SN Medical College से भागा उम्रकैद का कैदी, 4 सिपाहियों पर था शक; अदालत ने कहा- लापरवाही हुई, मिलीभगत साबित नहीं, चारों बरी
News-Desk
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agra court, agra news, Court Verdict, crime news, latest up news, prisoner escape, SN Medical College, up police, uttar pradesh newsआगरा के SN Medical College से वर्ष 2015 में उम्रकैद की सजा काट रहा एक कैदी फरार हो गया था। उस समय उसकी सुरक्षा में तैनात चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। करीब 11 साल बाद इस मामले में अदालत ने फैसला सुनाते हुए चारों पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि कैदी के फरार होने की घटना में पुलिसकर्मियों की ओर से लापरवाही जरूर सामने आती है, लेकिन उसे जानबूझकर भगाने या उसके साथ आपराधिक मिलीभगत करने का कोई पुख्ता सबूत अभियोजन पक्ष पेश नहीं कर सका।
अपर सत्र न्यायाधीश न्यायालय संख्या-23 अमित कुमार यादव ने मामले की सुनवाई के बाद चारों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या सुरक्षाकर्मियों की लापरवाही को आपराधिक साजिश या जानबूझकर कैदी को भगाने में मदद करने के बराबर माना जा सकता है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने इसका जवाब नकारात्मक माना।
2015 में एसएन मेडिकल कॉलेज से फरार हुआ था कैदी
यह घटना 24 जून 2015 की है। मथुरा के राधा निवास हैजा निवासी सीटी लाला उर्फ गोपाल हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा था। स्वास्थ्य संबंधी समस्या के चलते उसे आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज के सर्जिकल वार्ड में भर्ती कराया गया था।
अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी चार पुलिसकर्मियों को दी गई थी। इनमें कांस्टेबल सतेंद्र सिंह, पवन कुमार, सुशील कुमार और अनिल कुमार शामिल थे। पुलिसकर्मी अस्पताल में कैदी की निगरानी के लिए तैनात थे।
24 जून को दोपहर करीब एक बजे कैदी अस्पताल से फरार हो गया। घटना की जानकारी सामने आने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। कैदी की सुरक्षा में तैनात चारों पुलिसकर्मियों की भूमिका पर सवाल उठे और मामले में उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई।
प्रतिसार निरीक्षक प्रथम परशुराम सिंह की तहरीर पर थाना एमएम गेट में चारों पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोप यह था कि सुरक्षा में तैनाती के बावजूद कैदी अस्पताल से भागने में सफल रहा और पुलिसकर्मी अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे।
अभियोजन ने पेश किए 9 गवाह, लेकिन नहीं मिला निर्णायक सबूत
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से वादी और डॉक्टरों सहित कुल नौ गवाह अदालत में पेश किए गए। अभियोजन का प्रयास था कि गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर यह साबित किया जाए कि पुलिसकर्मियों की भूमिका महज लापरवाही तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने जानबूझकर कैदी को फरार होने में मदद की थी।
हालांकि, जिरह के दौरान अभियोजन का यह पक्ष कमजोर पड़ गया। वादी ने अदालत में यह स्वीकार किया कि पुलिसकर्मियों की कैदी के साथ मिलीभगत होने की कोई जानकारी सामने नहीं आई थी। उसके बयान में सुरक्षाकर्मियों की लापरवाही की बात तो रही, लेकिन आपराधिक साजिश या जानबूझकर मदद करने का ठोस आधार नहीं मिला।
यही अंतर इस मामले के फैसले में महत्वपूर्ण साबित हुआ। अदालत के सामने यह साबित करना जरूरी था कि चारों पुलिसकर्मियों ने केवल अपनी ड्यूटी में लापरवाही नहीं की, बल्कि जानबूझकर कैदी को भागने का अवसर दिया या उसे भागने में सहायता की।
डॉक्टरों की गवाही से भी अभियोजन का आरोप कमजोर हुआ
मामले में एसएन मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर डॉ. चंद्र प्रकाश पाल और डॉ. अश्वनी सिंह की गवाही भी महत्वपूर्ण रही। डॉक्टरों के बयान से अभियोजन की उस कहानी को अपेक्षित मजबूती नहीं मिली, जिसके आधार पर पुलिसकर्मियों की आपराधिक भूमिका साबित की जा सके।
एक डॉक्टर ने कैदी के फरार होने की सूचना दिए जाने की पुष्टि की। इससे अभियोजन के उस आरोप को भी मजबूती नहीं मिली कि घटना को जानबूझकर छिपाने का प्रयास किया गया था।
