IMF का 1.2 बिलियन डॉलर पैकेज: पाकिस्तान फिर कर्ज़ की बैसाखियों पर, अमेरिका–भारत–IMF समीकरणों से गरमाती अंतरराष्ट्रीय राजनीति
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था एक बार फिर आक्सीजन सिलेंडर पर टिकी हुई है और इसी बीच IMF funding को लेकर बड़ा फैसला आया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और IMF चीफ क्रिस्टलीना जॉर्जीवा की बैठकों और बातचीतों के बाद इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने पाकिस्तान को 1.2 बिलियन डॉलर का नया फंड जारी करने की मंजूरी दे दी है।
इसमें—
1 बिलियन डॉलर का कर्ज, और
200 मिलियन डॉलर की क्लाइमेट फैसिलिटी सहायता शामिल है।
IMF का यह पैकेज उस बहुचर्चित 7 बिलियन डॉलर वाले बेलआउट प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान 2024 से किसी ‘जादुई दौर’ की तरह पकड़े हुए है। यह उसकी तीसरी किस्त है, जो दूसरी किस्त के रिव्यू के बाद अप्रूव हुई है।
अब तक IMF से पाकिस्तान को कुल 3.3 अरब डॉलर मिल चुके हैं—लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यह पैसा जितनी तेजी से IMF भेजता है, उतनी ही तेजी से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के ‘काले छेद’ में समा भी जाता है।
IMF की शर्तें—कागज पर भारी, पाकिस्तान के लिए और भी भारी
IMF Pakistan funding का इतिहास बताता है कि IMF कभी भी “फ्री में” फंडिंग नहीं देता। हर किस्त के साथ कड़ी शर्तें पैक होकर आती हैं।
इस बार भी वही हुआ। IMF ने साफ किया कि अगली किस्त तभी मिलेगी जब पाकिस्तान—
विदेशी मुद्रा रिजर्व को दोबारा बनाए,
टैक्स सिस्टम को मजबूत करे (जो दशकों से “इच्छाओं की सूची” जैसा ही रहा है),
घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों में सुधार लाए,
और क्लाइमेट फैसिलिटी का पैसा वास्तव में क्लाइमेट पर खर्च करे, किसी और ‘प्राथमिकता’ पर नहीं।
IMF जानता है कि पाकिस्तान दशकों से मित्र देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के कर्ज पर चल रहा है। इसलिए इस बार शर्तों का पैकेज थोड़ा और सख्त, थोड़ा और साफ, और थोड़ा और संदेशात्मक रखा गया है—कि “यह फंड विकास के लिए है, किसी और कारण के लिए नहीं।”
दो रिव्यू पूरे, IMF खुश—लेकिन दुनिया को भरोसा नहीं
9 दिसंबर की बैठक में IMF Executive Board ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति का दोबारा मूल्यांकन किया।
कागज़ों में सुधार दिखा, आंकड़े सजे, रिपोर्टें तैयार की गईं—और IMF ने 1.2 अरब डॉलर रिलीज़ करने की मंजूरी दे दी।
लेकिन वैश्विक विश्लेषक लगातार कह रहे हैं कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इतनी गहरी अस्थिरता में फंसी है कि IMF की यह किस्त भी सिर्फ “अस्थायी राहत” ही दे पाएगी।
भारत की आपत्ति—मई में भी उठे थे गंभीर सवाल, वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया गया
IMF Pakistan funding को लेकर सबसे बड़ा विरोध भारत ने मई की मीटिंग में दर्ज कराया था।
भारत ने कहा था कि पाकिस्तान लंबे समय से राज्य-प्रायोजित सीमा पार गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है और यह चिंता भी जताई कि अंतरराष्ट्रीय फंडिंग का गलत इस्तेमाल हो सकता है।
