कालभैरव अष्टमी (Kalabhairava Ashtami): महाकाल भैरव का महामंत्रः-कष्ट निवारण हेतु प्रयोग
कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव अष्टमी (Kalabhairava Ashtami) का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 27 नवंबर, शनिवार को है। इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप भगवान कालभैरव की पूजा करने का विधान है। इन्हें काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। कालभैरव स्वरूप दूसरे स्वरूप में भगवान शिव दुष्टों को दंड देने वाले कालभैरव स्वरूप में विद्यमान हैं।
भैरव स्वरूप रौद्र रूप वाले हैं, इनका रूप भयानक और विकराल होता है। इनकी पूजा करने वाले भक्तों को किसी भी प्रकार डर या भय कभी परेशान नहीं करता। कलयुग में काल के भय से बचने के लिए कालभैरव की आराधना सबसे अच्छा उपाय है। कालभैरव को शिवजी का ही रूप माना गया है। कालभैरव की पूजा करने वाले व्यक्ति को किसी भी प्रकार का डर नहीं सताता है ।
काल भैरव को उग्र स्वरुप के लिए जाना जाता है। ये आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचंड दंडनायक हैं। भगवान भैरव के विषय में कहा जाता है कि अगर कोई इनके भक्त का अहित करता है तो उसे तीनों लोकों में कहीं शरण प्राप्त नहीं होती है। कालभैरव अष्टमी पर इनकी पूजा करने और व्रत करने से भगवान भैरव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर संकट से रक्षा करते हैं।
कालाष्टमी(Kalabhairava Ashtami), शुभ मुहूर्त
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अष्टमी तिथि प्रारम्भ: 27 नवम्बर 2021, 05:43 a.m
अष्टमी तिथि समापन: 28 नवम्बर 2021, 06:00 a.m
कालभैरव अष्टमी (Kalabhairava Ashtami) का महत्व
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कालभैरव अष्टमी (Kalabhairava Ashtami) के दिन भगवान भैरव का व्रत और पूजन करने से सभी प्रकार के भय से मुक्ति प्राप्त होती है। भगवान भैरव हर संकट से अपने भक्त की रक्षा करते हैं। उनके भय से सभी नकारात्क शक्तियां दूर हो जाती हैं। कालाष्टमी के व्रत की पूजा रात्रि में की जाती है इसलिए जिस रात्रि में अष्टमी तिथि बलवान हो उसी दिन व्रत किया जाना चाहिए।
जब भैरव ने काटा ब्रह्मा का पांचवां सिर
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शिवपुराण के अनुसार एक बार ब्रह्माजी स्वयं को अन्य देवताओं से श्रेष्ठ मानने लगे। तब शिवजी के क्रोध से कालभैरव उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया। बाद में ब्रह्माजी ने शिवजी को श्रेष्ठ देव माना। ब्रह्मा का सिर काटने के कारण कालभैरव पर ब्रह्महत्या का दोष लगा। शिवजी के कहने पर कालभैरव काशी आए और यहां आकर तपस्या करने से उनको ब्रह्महत्य के दोष से मुक्ति मिली।
कालभैरव Kaalbhairava पूजा विधि
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– कालभैरव अष्टमी (Kalabhairava Ashtami)यानी 27 नवंबर को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लें। इसके बाद नजदीक के किसी मंदिर में जाकर भगवान कालभैरव, भगवान शिव और देवी दुर्गा की पूजा करें। भगवान भैरव की पूजा रात में करने का विधान है, इसलिए रात में एक बार फिर भगवान कालभैरव की पूजा करनी चाहिए।
