Brij Bhushan Sharan Singh की बरी होने की कहानी में फिर आया बड़ा मोड़, 4 महिला पहलवानों ने कोर्ट में दी चुनौती; 26 सितंबर को सुनवाई, जानिए पूरा मामला
News-Desk
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महिला पहलवानों ने शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में अपील दाखिल कर एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) के 3 अगस्त 2026 के फैसले को चुनौती दी। इस अपील में केवल बृजभूषण शरण सिंह ही नहीं, बल्कि मामले में सह-आरोपी रहे तत्कालीन WFI सहायक सचिव विनोद तोमर को बरी किए जाने के फैसले को भी चुनौती दी गई है।
मामले की सुनवाई 26 सितंबर 2026 को विशेष न्यायाधीश दिग्विनय सिंह के समक्ष होने की संभावना है। हालांकि अंतिम कार्यवाही अदालत की सूची और आदेश के अनुसार ही स्पष्ट होगी।
यानी 3 अगस्त को जब अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को राहत दी थी, उसके बाद मामला खत्म नहीं हुआ। महिला पहलवानों ने अब उस आदेश की न्यायिक समीक्षा की मांग की है।
महिला पहलवानों ने फैसले में किन बातों पर उठाए सवाल?
अपील में महिला पहलवानों ने निचली अदालत के फैसले को कई आधारों पर चुनौती दी है। उनकी ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का चयनात्मक और गलत तरीके से मूल्यांकन किया।
याचिका में फैसले की भाषा और तर्क के कुछ हिस्सों को ‘archaic and stereotypical assumptions’, यानी पुरानी और रूढ़िबद्ध धारणाओं पर आधारित बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि यौन उत्पीड़न या यौन हिंसा की शिकायत करने वाली महिला के व्यवहार को लेकर कोई एक तय पैटर्न नहीं माना जा सकता।
महिला पहलवानों की दलील है कि किसी पीड़िता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि घटना के बाद वह समाज या अदालत की कल्पना के मुताबिक ही व्यवहार करेगी। उनके अनुसार, घटना के बाद शिकायत दर्ज कराने में देरी, किसी व्यक्ति का सामान्य व्यवहार जारी रखना या अलग परिस्थितियों में प्रतिक्रिया देना अपने आप में शिकायत को अविश्वसनीय साबित नहीं करता।
यही मुद्दा अब अपील का एक अहम हिस्सा बन गया है।
3 अगस्त को निचली अदालत ने क्या फैसला सुनाया था?
3 अगस्त 2026 को राउज एवेन्यू कोर्ट की ACJM अश्विनी पंवार की अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह को महिला पहलवानों से जुड़े मामले में बरी कर दिया था। अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों को आपराधिक कानून के निर्धारित मानक के अनुसार साबित नहीं माना।
बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ IPC की धारा 354, 354A और 506 (भाग-I) के तहत आरोपों पर मुकदमा चला था। वहीं, विनोद तोमर को आपराधिक धमकी से जुड़े आरोप से राहत मिली थी।
अदालत के आदेश में गवाहों के बयानों में कुछ विरोधाभासों का भी उल्लेख किया गया था। बाद में सामने आए फैसले के विवरण में अदालत की ओर से कथित घटनाओं के स्थान और वर्ष से जुड़े बयानों में बदलाव को अभियोजन के मामले के लिए गंभीर माना गया था।
इसका सीधा अर्थ यह है कि निचली अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर अभियोजन की कहानी को आपराधिक दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना।
अब महिला पहलवान इसी न्यायिक निष्कर्ष को अपील के जरिए चुनौती दे रही हैं।
चार महिला पहलवानों की अपील से फिर चर्चा में आया पूरा मामला
महिला पहलवानों की ओर से दायर अपील के साथ तीन साल से अधिक समय से चर्चा में रहा यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है।
2023 में जब महिला पहलवानों ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए थे, तब मामला केवल अदालत और पुलिस की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा था। पहलवानों ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन किए और मामले में FIR तथा कार्रवाई की मांग को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी आवाज उठाई।
उस समय बृजभूषण शरण सिंह भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष थे। बाद में पुलिस जांच हुई और जून 2023 में दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की।
2024 में अदालत ने आरोप तय किए और इसके बाद मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ी। आखिरकार 3 अगस्त 2026 को निचली अदालत ने बृजभूषण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया।
अब अपील ने मामले को एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंचा दिया है।
दिल्ली पुलिस ने किन धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की थी?