बचाव पक्ष की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि घटना वाले दिन कैदी का ऑपरेशन होना था। उसे ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया था और सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों को बाहर रहने के लिए कहा गया था। ऐसे में यह संभावना भी बनी रही कि कैदी ने अस्पताल के भीतर डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ की मौजूदगी का फायदा उठाकर सुरक्षाकर्मियों को चकमा दिया हो।
इस परिस्थिति ने अभियोजन के लिए यह साबित करना और मुश्किल कर दिया कि पुलिसकर्मियों ने सुनियोजित तरीके से कैदी को भगाने में सहायता की थी।
अदालत ने कहा- लापरवाही और आपराधिक मिलीभगत अलग-अलग बातें
अदालत ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर को रेखांकित किया। कैदी की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की ओर से लापरवाही होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उन्होंने जानबूझकर कैदी को फरार कराया।
अभियोजन को यह साबित करना था कि आरोपियों ने जानबूझकर अपने कर्तव्य का उल्लंघन किया और कैदी को भागने में सहायता दी। इसके लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक थे। अदालत के सामने ऐसा कोई निर्णायक साक्ष्य नहीं आया जिससे चारों पुलिसकर्मियों की आपराधिक मिलीभगत साबित हो सके।
अदालत ने माना कि घटना में सुरक्षा संबंधी लापरवाही का पहलू मौजूद था, लेकिन आपराधिक दोष सिद्ध करने के लिए केवल लापरवाही पर्याप्त नहीं है।
धारा 222 आईपीसी के आरोप पर भी नहीं मिली सजा की पर्याप्त जमीन
मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 222 से जुड़े आरोप लगाए गए थे। अदालत ने इस प्रावधान के संदर्भ में भी कहा कि अभियोजन को केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं था कि कैदी पुलिस हिरासत या सुरक्षा व्यवस्था से निकल गया। यह भी प्रमाणित करना जरूरी था कि संबंधित पुलिसकर्मियों ने उसे जानबूझकर भागने दिया या उसके फरार होने में सहायता की।
अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों में ऐसा ठोस प्रमाण नहीं मिला। गवाहों के बयान भी आरोपों को उस स्तर तक नहीं ले जा सके, जहां आपराधिक दोष को संदेह से परे साबित किया जा सके।
इसी आधार पर अदालत ने चारों पुलिसकर्मियों को संदेह का लाभ दिया और उन्हें बरी कर दिया।
विभागीय लापरवाही पर हो सकती है कार्रवाई, लेकिन आपराधिक सजा के लिए चाहिए ठोस सबूत
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने पुलिसकर्मियों की ड्यूटी में लापरवाही के पहलू को पूरी तरह खारिज नहीं किया। लेकिन अदालत ने यह स्पष्ट किया कि विभागीय स्तर की लापरवाही और आपराधिक अपराध के लिए आवश्यक साक्ष्य एक समान नहीं होते।
यदि कोई पुलिसकर्मी अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही करता है तो उसके खिलाफ विभागीय स्तर पर कार्रवाई का प्रावधान हो सकता है। लेकिन आपराधिक मुकदमे में सजा देने के लिए अभियोजन को आरोप को आवश्यक कानूनी मानक के अनुसार साबित करना पड़ता है।
इस मामले में अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि चारों पुलिसकर्मियों ने जानबूझकर उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी को फरार होने में मदद की थी। इसी वजह से अदालत ने उन्हें दोषी ठहराने के बजाय संदेह का लाभ देना उचित माना।
11 साल बाद आया फैसला, कैदी के फरार होने की घटना फिर चर्चा में
एसएन मेडिकल कॉलेज से उम्रकैद के कैदी के फरार होने की यह घटना वर्ष 2015 में हुई थी। उस समय सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठे थे और इसी आधार पर मुकदमा दर्ज किया गया था। अब लंबे समय बाद अदालत ने मामले में चारों पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया है।
फैसले से यह स्पष्ट होता है कि किसी कैदी का सुरक्षा व्यवस्था से फरार हो जाना अपने आप में सुरक्षाकर्मियों की आपराधिक मिलीभगत साबित नहीं करता। अदालत ने उपलब्ध गवाहियों और साक्ष्यों को देखते हुए यह माना कि लापरवाही का पहलू हो सकता है, लेकिन जानबूझकर कैदी को भगाने का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ।

