Balochistan में बढ़ते विद्रोही हमलों से पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव, 2,000 पूर्व अफगान सैनिकों को सुरक्षा बलों में किया गया शामिल
Balochistan Insurgency के बीच पाकिस्तान के सामने बलूचिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था संभालने की चुनौती लगातार गंभीर होती दिखाई दे रही है। क्षेत्र में सक्रिय बलूच विद्रोही संगठनों के हमलों और सुरक्षा अभियानों के बीच अब पाकिस्तान ने करीब 2,000 पूर्व अफगान सैनिकों और पुलिसकर्मियों को भर्ती किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भर्ती किए गए लोगों में बड़ी संख्या उन पूर्व अफगान सैनिकों की है, जिन्होंने अमेरिकी सेना के साथ मिलकर अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया था। अफगानिस्तान में 2021 में तालिबान की वापसी के बाद इन लोगों की स्थिति बदल गई और बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों तथा सुरक्षा कर्मियों को रोजगार और सुरक्षा से जुड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
अब पाकिस्तान में सुरक्षा बलों के साथ काम करने का अवसर मिलने के बाद इनमें से करीब 2,000 लोगों को भर्ती किए जाने की जानकारी सामने आई है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब बलूचिस्तान में विद्रोही हमलों के कारण पाकिस्तान के सैन्य और सुरक्षा ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है। बलूचिस्तान के कई इलाकों में पुलिस और प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अर्धसैनिक बलों तथा सेना पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है।
बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा के बीच पाकिस्तान का बड़ा फैसला
बलूचिस्तान लंबे समय से राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी तनाव का सामना कर रहा है। क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न बलूच संगठनों की गतिविधियों ने पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र के सामने लगातार चुनौती बनाए रखी है।
इन संगठनों की गतिविधियों में सुरक्षा प्रतिष्ठानों, सरकारी कार्यालयों, पुलिस ठिकानों और महत्वपूर्ण मार्गों को निशाना बनाने जैसी घटनाएं शामिल रही हैं। जवाब में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की ओर से भी अभियान चलाए जाते रहे हैं।
ऐसे वातावरण में पाकिस्तान द्वारा पूर्व अफगान सैनिकों और पुलिसकर्मियों को सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करना ध्यान खींचने वाला कदम है।
इन पूर्व सैनिकों के पास सैन्य प्रशिक्षण और संघर्ष वाले क्षेत्रों में काम करने का अनुभव है। यही कारण है कि उन्हें सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करने को पाकिस्तान के लिए उपलब्ध प्रशिक्षित मानव संसाधन के रूप में देखा जा रहा है।
2,000 पूर्व अफगान सैनिक और पुलिसकर्मी क्यों किए गए भर्ती?
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में भर्ती किए गए लोगों में अधिकांश वे पूर्व अफगान सुरक्षा कर्मी हैं जिन्होंने तालिबान के खिलाफ लड़ाई में अफगान सुरक्षा बलों के हिस्से के रूप में काम किया था।
इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जिन्हें हथियारों के इस्तेमाल, गश्त, सुरक्षा संचालन और संघर्ष वाले इलाकों में काम करने का अनुभव रहा है।
एक पूर्व अफगान सैनिक के हवाले से बताया गया है कि भर्ती किए गए लोगों को हर महीने करीब 40 हजार पाकिस्तानी रुपये वेतन मिल रहा है। भारतीय मुद्रा में यह राशि लगभग 13,807 रुपये बताई गई है।