इस मामले में दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
पुलिस की चार्जशीट में IPC की धारा 354, 354A, 354D और 506(1) शामिल थीं। इन धाराओं का संबंध महिला की गरिमा भंग करने, यौन उत्पीड़न, पीछा करने यानी स्टॉकिंग और आपराधिक धमकी से था।
वहीं, विनोद तोमर के खिलाफ IPC की धारा 506(1) के अलावा धारा 109 भी लगाई गई थी।
बाद में अदालत ने आरोप तय किए और मुकदमा चला। हालांकि आपराधिक मुकदमे में पुलिस की चार्जशीट या आरोप तय होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं होता। किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और लागू कानूनी मानकों के आधार पर तय होती है।
इसी प्रक्रिया के तहत निचली अदालत ने 3 अगस्त को दोनों आरोपियों को बरी किया था।
2016 से 2019 के बीच की कथित घटनाओं का भी मामले में उल्लेख
मामले की सुनवाई के दौरान जिन कथित घटनाओं का उल्लेख हुआ, उनके संबंध में अलग-अलग स्थानों और समय का जिक्र सामने आया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शिकायतों में कथित घटनाओं को 2016 से 2019 के बीच का बताया गया था। आरोपों से जुड़े स्थानों में WFI कार्यालय, बृजभूषण शरण सिंह का आधिकारिक आवास और विदेशों में हुई कुछ घटनाओं का उल्लेख भी सामने आया।
हालांकि, इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोपों और अदालत द्वारा स्थापित तथ्यों को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। महिला पहलवानों ने गंभीर आरोप लगाए, पुलिस ने जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की, अदालत ने आरोपों पर मुकदमा चलाया और बाद में निचली अदालत ने अभियोजन के मामले को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना।
अब अपील अदालत के सामने सवाल यह होगा कि निचली अदालत का यह निष्कर्ष कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप था या नहीं।
नाबालिग पहलवान से जुड़े POCSO मामले का भी रहा अलग ट्रैक
इस पूरे विवाद में एक नाबालिग महिला पहलवान से जुड़ा POCSO मामला भी सामने आया था।
बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ नाबालिग पहलवान की ओर से दर्ज मामले में दिल्ली पुलिस ने बाद में क्लोजर/कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की थी।
POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने वाला विशेष कानून है। इस मामले की पुलिस कार्रवाई मुख्य यौन उत्पीड़न मुकदमे से अलग कानूनी प्रक्रिया थी।
इसलिए दोनों मामलों को एक ही न्यायिक परिणाम के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। मुख्य मामले में वयस्क महिला पहलवानों की शिकायतों से संबंधित मुकदमा चला, जबकि नाबालिग पहलवान से संबंधित मामला POCSO कानून के तहत अलग प्रक्रिया से गुजरा।
बरी होने के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने क्या कहा था?
3 अगस्त 2026 को अदालत का फैसला आने के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने इसे अपने लिए खुशी का दिन बताया था।
उन्होंने कहा था, “मेरे लिए खुशी का दिन है। होइहि सोइ जो राम रचि राखा।”
उनकी प्रतिक्रिया में अदालत के फैसले पर संतोष साफ दिखाई दिया। बृजभूषण शरण सिंह ने इससे पहले भी आरोपों से इनकार किया था और अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं किया था।
फैसले के बाद उनके समर्थकों की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई थी। उनके बेटे करण भूषण सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा था—“साजिश हुई नाकाम, सत्य की हुई जीत। पिताजी बाइज्जत बरी हुए। सत्यमेव जयते!”
यह बृजभूषण पक्ष की प्रतिक्रिया थी। दूसरी तरफ शिकायतकर्ता महिला पहलवानों ने फैसले से असहमति जताई।
WFI अध्यक्ष संजय कुमार सिंह ने भी फैसले पर जताई थी खुशी
अदालत के फैसले के बाद WFI अध्यक्ष संजय कुमार सिंह ने भी बृजभूषण शरण सिंह के पक्ष में प्रतिक्रिया दी थी।
उन्होंने कहा था कि बृजभूषण पर लगाए गए आरोप झूठे थे और अदालत द्वारा उन्हें सम्मानपूर्वक बरी किए जाने के बाद कुश्ती जगत में खुशी का माहौल है।
यह बयान भी मामले में बृजभूषण पक्ष की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया था। अब महिला पहलवानों की अपील दाखिल होने के बाद अदालत में इस मामले का एक और चरण शुरू हो गया है।
विनेश फोगाट ने फैसले के बाद कहा था—उम्मीद नहीं छोड़ी
निचली अदालत के फैसले पर पहलवान विनेश फोगाट ने भी सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी थी।
उन्होंने कहा था कि महिला पहलवानों को प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज कराने के लिए काफी साहस जुटाना पड़ा। उन्होंने अपने बयान में यह आरोप भी लगाया था कि प्रभाव और दबाव के कारण कई लड़कियों ने अपने नाम वापस लिए, जबकि कुछ महिला पहलवान अपनी शिकायतों के साथ खड़ी रहीं।
विनेश ने अदालत के फैसले पर निराशा जताई थी और कहा था कि महिला पहलवानों की कानूनी लड़ाई जारी रहेगी। अगस्त में ही उन्होंने फैसले को चुनौती देने की बात कही थी।
अब चार महिला पहलवानों की ओर से अपील दाखिल होने के बाद उनके उस रुख को कानूनी कार्रवाई का रूप मिल गया है।
अपील में ‘पीड़िता के व्यवहार’ को लेकर क्या बहस है?
