छह महीने बाद पद से हटाने के फैसले ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। इस निर्णय के बाद देश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिले और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह बहस तेज हो गई कि आखिर इतनी कम अवधि में एक लोकप्रिय और तकनीक-समर्थक रक्षा मंत्री को हटाने के पीछे वास्तविक वजह क्या रही।
हालांकि इस मामले में यूक्रेनी सरकार की ओर से विस्तृत आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन विभिन्न राजनीतिक विश्लेषणों और मीडिया रिपोर्टों में सेना के शीर्ष नेतृत्व से मतभेद, रक्षा खरीद प्रणाली में सुधार, रक्षा उद्योग से जुड़े हितों का टकराव और बढ़ती राजनीतिक लोकप्रियता जैसे कई संभावित कारणों का उल्लेख किया जा रहा है। इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
रक्षा मंत्री हटने के बाद पहली बार कई शहरों में विरोध प्रदर्शन
फेदोरोव को पद से हटाए जाने के बाद यूक्रेन के कई प्रमुख शहरों में लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए। राजधानी कीव में बड़ी संख्या में नागरिक सड़कों पर उतरे, जबकि ओडेसा, ल्वीव और लगातार रूसी हमलों का सामना कर रहे खारकीव में भी लोगों ने अपनी नाराजगी जाहिर की।
खारकीव में सैकड़ों प्रदर्शनकारी हाथों में तख्तियां लेकर सड़कों पर पहुंचे और सरकार के फैसले के खिलाफ नारे लगाए। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यह उन दुर्लभ अवसरों में से एक माना जा रहा है जब सरकार के किसी बड़े निर्णय के विरोध में सार्वजनिक प्रदर्शन इतने व्यापक स्तर पर सामने आए।
ड्रोन युद्ध की रणनीति का प्रमुख चेहरा थे मिखाइलो फेदोरोव
35 वर्षीय मिखाइलो फेदोरोव को आधुनिक तकनीक आधारित युद्ध रणनीति का प्रमुख समर्थक माना जाता था। रक्षा मंत्री बनने से पहले वे यूक्रेन के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन मंत्री के रूप में कार्य कर चुके थे और राष्ट्रपति जेलेंस्की के करीबी तकनीकी सलाहकारों में उनकी गिनती होती थी।
रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिलने के बाद उन्होंने सेना में ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों, रोबोटिक तकनीक और डिजिटल समन्वय को तेजी से बढ़ावा दिया। इसी अवधि में यूक्रेन के कई ड्रोन अभियानों को उल्लेखनीय सफलता मिली।
यूक्रेनी बलों ने रूस के भीतर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक ड्रोन हमले किए, जबकि क्रीमिया क्षेत्र में भी कई रणनीतिक ठिकानों और आपूर्ति नेटवर्क को निशाना बनाया गया। इन अभियानों ने यूक्रेन के भीतर नई तकनीक आधारित युद्ध प्रणाली को लेकर विश्वास बढ़ाया।
क्या ड्रोन आधारित सैन्य रणनीति अब बदलेगी?
फेदोरोव की विदाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यूक्रेन की सैन्य रणनीति में कोई बदलाव देखने को मिलेगा।
पिछले कुछ वर्षों में यूक्रेन ने पारंपरिक सैन्य शक्ति की तुलना में कम लागत वाले ड्रोन, स्मार्ट हथियारों और तकनीकी नवाचारों पर अधिक ध्यान दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस जैसी बड़ी सैन्य शक्ति के सामने यह रणनीति यूक्रेन के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।
हालांकि रक्षा मंत्री के बदलने का अर्थ यह नहीं माना जा सकता कि पूरी सैन्य नीति तुरंत बदल जाएगी, लेकिन भविष्य में तकनीकी निवेश और प्राथमिकताओं पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
सेना के शीर्ष नेतृत्व से मतभेद की चर्चा
कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, फेदोरोव और यूक्रेन के कमांडर-इन-चीफ ओलेक्सांद्र सिरस्की के बीच रणनीतिक मतभेद लंबे समय से चर्चा का विषय थे।
बताया जाता है कि फेदोरोव भविष्य के युद्ध को मुख्य रूप से ड्रोन, रोबोट और आधुनिक तकनीक के माध्यम से संचालित करने के पक्षधर थे, जबकि सैन्य नेतृत्व का मानना था कि तकनीक महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन किसी भी युद्ध में जमीनी सैनिकों की भूमिका को पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।
रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि दोनों पक्षों के बीच संवाद धीरे-धीरे कम होता गया और रणनीतिक समन्वय प्रभावित होने लगा। हालांकि इन दावों पर संबंधित पक्षों की ओर से विस्तृत आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
रक्षा खरीद प्रणाली में बदलाव से बढ़ा विवाद
रक्षा मंत्रालय संभालने के बाद फेदोरोव ने हथियार खरीदने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और तकनीकी सुधार लागू करने का प्रयास किया।
उन्होंने Brave-1 नामक डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दिया, जिसके माध्यम से सैनिक अपनी आवश्यकताओं के अनुसार कुछ सैन्य उपकरणों और तकनीकी संसाधनों का चयन कर सकते थे। इसके अलावा DOT Chain नामक एक अन्य डिजिटल प्रणाली भी विकसित की गई।
समर्थकों का कहना था कि इन पहलों से खरीद प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज हो सकती थी, जबकि आलोचकों का मानना था कि इससे पारंपरिक रक्षा खरीद प्रणाली प्रभावित हो रही थी। विभिन्न रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया कि रक्षा उद्योग से जुड़े कुछ प्रभावशाली समूह इन परिवर्तनों से असहज थे। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
सेना के भीतर अनुभव को लेकर भी उठे सवाल
फेदोरोव की आलोचना करने वाले कुछ अधिकारियों का कहना था कि उनके पास प्रत्यक्ष सैन्य अनुभव सीमित था।
आलोचकों के अनुसार, वे तकनीकी प्रशासन और डिजिटल परिवर्तन के क्षेत्र में सफल रहे, लेकिन युद्ध संचालन का अनुभव रखने वाले सैन्य अधिकारी नहीं थे। उनके कई प्रमुख सहयोगी भी डिजिटल मंत्रालय की पृष्ठभूमि से आए थे, जिससे सेना के कुछ वर्गों में नेतृत्व को लेकर असंतोष की चर्चा होती रही।
एक अन्य विवाद उस समय भी सामने आया जब उनके एक सहयोगी द्वारा स्केल्या (Skelya) नामक सैन्य इकाई के प्रदर्शन पर सार्वजनिक टिप्पणी की गई, जिसके बाद संबंधित यूनिट ने तीखी प्रतिक्रिया दी। यह घटनाक्रम भी चर्चा का विषय बना।
क्या बढ़ती लोकप्रियता बनी राजनीतिक चुनौती?
फेदोरोव की विदाई को लेकर सबसे अधिक चर्चा जिस पहलू पर हो रही है, वह उनकी बढ़ती सार्वजनिक लोकप्रियता है।
यूक्रेन के कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ड्रोन कार्यक्रम की सफलताओं के बाद फेदोरोव एक राष्ट्रीय चेहरे के रूप में उभर रहे थे। उनकी पहचान केवल मंत्री तक सीमित नहीं रह गई थी, बल्कि वे आधुनिक सैन्य नवाचार के प्रतीक बनते जा रहे थे।
कीव स्थित स्वतंत्र थिंक टैंक पेंटा सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज के प्रमुख वोलोदिमिर फेसेन्को के हवाले से यह विश्लेषण सामने आया कि राष्ट्रपति जेलेंस्की संभवतः सरकार में सबसे प्रमुख राजनीतिक चेहरा बने रहना चाहते हैं। कुछ विश्लेषकों का यह भी मत है कि फेदोरोव को विपक्ष के कुछ नेताओं का समर्थन मिलने लगा था।
हालांकि यह विश्लेषकों की राय है और इसे राष्ट्रपति कार्यालय की आधिकारिक स्थिति नहीं माना जा सकता।
सरकार में व्यापक फेरबदल का हिस्सा भी माना जा रहा फैसला
विशेषज्ञों का कहना है कि फेदोरोव की विदाई को केवल व्यक्तिगत या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा।
उसी अवधि में यूक्रेन सरकार में अन्य महत्वपूर्ण बदलाव भी किए गए, जिनमें प्रधानमंत्री स्तर पर भी फेरबदल शामिल है। इसलिए कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय व्यापक प्रशासनिक पुनर्गठन की प्रक्रिया का हिस्सा भी हो सकता है।
आधिकारिक कारणों पर अभी भी बना हुआ है संशय
अब तक यूक्रेनी सरकार की ओर से रक्षा मंत्री को हटाने के पीछे कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है। इसी कारण इस फैसले को लेकर कई तरह की राजनीतिक, प्रशासनिक और सैन्य व्याख्याएं सामने आ रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा लोकप्रियता, आंतरिक शक्ति संतुलन, सेना के साथ मतभेद और रक्षा खरीद सुधार जैसे कारणों का उल्लेख किया जा रहा है, लेकिन इन सभी को फिलहाल संभावित विश्लेषण के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अंतिम और आधिकारिक कारणों की पुष्टि अभी शेष है।