– अर्ध रात्रि यानी 12 बजे के लगभग धूप, दीपक, काले तिल, उड़द और सरसों के तेल से भगवान कालभैरव की विधिवत् पूजन और आरती करें। भैरव महाराज को गुलगुले (गुड़ आटें आदि से बनी हुई मीठी पूरी), हलवा या जलेबी का भोग लगाना चाहिए।
– भोग लगाने के बाद वहीं बैठकर भैरव चालीसा का पाठ करें। पूजन संपन्न हो जाए तो जिन चीजों का भोग आपने भैरवजी को लगाया है, वे सभी काले कुत्ते को भी खिलाना चाहिए या फिर कुत्ते को मीठी रोटियां खिलाएं, क्योंकि कुत्ते को भगवान भैरव का वाहन माना गया है। इस प्रकार विधिवत पूजा करने से भगवान कालभैरव की कृपा आप पर बनी रहेगी।
कालाष्टमी पौराणिक कथा
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एक बार त्रिमूर्ति देवताओं ब्रह्मा, विष्णु और शिव में बहस हो रही थी कि उनमें से कौन अधिक श्रेष्ठ है। इस बहस में एक बार ब्रह्माजी ने शिव का अपमान कर दिया और तब शिवजी इतने क्रोधित हो गए कि भैरव बाबा उनके माथे से प्रकट हो गए और ब्रह्मा जी के पांच सिरों में से एक को अलग कर दिया।
ब्रह्मा का कटा हुआ सिर भैरव की बाईं हथेली पर लग गया। भैरव बाबा को इस पाप के भुगतान के लिए भिखारी के रूप में ब्रह्मा जी की खोपड़ी के साथ नग्न अवस्था में भटकना पड़ा। भटकते हुए वह शिव नगरी वाराणसी पहुंचे तब उनके पापों का अंत हुआ। यही कारण है कि वह काशी के कोतवाल माने जाते हैं। उनके दर्शन के बिना कोई काशी वास नहीं कर सकता।
भारतीय ज्योतिष के अनुसार भैरव उपासना से अनिष्ट योग शांति तथा ग्रह दोष शांति:-
वैदिक ज्योतिष अनुसार नवग्रहो मे से एक क्रूर ग्रह “राहु” भगवान शिव को इष्टदेव मानते है, जन्म कुण्डली मे राहु-केतु द्वारा निर्मित कालसर्प योग तथा पितृदोष की शांति के लिए भगवान शिव के भैरव रूप की विधिपूर्वक उपासना करने से न सिर्फ कालसर्प योग तथा पितृदोष की शांति होती है अपितु राहु ग्रह की दशा-अंर्तदशा, इनके द्वारा निर्मित पिशाच योग तथा अन्य बुरे योगो, ऊपरी किया-कराया (जादू-टोना-टोटका), भूत-प्रेत आदि अन्य आधि-व्याधियों से राहत प्राप्त होती है । अतः भैरवाष्टमी के दिन भगवान भैरवनाथ की विधिवत् पूजन का विशेष महत्व माना जाता है ।
लाल किताब ज्योतिष के अनुसार शनि के प्रकोप का शमन भैरव की आराधना से होता है। भैरवनाथ के व्रत एवं दर्शन-पूजन से शनि की पीडा का निवारण होता है। कालभैरव की अनुकम्पा की कामना रखने वाले उनके भक्त तथा शनि की साढेसाती, ढैय्या अथवा शनि की अशुभ दशा से पीडित व्यक्ति को कालभैरवाष्टमी से प्रारम्भ करके वर्षपर्यन्त प्रत्येक कालाष्टमी को व्रत तथा भैरवनाथ की उपासना अवश्य ही करनी चाहिए
1. काल भैरवाष्टमी (Kalabhairava Ashtami) के दिन प्रात:काल पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करने के उपरांत विधिवत भैरव जी की पूजा व व्रत धारण करना चाहिए । पूजा मे तिल के तेल से दीपदान, पूजन, नारियल व सिंदूर अर्पण के साथ-२ भैरव कवच, मंत्र जप तथा स्तोत्र पाठ करना चाहिए ।
महाकाल भैरव का महा मंत्रः-
ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकालभैरवाय नम:।
इस मंत्र का 21हजार बार जप करने से बडी से बडी विपत्ति दूर हो जाती है।
2. भैरवनाथ जी की पूजा-अर्चना तथा व्रत धारण करने के उपरांत पितरों का श्राद्ध व तर्पण करना चाहिए ।
3. इस प्रकार दिन भर उपवास रखकर सायं सूर्यास्त के उपरान्त प्रदोषकाल में भैरवनाथ की पूजा करके प्रसाद को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है।