इस मामले की नई कानूनी बहस का एक संवेदनशील हिस्सा यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली महिलाओं के व्यवहार से संबंधित है।
महिला पहलवानों का कहना है कि अदालत को यह तय करने के लिए किसी रूढ़िबद्ध धारणा का सहारा नहीं लेना चाहिए कि कथित यौन हिंसा के बाद एक महिला को किस तरह प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
याचिका में इसी आधार पर निचली अदालत के कुछ निष्कर्षों को चुनौती दी गई है। महिला पहलवानों के मुताबिक, फैसला घटनाओं और साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बजाय पीड़िताओं से अपेक्षित व्यवहार की एक निश्चित धारणा पर आधारित था।
यह कानूनी सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यौन अपराधों के मामलों में शिकायत करने वाले व्यक्ति की परिस्थितियां, समय, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत स्थिति अलग-अलग हो सकती हैं।
हालांकि, इस तर्क को स्वीकार या अस्वीकार करने का अंतिम निर्णय अपील अदालत की न्यायिक समीक्षा के बाद ही सामने आएगा।
निचली अदालत के फैसले और अपील के बीच क्या अंतर समझना जरूरी है?
इस मामले में एक बात स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है—बरी किया जाना और आरोप झूठे साबित होना हमेशा एक ही कानूनी बात नहीं होती।
निचली अदालत ने आपराधिक मुकदमे में अभियोजन द्वारा आरोपों को आवश्यक कानूनी मानक के तहत साबित न कर पाने के आधार पर आरोपियों को बरी किया।
वहीं, महिला पहलवानों की अपील उस निर्णय की समीक्षा की मांग कर रही है। उनका कहना है कि अदालत ने साक्ष्यों का मूल्यांकन गलत तरीके से किया और कुछ निष्कर्ष ऐसे आधारों पर निकाले जो उनकी नजर में कानूनन टिकाऊ नहीं हैं।
अब अपील अदालत के सामने निचली अदालत के रिकॉर्ड और अपील में उठाए गए आधारों को देखने का अवसर होगा।
26 सितंबर की सुनवाई क्यों है महत्वपूर्ण?
25 सितंबर को अपील दाखिल होने के बाद अब 26 सितंबर 2026 की संभावित सुनवाई पर नजरें टिक गई हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, मामला राउज एवेन्यू कोर्ट में विशेष न्यायाधीश दिग्विनय सिंह के समक्ष आ सकता है।
सुनवाई के शुरुआती चरण में अदालत अपील की स्वीकार्यता, रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों की दलीलों से जुड़े procedural मुद्दों पर विचार कर सकती है। आगे की कार्यवाही अदालत के आदेश पर निर्भर करेगी।
इस स्तर पर यह कहना उचित नहीं होगा कि अपील का परिणाम क्या होगा। अदालत के सामने दोनों पक्षों के कानूनी तर्क और निचली अदालत का पूरा रिकॉर्ड होगा।
कुश्ती जगत में इस मामले का असर क्यों रहा इतना बड़ा?