आर्थिक रूप से कठिन परिस्थितियों में रह रहे पूर्व अफगान सुरक्षा कर्मियों के लिए यह रोजगार का महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है।
तालिबान की वापसी के बाद बदली पूर्व अफगान सैनिकों की जिंदगी
अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद अफगानिस्तान के पूर्व सुरक्षा बलों के सामने बड़ा बदलाव आया। तालिबान की वापसी के बाद अफगान सुरक्षा तंत्र का पुराना ढांचा टूट गया और बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों तथा पुलिसकर्मियों की नौकरी चली गई।
इनमें से कई लोगों को वेतन मिलना बंद हो गया। इसके साथ ही पूर्व सुरक्षा बलों से जुड़े होने के कारण कुछ लोगों को अपनी सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी रही।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2021 से 2023 के बीच पूर्व सैनिकों और सुरक्षा कर्मियों की 218 हत्याएं हुईं। ऐसे माहौल में कई पूर्व सैनिकों के लिए अफगानिस्तान वापस जाना कठिन हो गया।
कुछ लोग पाकिस्तान की ओर चले गए और वहां उन्हें लंबे समय तक रोजगार की समस्या का सामना करना पड़ा।
आर्थिक मजबूरी बनी पाकिस्तान आने की बड़ी वजह
अफगानिस्तान से पाकिस्तान पहुंचने के बाद पूर्व सैनिकों के सामने सबसे बड़ी समस्याओं में रोजगार और आर्थिक सुरक्षा शामिल रही।
सैन्य और पुलिस का अनुभव होने के बावजूद सामान्य परिस्थितियों में उनके लिए उपयुक्त रोजगार तलाशना आसान नहीं था। कई लोगों के पास नियमित आय का स्रोत नहीं था।
ऐसे में पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र में नौकरी का अवसर मिलने पर उन्होंने इसे स्वीकार किया।
लगभग 40 हजार पाकिस्तानी रुपये मासिक वेतन की जानकारी ऐसे लोगों के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्होंने वर्षों तक सैन्य या पुलिस सेवा की हो और फिर अचानक अपना रोजगार खो दिया हो।
पाकिस्तान को पूर्व अफगान सैनिकों से क्या फायदा होगा?
पाकिस्तान के लिए इन पूर्व अफगान सैनिकों की सबसे बड़ी उपयोगिता उनका पहले से मौजूद सैन्य अनुभव है।
इन लोगों को सैन्य प्रशिक्षण मिल चुका है और उन्होंने वास्तविक संघर्ष की परिस्थितियों में काम किया है। अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ अभियानों के दौरान उन्होंने हथियारों, सुरक्षा व्यवस्था और ऑपरेशनल परिस्थितियों का सामना किया।
सीमावर्ती क्षेत्रों में काम करने वाले कुछ पूर्व सैनिकों के पास कठिन भूगोल और सुरक्षा जोखिम वाले इलाकों का अनुभव भी रहा है।
इस वजह से पाकिस्तान को उन्हें सुरक्षा संबंधी बुनियादी प्रशिक्षण देने में अपेक्षाकृत कम समय लग सकता है। हालांकि, किसी नए देश की सुरक्षा व्यवस्था, कमांड स्ट्रक्चर और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अतिरिक्त प्रशिक्षण और समन्वय की आवश्यकता बनी रहती है।
बलूचिस्तान में दो महीने में 172 हमलों का दावा
बलूचिस्तान में सुरक्षा अभियानों के बावजूद विद्रोही गतिविधियां जारी रहने की जानकारी सामने आई है।
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज यानी PICSS के आंकड़ों के अनुसार दो महीनों के दौरान बलूचिस्तान में 172 हमले दर्ज किए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई में विद्रोही हमलों और सुरक्षा अभियानों के दौरान 62 सुरक्षाकर्मी मारे गए।
ये आंकड़े क्षेत्र में सुरक्षा बलों पर पड़ रहे दबाव की तस्वीर सामने रखते हैं। हालांकि हिंसा से जुड़े आंकड़ों में स्रोत, परिभाषा और रिपोर्टिंग पद्धति के आधार पर अंतर हो सकता है, इसलिए ऐसे आंकड़ों को संबंधित संस्थाओं के आकलन के रूप में देखना जरूरी है।
नौश्की में नियंत्रण वापस लेने के लिए हेलिकॉप्टर और ड्रोन का इस्तेमाल
