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Bangladesh Central Bank गवर्नर विवाद: मोस्ताकुर रहमान की नियुक्ति पर सियासी भूचाल, डिफाल्टर कारोबारी पर उठे सवाल

Bangladesh Central Bank Governor controversy ने देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को एक साथ झकझोर दिया है। बांग्लादेश बैंक के नए गवर्नर के रूप में मोस्ताकुर रहमान की नियुक्ति के बाद राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। विपक्ष का आरोप है कि यह फैसला योग्यता से अधिक राजनीतिक निष्ठा के आधार पर लिया गया है, जिससे देश की सर्वोच्च बैंकिंग संस्था की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।


🔴 विपक्ष का आरोप: ‘डिफाल्टर को बनाया गवर्नर’

विपक्षी दलों ने दावा किया है कि मोस्ताकुर रहमान एक सक्रिय कारोबारी रहे हैं और उनकी कंपनी पर पुराने कर्ज से जुड़े सवाल हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में उल्लेख किया गया है कि उनकी कंपनी पर 86 करोड़ टका का कर्ज समय पर नहीं चुकाने का मामला सामने आया था।

जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख और विपक्ष के नेता शफीकुर रहमान ने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि बांग्लादेश बैंक में जो हो रहा है, वह पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि जब अर्थव्यवस्था पहले से दबाव में है, तब केंद्रीय बैंक जैसे संस्थान में राजनीतिक हस्तक्षेप देश को और कमजोर कर सकता है।


🔴 तारिक रहमान सरकार पर निशाना

विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह नियुक्ति प्रधानमंत्री तारिक रहमान की शह पर की गई है। आलोचकों का कहना है कि यह कदम ‘भीड़तंत्र’ की ओर बढ़ने जैसा है, जहां संस्थागत प्रक्रियाओं की जगह राजनीतिक प्रभाव को तरजीह दी जा रही है।


🔴 गारमेंट कारोबारी से गवर्नर तक

मोस्ताकुर रहमान पेशे से कॉस्ट एंड मैनेजमेंट अकाउंटेंट और गारमेंट उद्योग से जुड़े कारोबारी हैं। वे हेरा स्वेटर्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर रहे हैं। हालिया चुनाव में वे BNP की केंद्रीय चुनाव संचालन समिति से भी जुड़े थे।

अब तक बांग्लादेश में केंद्रीय बैंक का गवर्नर आमतौर पर अनुभवी अर्थशास्त्री, वरिष्ठ सिविल सेवक या बैंकिंग विशेषज्ञ होते रहे हैं। ऐसे में किसी सक्रिय कारोबारी की नियुक्ति को लेकर हितों के टकराव की आशंका जताई जा रही है।

ढाका विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर दीन इस्लाम ने कहा कि इस तरह की नियुक्ति गलत संदेश देती है और बैंकिंग सिस्टम की निष्पक्षता पर सवाल उठाती है।


🔴 अहसान हबीब मंसूर की बर्खास्तगी से भड़का विवाद

Bangladesh Central Bank Governor controversy की दूसरी बड़ी वजह पूर्व गवर्नर अहसान हबीब मंसूर को हटाया जाना है। मंसूर को 2024 में चार साल के कार्यकाल के लिए नियुक्त किया गया था और उनका कार्यकाल अगस्त 2028 तक था।

हालांकि 18 महीने से भी कम समय में उनका कार्यकाल समाप्त कर दिया गया। मंसूर ने कहा कि उन्होंने न तो इस्तीफा दिया और न ही उन्हें हटाए जाने की कोई आधिकारिक सूचना मिली। उन्हें यह खबर मीडिया के माध्यम से पता चली।


🔴 आर्थिक सुधारों का रिकॉर्ड

मंसूर को ऐसे समय जिम्मेदारी दी गई थी, जब 2024 में राजनीतिक बदलाव के बाद देश आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा था। उनके कार्यकाल के दौरान फॉरेन करेंसी रिजर्व 26 अरब डॉलर से बढ़कर 35 अरब डॉलर तक पहुंचा।

उन्होंने टका को 122.20 प्रति डॉलर के स्तर पर स्थिर करने की नीति अपनाई और महंगाई दर को 10.49% से घटाकर जनवरी 2026 में 8.58% तक लाने में भूमिका निभाई।

ढाका स्थित HSBC के डायरेक्टर शाहीर चौधरी ने लिखा कि मंसूर ने बेहद कठिन दौर में बैंकिंग सिस्टम में भरोसा बहाल किया। उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें पूरा कार्यकाल न देना निराशाजनक है।


🔴 IMF अनुभव और प्रशासनिक पृष्ठभूमि

मंसूर को 27 साल का अंतरराष्ट्रीय अनुभव है और वे IMF जैसी संस्थाओं में कार्य कर चुके हैं। उनकी नियुक्ति अंतरिम सरकार के समय हुई थी, जिसका नेतृत्व मोहम्मद यूनुस कर रहे थे।

उनकी बर्खास्तगी से कई अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों में चिंता बढ़ी है कि क्या केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता प्रभावित हो रही है।


🔴 NCP और अन्य दलों की प्रतिक्रिया

NCP नेता नाहिद इस्लाम ने आरोप लगाया कि मंसूर को हटाकर सरकार ने वित्तीय क्षेत्र में अव्यवस्था का रास्ता खोल दिया है। उन्होंने कहा कि मंसूर ने बैंकिंग अनुशासन बहाल किया था और अब एक कारोबारी को शीर्ष पद पर बैठाना जोखिम भरा हो सकता है।


🔴 क्या दांव पर है?

Bangladesh Central Bank Governor controversy केवल एक नियुक्ति का मामला नहीं है। यह देश की आर्थिक स्थिरता, बैंकिंग पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।

यदि केंद्रीय बैंक पर राजनीतिक प्रभाव का आरोप गहराता है, तो विदेशी निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे समय में जब बांग्लादेश वैश्विक आर्थिक दबावों का सामना कर रहा है, केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।


बांग्लादेश में सेंट्रल बैंक गवर्नर को लेकर छिड़ा यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराने के संकेत दे रहा है। एक ओर सरकार अपने फैसले को वैध ठहरा रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष और आर्थिक विशेषज्ञ इसे संस्थागत संतुलन के लिए खतरा बता रहे हैं। देश की आर्थिक दिशा और बैंकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता अब इस बहस के केंद्र में है।

 

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