मदरसा आधुनिकीकरण योजना में कथित ₹2.14 लाख गबन मामला: Allahabad High Court ने शिक्षकों के खिलाफ FIR रद्द करने से किया इनकार
Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए आजमगढ़ जिले में मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत कथित ₹2.14 लाख के गबन से जुड़े मामले में आरोपित शिक्षकों को राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग खारिज कर दी और कहा कि प्रथम दृष्टया सामने आए आरोप गंभीर हैं तथा उनकी विस्तृत जांच आवश्यक है।
यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने किरण पाल एवं अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अतरौलिया थाना क्षेत्र स्थित मदरसा फैजकुशर निस्वान, रुकुलमलपुर से जुड़ा है।
मामले में अपराध अनुसंधान विभाग (सीबीसीआईडी) की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) के इंस्पेक्टर कुंवर ब्रह्म प्रकाश सिंह ने 19 मार्च 2025 को एफआईआर दर्ज कराई थी।
एसआईटी को जांच के दौरान मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत सरकारी धन के उपयोग और संस्थान के संचालन को लेकर कई गंभीर अनियमितताएं मिलने का दावा किया गया।
जांच में क्या-क्या सामने आया?
एसआईटी की जांच रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी पोर्टल पर संबंधित मदरसे में 53 छात्र-छात्राओं का पंजीकरण दर्ज था।
लेकिन जब जांच टीम मौके पर पहुंची, तो वहां एक भी विद्यार्थी उपस्थित नहीं मिला।
यही नहीं, पोर्टल पर मदरसे में—
- 300 वर्गफीट के तीन कमरे,
- 150 वर्गफीट का एक कार्यालय
दर्शाया गया था।
हालांकि निरीक्षण के दौरान जांच अधिकारियों को वहां केवल एक रिहायशी मकान मिला, जो पोर्टल पर उपलब्ध विवरण और निर्धारित मानकों से मेल नहीं खाता था।
तीन शिक्षकों की तैनाती भी जांच के दायरे में
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि सरकारी अभिलेखों में मदरसे में तीन शिक्षकों—
- किरण पाल,
- रेनू यादव,
- अनवर अहमद
की नियुक्ति दर्ज थी।
एसआईटी ने इन नियुक्तियों और मानदेय भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच की और उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई शुरू की।
हाईकोर्ट में क्या मांग की गई थी?
एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपित शिक्षकों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर प्राथमिकी को निरस्त करने की मांग की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उन्हें जुलाई 2012 में मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत गणित, अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाने के लिए अस्थायी आधार पर नियुक्त किया गया था।
उनका कहना था कि उन्हें सरकार की ओर से जो मानदेय प्राप्त हुआ, वह पूरी तरह नियमों के अनुरूप था और उन्होंने किसी प्रकार के सरकारी धन का गबन नहीं किया।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि उनके विरुद्ध दर्ज एफआईआर तथ्यों और कानून के अनुरूप नहीं है।
हाईकोर्ट ने क्यों नहीं दी राहत?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि एसआईटी की जांच में यह आरोप सामने आया है कि सरकारी धन का कथित गबन शिक्षकों के नाम का उपयोग करके किया गया।
ऐसी स्थिति में प्रारंभिक स्तर पर यह कहना उचित नहीं होगा कि याचिकाकर्ता पूरी तरह निर्दोष हैं या एफआईआर में किसी भी प्रकार का अपराध नहीं बनता।
कोर्ट ने क्या महत्वपूर्ण टिप्पणी की?
खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अदालत इस स्तर पर आरोपों की सत्यता या असत्यता पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रही है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वह यह नहीं मान रही कि आरोप सिद्ध हो चुके हैं।
हालांकि, अदालत के अनुसार—
- आरोप गंभीर प्रकृति के हैं।
- मामले की विस्तृत और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
- जांच पूरी होने से पहले एफआईआर रद्द करना उचित नहीं होगा।
इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।
मदरसा आधुनिकीकरण योजना क्या है?
मदरसा आधुनिकीकरण योजना का उद्देश्य पारंपरिक धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थियों को आधुनिक विषयों जैसे—
- गणित,
- अंग्रेजी,
- हिंदी,
- विज्ञान,
- सामाजिक विज्ञान
की शिक्षा उपलब्ध कराना है।
इस योजना के अंतर्गत पात्र मदरसों में आधुनिक विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों को सरकार की ओर से मानदेय उपलब्ध कराया जाता है, ताकि विद्यार्थियों को मुख्यधारा की शिक्षा से भी जोड़ा जा सके।
जांच एजेंसियों की भूमिका पर रहेगी नजर
इस मामले में अब जांच एजेंसियां आरोपों से जुड़े दस्तावेज, भुगतान रिकॉर्ड, नियुक्तियों, पोर्टल पर दर्ज जानकारी तथा वास्तविक स्थिति का मिलान कर आगे की कार्रवाई करेंगी।
यदि जांच में किसी प्रकार की आपराधिक जिम्मेदारी स्थापित होती है तो संबंधित कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। वहीं यदि जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो कानून के अनुसार आगे निर्णय लिया जाएगा।
मामले की आगे की प्रक्रिया
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद एफआईआर और जांच की प्रक्रिया जारी रहेगी। मामले की अंतिम सच्चाई जांच और उसके बाद होने वाली न्यायिक कार्यवाही के आधार पर ही सामने आएगी।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, एफआईआर रद्द न होने का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है, बल्कि अदालत ने केवल इतना माना है कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जांच को इस स्तर पर रोका नहीं जा सकता।