बलूचिस्तान में सुरक्षा चुनौती का अंदाजा नौश्की में सामने आए घटनाक्रम से भी लगाया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक विद्रोहियों से नियंत्रण वापस लेने के लिए पाकिस्तानी सेना को हेलिकॉप्टर और ड्रोन का इस्तेमाल करना पड़ा।
किसी शहरी या अर्ध-शहरी क्षेत्र में नियंत्रण वापस लेने के लिए हवाई संसाधनों का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि सुरक्षा बलों के सामने जमीन पर चुनौती किस स्तर की हो सकती है।
बलूचिस्तान का विशाल और कठिन भूगोल भी सुरक्षा अभियानों को जटिल बनाता है। पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के लिए निगरानी और तेज प्रतिक्रिया की अपनी चुनौतियां होती हैं।
बलूचिस्तान के 27 जिलों तक फैली विद्रोही गतिविधियां
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज की रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष बलूचिस्तान में 254 हमले दर्ज किए गए थे।
इनमें बलूच विद्रोही संगठनों से जुड़े 225 हमले 27 जिलों में दर्ज किए गए। रिपोर्ट में केच में 30 और क्वेटा में 26 हमलों का उल्लेख किया गया है।
इससे यह संकेत मिलता है कि हिंसा केवल किसी एक जिले या शहर तक सीमित नहीं है। अलग-अलग जिलों में विद्रोही संगठनों की गतिविधियां सुरक्षा व्यवस्था के लिए व्यापक चुनौती पैदा करती हैं।
बलूचिस्तान क्षेत्रफल की दृष्टि से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और इसकी भौगोलिक परिस्थितियां भी सुरक्षा अभियानों को जटिल बनाती हैं।
बलूच विद्रोही संगठनों और TTP के एजेंडे अलग
बलूचिस्तान में सक्रिय सभी सशस्त्र संगठन एक ही विचारधारा या उद्देश्य से जुड़े नहीं हैं। बलूच विद्रोही संगठनों की मुख्य मांगें राजनीतिक अधिकार, अधिक स्वायत्तता और कुछ संगठनों के मामले में स्वतंत्रता से जुड़ी हैं।
इसके विपरीत तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP का उद्देश्य अलग है। TTP पाकिस्तान में अपनी व्याख्या के अनुसार इस्लामी शासन स्थापित करने की मांग करता रहा है।
इसलिए बलूचिस्तान में होने वाली हिंसा को केवल एक ही संगठन या एक ही विचारधारा के संदर्भ में देखना पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता।
क्षेत्र में अलग-अलग संगठनों की मौजूदगी और उनके अलग-अलग उद्देश्य सुरक्षा स्थिति को और जटिल बनाते हैं।
BLA का नाम भी लगातार सामने आता रहा है
बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की मांग करने वाले संगठनों में बलूच लिबरेशन आर्मी यानी BLA प्रमुख नामों में शामिल है।
BLA और अन्य बलूच सशस्त्र संगठनों की गतिविधियों में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों, सरकारी प्रतिष्ठानों और अन्य लक्ष्यों पर हमलों की घटनाएं सामने आती रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार BLA ने मस्तुंग में पाकिस्तानी सेना पर हमले की जिम्मेदारी लेने का दावा भी किया था।
ऐसे दावों को रिपोर्ट करते समय यह अंतर बनाए रखना जरूरी है कि किसी संगठन द्वारा हमले की जिम्मेदारी लेने का दावा और स्वतंत्र रूप से सत्यापित घटना अलग-अलग चीजें हैं।
बलूचिस्तान में दो महीने में 450 से ज्यादा मौतों का दावा
बलूचिस्तान में लगातार हिंसा के कारण दो महीनों के दौरान 450 से अधिक मौतों का आंकड़ा भी सामने आया है। इसमें सुरक्षा बलों के साथ-साथ विद्रोही और अन्य लोग शामिल हो सकते हैं।
हिंसक घटनाओं में मौतों की संख्या का आकलन अलग-अलग संस्थाओं और स्रोतों द्वारा अलग तरीके से किया जा सकता है। इसलिए किसी एक आंकड़े को अंतिम और पूर्ण संख्या के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय संबंधित रिपोर्ट के संदर्भ में देखना अधिक उचित है।