परंतु साधक को भैरव जी के वाहन श्वान (कुत्ते) को कुछ खिलाने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए ।
काल भैरवाष्टमी (Kalabhairava Ashtami) व्रत विधि -2:-
उपरोक्त लिखित प्रथम विधि के अनुसार भैरवनाथ जी की पूजा तथा अर्चना के बाद नारद पुराण के अनुसार काल भैरवाष्टमी के दिन कालभैरव और मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए । इस रात देवी काली की उपासना करने वालों को अर्ध रात्रि के बाद मां की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए जिस प्रकार दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है ।
इस दिन शक्ति अनुसार रात को माता पार्वती और भगवान शिव की कथा सुन कर जागरण का आयोजन करना चाहिए। आज के दिन व्रती को फलाहार ही करना चाहिए।
शिव पुराण के अनुसार आज के दिन इस मंत्र का जाप करना फलदायी होता है:-
अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्
भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि।
तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरवाष्टकम, भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अनेक समस्याओं का निदान होता है। इसमे भी विशेषतः भैरव कवच के पाठ करने से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।
कालभैरव की उपासना से कष्ट निवारण हेतु प्रयोग:-
1. ग्रह बाधाओं के निवारण के लिए प्रयोग:-
1.शाम के समय भैरवनाथ की उपासना करते हुए उन्हें लाल फूल, लाल मिठाई तथा नींबू चढ़ाएं, भगवान को अर्ध्य देने के उपरांत साबुत उड़द को पीस कर उसके आटे के दो बड़े और आठ कचौरियां (आलू भरकर बनाई गई) अर्पित करे। तत्पश्चात काले हकीक की माला से निम्न मंत्र का, कम से कम एक माला का जाप अवश्य करें
ऊं ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु-कुरु बटुकाय ह्रीं ऊं
इस प्रयोग को करने से राहु-केतू तथा शनि जैसें क्रूर ग्रहों द्वारा जनित पीडा तथा करोना, कैंसर तथा गहरे घाव जैसे शारीरिक कष्टों से निवारण होता है ।
यह प्रयोग आप काल भैरवाष्टमी से शुरू करके प्रत्येक कालाष्टमी पर कर सकते हैं। (कालाष्टमी का त्यौहार हर माह की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है)
रोग निवारण हेतु एक रोटी पर काले तिल तथा सरसों का तेल लगाकर रोगी के ऊपर से उतारकर ऊपर लिखा मंत्र पढ़ते हुए भैरव के वाहन माने जाने वाले कुत्ते को खिलाएं। इससे राहत मिलेगी।
2. तंत्र बाधा या शत्रु भय से मुक्ति हेतु
किसी प्रकार की तंत्र बाधा या शत्रुओ का भय हो, तो काल भैरव की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर निम्न मंत्र का 108 बार जाप करें –
ऊं ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय रक्षां कुरु ह्रीं ऊं
3. कार्य मे बंधन तथा कारोबार चलाने हेतू:-
कार्य में अचानक बंधन या घर में अचानक से हानि-क्लेश होने लगे तो काल भैरव की मूर्ति पर सवा सौ ग्राम साबुत उड़द चढ़ाएं।
ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकालभैरवाय नम:।
ऊपर लिखे मंत्र का 108 बार जप करने के बाद प्रसाद स्वरूप 11 उड़द के दाने उठा लें। इन्हें अपने कार्यस्थल पर भैरव जी से मंगलकामना करते हुए बिखेर दें। इससे बंधा कारोबार चल पड़ेगा। लाभ की संभावनाएं और अधिक बढ़ जाएंगी।

