Delhi- रोहिणी शेल्टर होम में 14 मानसिक रोगी बच्चों की मौत के मामले में राजनीति तेज, मंत्री सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया
Delhiदिल्ली के रोहिणी स्थित आशा किरण शेल्टर होम में 20 दिनों के भीतर 14 मानसिक रोगी बच्चों की मौत के मामले ने राजधानी की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। यह मामला अब सिर्फ प्रशासनिक चूक का नहीं रहा, बल्कि दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बन गया है।
यह वही अफसर है जिसे भ्रष्टाचार के मामले में साल 2016 में सीबीआई ने रिश्वत लेते रंगे हाथों अरेस्ट किया था. इसके बाद एलजी दफ्तर की तरफ से ट्रांसफर पोस्टिंग को लेकर गुमराह करने का आरोप लगाया गया. भारद्वाज ने फिर पलटवार करते हुए कहा कि एलजी दफ्तर झूठ बोल रहा है.
सौरभ भारद्वाज ने दावा किया कि शेल्टर होम के अफसर राहुल अग्रवाल को 2016 में सीबीआई ने रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था और पांच साल के लिए निलंबित कर दिया था. भारद्वाज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “मैं जानना चाहता हूं कि किस आधार पर एलजी ने राहुल अग्रवाल को शेल्टर होम का अधिकारी नियुक्त किया था. इस नियुक्ति के चलते वहां 14 मानसिक रूप से कमजोर लोगों की मौत के बाद विभिन्न अनियमितताएं और खामियां सामने आई हैं.”
#WATCH | Deaths at Asha Kiran shelter home in Delhi: Delhi Minister Saurabh Bhardwaj says, “…The people who were kept in that shelter home were mentally weak…In such a situation, it becomes very important to take care of them and it is very important for the caretaker to… pic.twitter.com/pgwaULGvtc
— ANI (@ANI) August 3, 2024
आरोपों की जंग: कौन है जिम्मेदार?
दिल्ली सरकार के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने इस मामले को लेकर उपराज्यपाल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भारद्वाज का कहना है कि जिस अफसर पर आशा किरण की देखरेख की जिम्मेदारी थी, उसकी नियुक्ति उपराज्यपाल (LG) ने की थी। यह वही अफसर राहुल अग्रवाल हैं जिन्हें 2016 में सीबीआई ने रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था और उन्हें पांच साल के लिए निलंबित कर दिया गया था। भारद्वाज ने सवाल उठाते हुए कहा, “मैं जानना चाहता हूं कि किस आधार पर एलजी ने राहुल अग्रवाल को शेल्टर होम का अधिकारी नियुक्त किया था।”
एलजी कार्यालय की प्रतिक्रिया
उपराज्यपाल कार्यालय ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि भारद्वाज के आरोप बेबुनियाद हैं और सच्चाई से परे हैं। उन्होंने कहा कि शेल्टर होम की देखरेख की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार की है और उनकी नियुक्ति प्रक्रिया में उपराज्यपाल का कोई हाथ नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार इस मामले में अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए झूठ का सहारा ले रही है।
बच्चों की मौत: अनदेखी और अनियमितताओं का नतीजा
आशा किरण शेल्टर होम में बच्चों की मौत के मामले में कई अनियमितताएं और खामियां सामने आई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, शेल्टर होम में बच्चों की देखभाल में भारी लापरवाही बरती गई। यहां तक कि मानसिक रोगी बच्चों की देखभाल के लिए उचित सुविधाओं और विशेषज्ञ स्टाफ की कमी थी। इसके अलावा, बच्चों को सही समय पर इलाज नहीं मिल पाया और उनकी हालत बिगड़ती चली गई।
राजनीति का प्रभाव
इस मामले ने दिल्ली की राजनीतिक परिस्थिति को और भी जटिल बना दिया है। एक ओर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर आम जनता में भी इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि प्रशासन की लापरवाही और भ्रष्टाचार के चलते मासूम बच्चों की जान चली गई, जिसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
नैतिक और सामाजिक मुद्दे
इस घटना ने न केवल प्रशासनिक बल्कि नैतिक और सामाजिक मुद्दों को भी उजागर किया है। मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की देखभाल के लिए उचित व्यवस्था न होना और उनके साथ अमानवीय व्यवहार समाज के लिए एक गंभीर चुनौती है। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी सामाजिक संरचना और व्यवस्थाएं कितनी असंवेदनशील हो सकती हैं।
भविष्य की दिशा
इस घटना के बाद उम्मीद की जा रही है कि दिल्ली सरकार और प्रशासन इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेंगे और ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाएंगे। बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर काम करना होगा।
आशा किरण शेल्टर होम में बच्चों की मौत का मामला दिल्ली की राजनीति और प्रशासनिक तंत्र की विफलताओं का प्रतीक बन गया है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं और हमें क्या कदम उठाने चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं भविष्य में न हों। प्रशासनिक पारदर्शिता, जिम्मेदारी और नैतिकता की पुनर्स्थापना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत.