बृजभूषण शरण सिंह से जुड़ा यह विवाद भारतीय कुश्ती के इतिहास के सबसे चर्चित प्रशासनिक और कानूनी विवादों में से एक रहा है।
महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों ने खेल प्रशासन में महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा, शिकायत निवारण व्यवस्था और खेल महासंघों की जवाबदेही जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।
दूसरी ओर, बृजभूषण शरण सिंह ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया और कानूनी प्रक्रिया का सामना किया।
इस मामले ने यह भी दिखाया कि खेल संस्थानों में किसी भी गंभीर शिकायत के बाद पुलिस जांच, चार्जशीट, ट्रायल और अपील जैसी न्यायिक प्रक्रियाएं कितनी लंबी हो सकती हैं।
महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा पर भी उठे कई सवाल
मामले की कानूनी यात्रा ने महिला खिलाड़ियों के लिए सुरक्षित खेल वातावरण की आवश्यकता पर भी ध्यान खींचा।
खेल में खिलाड़ी अक्सर कोच, महासंघ के पदाधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ ऐसी संरचना में काम करते हैं जहां पद और अधिकार का अंतर काफी स्पष्ट होता है। ऐसी परिस्थितियों में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया पारदर्शी और भरोसेमंद होना महत्वपूर्ण माना जाता है।
महिला खिलाड़ियों को किसी भी प्रकार की शिकायत रखने के लिए सुरक्षित माध्यम उपलब्ध होना चाहिए और शिकायतों की जांच निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।
इस मामले में अदालत का अंतिम निर्णय जो भी हो, खेल संस्थाओं में शिकायतों की निष्पक्ष जांच और खिलाड़ियों की सुरक्षा का मुद्दा व्यापक महत्व रखता है।
क्या बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मामला फिर से चलेगा?
फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
चार महिला पहलवानों ने बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी है। अब अपील अदालत यह देखेगी कि याचिका और रिकॉर्ड के आधार पर आगे किस प्रकार की न्यायिक कार्रवाई आवश्यक है।
अपील दाखिल होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि निचली अदालत का फैसला पलट दिया गया है। इसी तरह, निचली अदालत का बरी करने का फैसला भी अपील के दौरान न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं होता।
आगे की स्थिति अदालत के आदेश पर निर्भर करेगी।
यही वजह है कि इस समय मामले को “बरी होने के खिलाफ अपील” के रूप में रिपोर्ट करना ज्यादा सटीक है, न कि किसी आरोपी की दोषसिद्धि या दोषमुक्ति के अंतिम परिणाम के रूप में।
बृजभूषण शरण सिंह केस की आगे की राह
अब इस मामले में दो बातें विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहेंगी। पहली, अपील अदालत निचली अदालत के 3 अगस्त के फैसले को किस कानूनी दृष्टिकोण से देखती है। दूसरी, महिला पहलवानों द्वारा साक्ष्यों के मूल्यांकन और पीड़िताओं के व्यवहार से जुड़े जो सवाल उठाए गए हैं, उन पर अदालत क्या रुख अपनाती है।
मामला कई वर्षों से कानूनी प्रक्रिया में है। 2023 में आरोपों और विरोध प्रदर्शनों से शुरू हुई यह कहानी चार्जशीट, आरोप तय होने, गवाहियों और ट्रायल से होते हुए 3 अगस्त 2026 के बरी किए जाने के आदेश तक पहुंची।
अब सितंबर 2026 में दाखिल अपील ने इसे एक बार फिर अदालत के सामने ला खड़ा किया है।
राजनीति से लेकर खेल तक, मामले ने खींचा था देश का ध्यान
बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक प्रभाव और उनका WFI अध्यक्ष पद इस पूरे मामले की सार्वजनिक चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। महिला पहलवानों के आंदोलन में राजनीतिक दलों और सार्वजनिक हस्तियों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई थीं।
हालांकि, अदालत में किसी मामले का फैसला राजनीतिक बयानों से नहीं बल्कि साक्ष्यों और कानून के आधार पर होता है। इसलिए मौजूदा अपील में भी अदालत का ध्यान रिकॉर्ड और कानूनी दलीलों पर रहेगा।
इस मामले को लेकर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं, लेकिन न्यायिक रूप से आगे की स्थिति अदालत के आदेश से ही स्पष्ट होगी।
अब सबकी नजर 26 सितंबर पर
चार महिला पहलवानों द्वारा बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर के बरी होने के फैसले को चुनौती दिए जाने के बाद मामले ने एक बार फिर देश का ध्यान खींचा है।
3 अगस्त का फैसला जहां बृजभूषण शरण सिंह के लिए बड़ी कानूनी राहत लेकर आया था, वहीं 25 सितंबर को दाखिल अपील ने उस फैसले की समीक्षा की मांग सामने रख दी है।
महिला पहलवानों ने अपनी याचिका में निचली अदालत के साक्ष्य मूल्यांकन, पीड़िताओं के व्यवहार से जुड़ी धारणाओं और फैसले के कानूनी आधारों पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, निचली अदालत का फैसला यह था कि अभियोजन आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।
अब आगे की कानूनी दिशा अदालत की सुनवाई और आदेशों से तय होगी। 26 सितंबर की संभावित सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी के जरिए इस अपील की अगली राह स्पष्ट हो सकती है।

