पुलवामा के बेटे Owais Yaqoob ने बुल्गारिया में लहराया भारत का परचम: BRAVE CF 107 जीतकर रचा इतिहास, ‘काराकुली टोपी’ पहन दुनिया को दिखाया कश्मीर का गौरव
News-Desk
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ओवैस ने जीत के बाद कश्मीरी ‘काराकुली टोपी’ और पारंपरिक कुर्ता पहनकर अपनी भावनाओं को दुनिया के सामने व्यक्त किया। उनके लिए यह केवल एक खेल प्रतियोगिता की जीत नहीं थी, बल्कि अपनी पहचान, अपनी मिट्टी और अपने लोगों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान दिलाने का अवसर भी था।
जीत के बाद ‘काराकुली टोपी’ पहनकर याद किया अपना कश्मीर
बुल्गारिया में खिताबी मुकाबला जीतने के बाद के भावुक क्षणों को याद करते हुए ओवैस याकूब ने बताया कि प्रतियोगिता के दौरान उनका परिवार और दोस्त उनके साथ मौजूद नहीं थे।
उन्होंने कहा कि स्टेडियम में अधिकांश दर्शक स्थानीय खिलाड़ियों का समर्थन कर रहे थे, लेकिन जीत के बाद उन्होंने तुरंत कश्मीरी काराकुली टोपी और कुर्ता पहन लिया।
ओवैस के अनुसार, उस पल उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि भले ही वे अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर हों, लेकिन कश्मीर उनके दिल के बेहद करीब है। पारंपरिक परिधान पहनना उनके लिए अपनी संस्कृति और अपनी जड़ों को सम्मान देने का तरीका था।
दिल्ली एयरपोर्ट पर मिला अप्रत्याशित स्वागत
ओवैस ने बताया कि उन्हें विश्वास था कि कश्मीर के लोग उनकी जीत पर खुशी मनाएंगे, लेकिन दिल्ली में मिला स्वागत उनकी कल्पना से कहीं अधिक था।
उन्होंने कहा कि जब वे दिल्ली पहुंचे तो एयरपोर्ट पर कई लोग उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए आगे आए। उनके अनुसार, यह अनुभव उनके लिए बेहद भावुक और यादगार रहा क्योंकि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनकी जीत पर देशभर से इतना प्यार और सम्मान मिलेगा।
पुलवामा के छोटे से कस्बे से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर
ओवैस याकूब का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।
पुलवामा जिले के मूरान कस्बे से आने वाले ओवैस एक साधारण परिवार से हैं। वह अपने माता-पिता, पत्नी, दो बच्चों और भाई-बहनों के साथ रहते हैं।
परिवार में सबसे बड़े होने के कारण कम उम्र में ही जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गई थीं। पिता के स्वास्थ्य खराब होने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति संभालने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी पड़ी।
इसके बावजूद उन्होंने अपने खेल के सपनों को कभी नहीं छोड़ा।
परिवार चलाने के लिए किए कई छोटे-बड़े काम
ओवैस ने बताया कि आर्थिक परिस्थितियां आसान नहीं थीं।
उन्होंने जीवन के अलग-अलग दौर में—
- ट्रेनर के रूप में काम किया,
- मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) की नौकरी की,
- कैटरिंग का काम किया,
- सेब के बागों में फल तोड़ने का काम किया,
- सेब की पैकिंग का कार्य भी किया।
इन सभी जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने अपनी मार्शल आर्ट्स ट्रेनिंग कभी नहीं छोड़ी।
उनके अनुसार, दिनभर मेहनत करने के बाद भी अभ्यास जारी रखना ही उनके सपनों को जीवित रखने का सबसे बड़ा कारण बना।
मार्शल आर्ट्स से एमएमए तक का सफर
ओवैस ने शुरुआत विभिन्न मार्शल आर्ट्स विधाओं से की।
उन्होंने—
- थांग-ता,
- कराटे,
- किकबॉक्सिंग,
- ताइक्वांडो
जैसे खेलों में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
धीरे-धीरे उनकी रुचि मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (MMA) की ओर बढ़ी और उन्होंने इसी खेल में अपना भविष्य बनाने का फैसला किया।
2018 में मिली बड़ी पहचान
लगातार मेहनत का परिणाम वर्ष 2018 में मिला, जब उन्होंने ‘चैम्पियन ऑफ चैम्पियंस’ का खिताब जीता।
इसी दौरान राष्ट्रीय स्तर की ताइक्वांडो प्रतियोगिताओं में उन्हें ‘बेस्ट फाइटर बॉय’ के रूप में भी सम्मानित किया गया।
इन सफलताओं ने उनके आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने का रास्ता खोला।
खबीब नूरमागोमेदोव की टीम में मिली जगह
ओवैस याकूब के करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें विश्व प्रसिद्ध एमएमए फाइटर खबीब नूरमागोमेदोव की टीम से जुड़ने का अवसर मिला।
उन्होंने बताया कि लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्हें टीम खबीब का हिस्सा बनने का मौका मिला।
इसके बाद उन्होंने अमेरिका स्थित American Kickboxing Academy (AKA) में सीधे खबीब नूरमागोमेदोव और प्रसिद्ध कोच जेवियर मेंडेज के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
एमएमए की दुनिया में यह अवसर किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
2015 में शुरू की अपनी एकेडमी, अब तक 200 से अधिक खिलाड़ियों को दी ट्रेनिंग
अपने व्यक्तिगत करियर के साथ-साथ ओवैस ने खेल के विकास को भी प्राथमिकता दी।
उन्होंने वर्ष 2015 में पुलवामा में अपनी मार्शल आर्ट्स एकेडमी की स्थापना की।
इस एकेडमी का उद्देश्य स्थानीय युवाओं को बेहतर प्रशिक्षण उपलब्ध कराना था। अब तक यहां 200 से अधिक खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
ओवैस का कहना है कि उनका सपना केवल स्वयं सफल होना नहीं, बल्कि कश्मीर से अधिक से अधिक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार करना भी है।
खबीब से मिली प्रेरणा, बदली खेल की दिशा
ओवैस के अनुसार, शुरुआत में वे पारंपरिक मार्शल आर्ट्स प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते थे।
बाद में विश्व चैंपियन खबीब नूरमागोमेदोव से प्रेरित होकर उन्होंने एमएमए को अपना मुख्य खेल बनाया।
उन्होंने बताया कि आज भी वह खुद नियमित प्रशिक्षण लेते हैं और साथ ही युवा खिलाड़ियों को आधुनिक एमएमए तकनीकों की कोचिंग भी देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि के बावजूद स्थानीय स्तर पर सम्मान की उम्मीद
विश्व मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने और बड़ी सफलता हासिल करने के बावजूद ओवैस ने स्थानीय प्रशासन से अपेक्षित सम्मान नहीं मिलने पर अपनी निराशा भी व्यक्त की।
उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में खिलाड़ियों की उपलब्धियों को स्थानीय स्तर पर भी अधिक प्रोत्साहन मिलेगा, ताकि युवा खेलों की ओर प्रेरित हों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकें।
कश्मीर के युवाओं के लिए बने प्रेरणा
ओवैस याकूब की कहानी केवल एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत, जिम्मेदारी और सपनों को पूरा करने के जज्बे की मिसाल है।
सीमित संसाधनों, आर्थिक चुनौतियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने लगातार अभ्यास जारी रखा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रतिष्ठित खिताब अपने नाम किया।
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे खिलाड़ी न केवल अपने राज्य बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा बनते हैं। उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियां प्रतिभा और समर्पण के सामने स्थायी बाधा नहीं बन सकतीं।

