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Muzaffarnagar में डॉक्टरों की बड़ी चेतावनी: जन्म के बाद सिर्फ 5 मिनट की जांच बचा सकती है बच्चे को आजीवन मानसिक दिव्यांगता से

Muzaffarnagar में विश्व थायरॉयड दिवस के अवसर पर जिला महिला चिकित्सालय में आयोजित एक महत्वपूर्ण सेमिनार ने नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चेतावनी और जागरूकता का संदेश दिया। डॉक्टरों ने साफ शब्दों में कहा कि जन्म के बाद शुरुआती दिनों में की जाने वाली एक बेहद साधारण जांच बच्चे को आजीवन मानसिक दिव्यांगता, बहरापन और शारीरिक विकास रुकने जैसी गंभीर समस्याओं से बचा सकती है।

राज्य स्तरीय निर्देशों के तहत आयोजित इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में डॉक्टरों, स्टाफ नर्सों और पैरामेडिकल टीम को जन्मजात थायरॉयड की कमी यानी “कंजेनिटल हाइपोथायरॉयडिज्म” की पहचान और समय पर इलाज के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला महिला चिकित्सालय की मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका डॉ. आभा आत्रेय ने की। सेमिनार में मौजूद विशेषज्ञों ने कहा कि नवजात की जिंदगी के शुरुआती दो से तीन सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण होते हैं और इसी दौरान बीमारी की पहचान होने पर बच्चे का भविष्य पूरी तरह सुरक्षित किया जा सकता है।


डॉक्टरों की चेतावनी: बाहर से सामान्य दिखने वाला बच्चा अंदर से हो सकता है गंभीर बीमारी का शिकार

सेमिनार में एसएनसीयू के नोडल ऑफिसर डॉ. अनुज राजवंशी ने स्वास्थ्यकर्मियों को संबोधित करते हुए बताया कि जन्मजात हाइपोथायरॉयडिज्म ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे के शरीर में पर्याप्त मात्रा में थायरॉयड हार्मोन नहीं बनता।

उन्होंने कहा कि इस बीमारी की सबसे खतरनाक बात यह है कि जन्म के समय बच्चा पूरी तरह सामान्य और स्वस्थ दिखाई देता है। उसके शरीर में कोई ऐसा स्पष्ट लक्षण नजर नहीं आता जिससे तुरंत बीमारी का अंदाजा लगाया जा सके। लेकिन अंदर ही अंदर यह बीमारी बच्चे के मस्तिष्क और शरीर के विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करने लगती है।

डॉ. राजवंशी ने कहा कि यदि बीमारी की पहचान समय पर न हो तो बच्चा मानसिक रूप से मंदबुद्धि हो सकता है, उसकी लंबाई रुक सकती है और कई मामलों में स्थायी शारीरिक व बौद्धिक विकलांगता तक हो सकती है।


सिर्फ 48 से 72 घंटे के भीतर करनी होती है जरूरी जांच

सेमिनार में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को नवजात स्क्रीनिंग की पूरी प्रक्रिया विस्तार से समझाई गई। विशेषज्ञों ने बताया कि बच्चे के जन्म के 48 से 72 घंटे के भीतर “हील प्रिक थायरॉयड टेस्ट” कराया जाना बेहद जरूरी है।

इस प्रक्रिया में नवजात शिशु की एड़ी से खून की कुछ बूंदें लेकर जांच की जाती है। यह टेस्ट बेहद आसान, सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है।

डॉक्टरों ने बताया कि यदि शुरुआती दो से तीन सप्ताह के भीतर बीमारी पकड़ में आ जाए और समय पर इलाज शुरू हो जाए तो बच्चा पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकता है। वह अन्य बच्चों की तरह मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ विकसित होता है।


जिला महिला अस्पताल में हर नवजात की स्क्रीनिंग होगी अनिवार्य

सीएमएस डॉ. आभा आत्रेय ने सेमिनार के दौरान सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा कि जिला महिला अस्पताल में होने वाली प्रत्येक डिलीवरी में नवजात की थायरॉयड स्क्रीनिंग अब 100 प्रतिशत अनिवार्य की गई है।