भारत ने उस बैठक में—
वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया
और यह चेतावनी दी थी कि “IMF का पैसा कहीं पाकिस्तान की गलत प्राथमिकताओं में न चला जाए।”
भारत का कथन था कि अंतरराष्ट्रीय फाइनेंशियल संस्थानों की विश्वसनीयता कायम रहनी चाहिए, और इस तरह की फंडिंग से गलत संदेश न जाए।
लेकिन इसके बावजूद IMF ने पाकिस्तान के आर्थिक संकट को देखते हुए फंडिंग को रोकने का रास्ता नहीं चुना—जाहिर है, IMF का कहना है कि वह आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है।
IMF Executive Board: दुनिया की अर्थव्यवस्था का ‘न्यायालय’
IMF का Executive Board उसकी सबसे ताकतवर इकाई है—एक तरह से वैश्विक आर्थिक अदालत, जहां फैसले होते हैं कि किसे कर्ज मिलेगा और किसे नहीं।
इस बोर्ड में कुल 24 सदस्य होते हैं, और हर सदस्य किसी देश या देशों के समूह का प्रतिनिधित्व करता है।
भारत का एक स्वतंत्र प्रतिनिधि है जो भारत से जुड़ी आर्थिक चिंताओं और रणनीतियों को सामने रखता है।
पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व उसके समूह के माध्यम से होता है।
IMF कहता है कि उसके फैसले आर्थिक स्थिति पर आधारित होते हैं, लेकिन आलोचकों के अनुसार राजनीतिक प्रभाव हमेशा मौजूद रहता है—खासकर जब बड़े देशों के हित जुड़े होते हैं।
IMF में वोटिंग कैसे होती है?—कागज़ पर लोकतंत्र, असल में ‘कोटा आधारित शक्ति’
IMF में 191 देश हैं, और सबके पास वोट है—यह सुनकर लोकतांत्रिक लगता है।
लेकिन असल ताकत वोट की संख्या में नहीं बल्कि उसकी वैल्यू में होती है।
भारत की वैल्यू: 2.75%
पाकिस्तान की वैल्यू: 0.43%
अमेरिका की वैल्यू: 16.5% (जो IMF में लगभग सुप्रीम पॉवर जैसा प्रभाव रखता है)
किसी भी निर्णय के लिए 85% वोटिंग चाहिए।
यानी अमेरिका अगर किसी फैसले से बाहर रहे, तो दुनिया कुछ भी कर ले, IMF का निर्णय आगे नहीं बढ़ सकता।
सरल शब्दों में— IMF का लोकतंत्र थोड़ा-सा “बड़े नोट–बड़े वोट” जैसा है।
SDR क्या है?—IMF की ‘डिजिटल अंतरराष्ट्रीय मुद्रा इकाई’
SDR (Special Drawing Rights) IMF द्वारा बनाया गया एक अंतरराष्ट्रीय रिजर्व एसेट है।
इसे असली मुद्रा की तरह जेब में नहीं रखा जा सकता, न नोट छपते हैं—पर इसका मूल्य असली होता है।
देश SDR का उपयोग—
वित्तीय लेनदेन
रिजर्व प्रबंधन
और कर्ज चुकाने
के लिए करते हैं।
IMF में कोटा भी SDR पर आधारित है, और वोटिंग पावर भी।
IMF Pakistan funding का अर्थ—कागज़ों में सुधार, धरातल पर बड़ा संघर्ष
पाकिस्तान को मिली यह तीसरी किस्त उसकी अर्थव्यवस्था को कुछ महीनों की राहत देगी।
लेकिन सवाल वही है:
पाकिस्तान क्या IMF की शर्तों का पालन कर पाएगा?
क्या टैक्स सुधार वास्तव में लागू होंगे?
क्या सरकारी कंपनियाँ घाटे से बाहर आएंगी?
और सबसे अहम—क्या यह फंड वास्तव में आर्थिक स्थिरता पर खर्च होगा?
पिछले कई दशक बताते हैं कि IMF से मिलने वाली सहायता पाकिस्तान के लिए संकट को कुछ महीने आगे खिसका देती है, खत्म नहीं करती।
इसलिए विश्लेषक कहते हैं कि यह फंड उपचार नहीं बल्कि स्टैंडबाय ऑक्सीजन है।