फिर भी, इतने बड़े स्तर पर हिंसा की रिपोर्टिंग इस बात की ओर संकेत करती है कि बलूचिस्तान में सुरक्षा चुनौती केवल कुछ अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं है।
कई जिलों में पुलिस की पकड़ कमजोर होने की बात
लगातार हमलों और सुरक्षा अभियानों के बीच बलूचिस्तान के कई जिलों में पुलिस व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ने की बात सामने आई है।
कुछ इलाकों में रोजमर्रा की कानून-व्यवस्था संभालने के लिए पुलिस को अर्धसैनिक बलों और सेना की सहायता लेनी पड़ रही है।
जब स्थानीय पुलिस बल के लिए किसी क्षेत्र में लगातार सुरक्षा बनाए रखना कठिन हो जाता है, तब अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती आवश्यक हो सकती है। इससे सेना और अर्धसैनिक बलों की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं।
बलूचिस्तान में यही स्थिति सुरक्षा तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर रही है।
पुलिस से लेकर सेना तक बढ़ी जिम्मेदारियां
सामान्य परिस्थितियों में स्थानीय कानून-व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी पुलिस की होती है। लेकिन जब किसी क्षेत्र में सशस्त्र विद्रोह या बड़े पैमाने पर आतंकवादी हिंसा हो, तो सेना और अर्धसैनिक बलों को भी तैनात किया जा सकता है।
बलूचिस्तान में कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था के लिए इन अतिरिक्त बलों पर निर्भरता बढ़ने की जानकारी सामने आई है।
इससे सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनके प्रशिक्षण, उपकरण, खुफिया जानकारी और लॉजिस्टिक क्षमता की आवश्यकता भी बढ़ती है।
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें पाकिस्तान द्वारा पूर्व अफगान सैनिकों को भर्ती किए जाने की खबर सामने आई है।
पूर्व अफगान सैनिकों की भर्ती से पाकिस्तान को तुरंत प्रशिक्षित बल मिल सकता है
पाकिस्तान के नजरिए से देखें तो पूर्व अफगान सैनिकों की भर्ती का एक व्यावहारिक लाभ यह हो सकता है कि बड़ी संख्या में प्रशिक्षित लोगों को अपेक्षाकृत कम समय में सुरक्षा तंत्र में शामिल किया जा सकता है।
इनमें से कई लोगों को हथियार संचालन, गश्त और संघर्ष वाले क्षेत्रों में काम करने का अनुभव पहले से है।
हालांकि, किसी भी सुरक्षा बल में शामिल होने के बाद उन्हें पाकिस्तान की कमांड व्यवस्था, स्थानीय कानूनों और ऑपरेशनल प्रक्रियाओं के अनुरूप प्रशिक्षित करना जरूरी होगा।
इसके अलावा उनकी पृष्ठभूमि की जांच और सुरक्षा संबंधी सत्यापन भी महत्वपूर्ण विषय हो सकते हैं।
इस भर्ती के साथ सुरक्षा संबंधी सवाल भी उठ सकते हैं
पूर्व अफगान सैनिकों का अनुभव पाकिस्तान के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में विदेशी पृष्ठभूमि वाले पूर्व सुरक्षा कर्मियों को राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे में शामिल करना अपने साथ कुछ प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी प्रश्न भी लाता है।
इन लोगों की पहचान, पूर्व सेवा रिकॉर्ड, प्रशिक्षण और संभावित संबद्धताओं का सत्यापन महत्वपूर्ण होगा।
इसके अलावा उन्हें स्थानीय सुरक्षा बलों के साथ किस तरह एकीकृत किया जाता है, उनकी कमांड संरचना क्या होगी और वे किन क्षेत्रों में तैनात किए जाएंगे, ये सभी बातें महत्वपूर्ण होंगी।
इन सवालों के जवाब पाकिस्तान की आगे की नीति और भर्ती व्यवस्था से स्पष्ट हो सकते हैं।
अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा का भी है महत्व
बलूचिस्तान की स्थिति को अफगानिस्तान से अलग करके देखना आसान नहीं है। पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा लंबे समय से सुरक्षा और राजनीतिक तनाव का महत्वपूर्ण क्षेत्र रही है।
अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच संबंधों में भी कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं। वहीं पाकिस्तान में सक्रिय कुछ सशस्त्र संगठनों की गतिविधियों को लेकर भी दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप होते रहे हैं।
ऐसे माहौल में अफगानिस्तान के पूर्व सैनिकों का पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र में शामिल होना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
बलूचिस्तान की समस्या केवल सैन्य चुनौती नहीं
बलूचिस्तान में दशकों से चल रही अस्थिरता का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक, आर्थिक और संसाधनों से जुड़े विवादों से भी जुड़ा रहा है।
क्षेत्र के बलूच संगठनों की शिकायतों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों पर अधिकार, विकास और केंद्र सरकार के साथ संबंध जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं।
इसलिए केवल सुरक्षा अभियान चलाना इस क्षेत्र की सभी समस्याओं का समाधान नहीं माना जा सकता। सुरक्षा के साथ राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर भी संवाद की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि पाकिस्तान सरकार और विभिन्न बलूच संगठनों के बीच इन मुद्दों को लेकर दृष्टिकोण में काफी अंतर रहा है।
चीन-पाकिस्तान परियोजनाओं के कारण भी बलूचिस्तान महत्वपूर्ण
बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण प्रांत है। यहां प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ अरब सागर से जुड़ा ग्वादर बंदरगाह भी स्थित है।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC भी इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। CPEC की कई परियोजनाओं और चीनी नागरिकों की मौजूदगी के कारण बलूचिस्तान की सुरक्षा स्थिति का अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और रणनीतिक महत्व भी है।
बलूच विद्रोही संगठनों ने अतीत में चीनी नागरिकों और चीन से जुड़ी परियोजनाओं को भी निशाना बनाया है। इस वजह से पाकिस्तान के लिए क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
आगे पाकिस्तान के सामने दोहरी चुनौती
एक तरफ पाकिस्तान को बलूचिस्तान में विद्रोही हमलों से निपटना है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय पुलिस और प्रशासन की क्षमता बनाए रखना भी जरूरी है।
यदि सुरक्षा के लिए लगातार सेना और अर्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ती है, तो इससे सामान्य प्रशासन और पुलिसिंग की व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
पूर्व अफगान सैनिकों की भर्ती इस दबाव को कम करने का एक तरीका हो सकती है, लेकिन इससे बलूचिस्तान की व्यापक राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान अपने आप नहीं होगा।
क्या पूर्व अफगान सैनिकों की भर्ती से स्थिति बदलेगी?
पूर्व अफगान सैनिकों को भर्ती करने का फैसला पाकिस्तान को प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की अतिरिक्त संख्या उपलब्ध करा सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाना संभव हो सकता है।
लेकिन बलूचिस्तान में हिंसा के पीछे मौजूद कारण बहुआयामी हैं। विद्रोही संगठनों की गतिविधियां, स्थानीय असंतोष, भौगोलिक परिस्थितियां, सीमा से जुड़े सुरक्षा मुद्दे और राजनीतिक मांगें सभी मिलकर स्थिति को प्रभावित करते हैं।
इसलिए इस भर्ती का वास्तविक प्रभाव केवल आने वाले समय में सुरक्षा घटनाओं और प्रशासनिक क्षमता के आधार पर समझा जा सकेगा।