उन्होंने कहा कि अस्पताल का लक्ष्य है कि जिले का एक भी नवजात इस जरूरी जांच से वंचित न रहे। उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि थोड़ी सी लापरवाही बच्चे का पूरा जीवन प्रभावित कर सकती है।

डॉ. आभा आत्रेय ने कहा कि यह केवल एक मेडिकल टेस्ट नहीं बल्कि बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने की प्रक्रिया है। इसलिए अस्पताल प्रशासन इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है।


हर 3000 से 4000 बच्चों में एक हो सकता है इस बीमारी का शिकार

विशेषज्ञों ने बताया कि वैश्विक आंकड़ों के अनुसार हर 3000 से 4000 नवजात शिशुओं में से एक बच्चा जन्मजात हाइपोथायरॉयडिज्म से प्रभावित हो सकता है।

यह बीमारी तब होती है जब गर्भ में बच्चे की थायरॉयड ग्रंथि ठीक से विकसित नहीं होती या पर्याप्त हार्मोन नहीं बना पाती। थायरॉयड हार्मोन शरीर और मस्तिष्क के विकास के लिए बेहद जरूरी माना जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय पर इलाज शुरू न हो तो बच्चे में मानसिक विकास रुक सकता है, सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और कई मामलों में बौनापन भी हो सकता है।


इलाज बेहद आसान, रोजाना एक छोटी गोली से बच सकता है बच्चा

डॉक्टरों ने राहत भरी जानकारी देते हुए बताया कि इस बीमारी का इलाज बेहद आसान और प्रभावी है। अगर बीमारी समय पर पकड़ में आ जाए तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार रोजाना सिर्फ एक छोटी सी दवा देकर बच्चे को पूरी तरह सामान्य जीवन दिया जा सकता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की पहचान है, क्योंकि ज्यादातर माता-पिता को इसके बारे में जानकारी ही नहीं होती। यही वजह है कि जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है।


डॉक्टरों ने अभिभावकों से की भावुक अपील

सेमिनार के अंत में डॉ. अनुज राजवंशी ने जिले के अभिभावकों और गर्भवती महिलाओं से भावुक अपील करते हुए कहा कि बच्चे के जन्म के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज होने से पहले उसका थायरॉयड टेस्ट जरूर कराएं।

उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध है और माता-पिता की सिर्फ पांच मिनट की जागरूकता बच्चे का पूरा भविष्य बचा सकती है।

डॉक्टरों ने कहा कि कई बार लोग इस टेस्ट को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर गंभीर समस्या बन सकती है।


जिले में शत-प्रतिशत नवजात स्क्रीनिंग का लिया गया संकल्प

कार्यक्रम के समापन पर डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और स्वास्थ्यकर्मियों ने जिले में शत-प्रतिशत नवजात थायरॉयड स्क्रीनिंग का लक्ष्य हासिल करने का सामूहिक संकल्प लिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हर अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र पर यह जांच नियमित रूप से शुरू हो जाए तो हजारों बच्चों को जीवनभर की गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है।


विश्व थायरॉयड दिवस पर जागरूकता का बड़ा संदेश

विश्व थायरॉयड दिवस के अवसर पर आयोजित इस सेमिनार ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक चिकित्सा में समय पर जांच और जागरूकता कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

विशेषज्ञों ने कहा कि समाज में आज भी नवजात स्क्रीनिंग को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग, डॉक्टरों और मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे लोगों तक सही जानकारी पहुंचाएं।


मुजफ्फरनगर के जिला महिला चिकित्सालय में आयोजित यह सेमिनार केवल एक चिकित्सा कार्यक्रम नहीं बल्कि हजारों नवजात बच्चों के सुरक्षित भविष्य की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। डॉक्टरों की चेतावनी और जागरूकता संदेश ने यह साफ कर दिया कि जन्म के बाद की कुछ मिनटों की सतर्कता बच्चे को आजीवन मानसिक और शारीरिक दिव्यांगता से बचा सकती है। अब जरूरत है कि हर अभिभावक इस जरूरी जांच को लेकर गंभीरता दिखाए और नवजात स्क्रीनिंग को अपनी प्राथमिकता बनाए।

 

News-Desk

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