उत्तर प्रदेश

Sambhal में सदियों पुरानी बावड़ी का रहस्य: खुदाई से निकली तेरह सीढ़ियां, सनातन इतिहास की धरोहर

उत्तर प्रदेश के Sambhal जिले के चंदौसी इलाके में एक अद्भुत और ऐतिहासिक खोज ने सभी को चौंका दिया है। मोहल्ला लक्ष्मणगंज में सदियों से दबी एक प्राचीन बावड़ी का अस्तित्व सामने आया है। इस बावड़ी का पता तब चला जब स्थानीय सनातन सेवक संघ के सदस्यों ने प्रशासन को इसकी जानकारी दी। बुधवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम ने मौके पर पहुंचकर बावड़ी की गहन जांच की।

खुदाई में सामने आया इतिहास

मंगलवार को बावड़ी की खुदाई चौथे दिन भी जारी रही। पालिका के 30 मजदूर और एक जेसीबी मशीन की मदद से मिट्टी हटाने का काम किया गया। खुदाई के दौरान बावड़ी की तेरह सीढ़ियां स्पष्ट दिखाई दीं। शाम छह बजे तक मजदूरों ने गलियारे की सफाई करते हुए बड़ी मात्रा में मिट्टी हटाई। खुदाई में यह साफ हो गया कि बावड़ी का ढांचा बेहद मजबूत है और इसके निर्माण में उत्कृष्ट शिल्पकला का उपयोग किया गया है।

सनातन सेवक संघ ने दिलाई प्रशासन को जागरूकता

मोहल्ला लक्ष्मणगंज में स्थित बांके बिहारी मंदिर के जीर्णोद्धार और इसके पास खाली प्लॉट में बावड़ी की मौजूदगी का दावा सनातन सेवक संघ ने किया था। शनिवार को तहसील में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस में संघ के कार्यकर्ताओं ने जिलाधिकारी राजेंद्र पैंसिया को इसकी जानकारी दी। डीएम ने तत्काल एडीएम न्यायिक सतीश कुशवाह के नेतृत्व में तहसील और पालिका की टीम को खुदाई शुरू करने का निर्देश दिया।

ASI की टीम और विशेषज्ञों का निरीक्षण

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम बुधवार को मौके पर पहुंची। उन्होंने बावड़ी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का विश्लेषण शुरू किया। टीम ने बावड़ी के स्थापत्य और संरचना का बारीकी से निरीक्षण किया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बावड़ी कई शताब्दियों पुरानी हो सकती है और इसे धार्मिक या सामुदायिक उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता होगा।

प्राचीन भारतीय शिल्पकला का नमूना

बावड़ी की सीढ़ियां और दीवारें प्राचीन भारतीय शिल्पकला का बेहतरीन उदाहरण हैं। खुदाई में बावड़ी के विभिन्न हिस्सों की परत दर परत संरचना का पता चला। पुरातत्वविदों के अनुसार, यह बावड़ी मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला का प्रतीक हो सकती है। इसमें जल संरक्षण के लिए अद्वितीय डिज़ाइन देखने को मिला है।

स्थानीय समुदाय की प्रतिक्रिया

बावड़ी के खुलासे से स्थानीय लोगों में उत्साह का माहौल है। आसपास के निवासियों का कहना है कि यह स्थल लंबे समय से उपेक्षित था, लेकिन अब इसके पुनरुद्धार से इलाके में सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं। स्थानीय युवाओं ने प्रशासन से इस बावड़ी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की अपील की है।

जल्द बनेगा पर्यटन स्थल?

बावड़ी की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता को देखते हुए संभल प्रशासन इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है। नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष ने कहा कि बावड़ी के चारों ओर साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण के लिए विशेष बजट आवंटित किया जाएगा।

आगे की योजनाएं

जल निगम के जेई अनुज कुमार ने बताया कि बावड़ी की खुदाई और संरचना के विश्लेषण का कार्य अभी जारी रहेगा। पालिका की टीम हर दिन सुबह से शाम तक खुदाई कर रही है। इसके अलावा, बावड़ी को संरक्षित करने के लिए इसे एक मजबूत कवर और जल निकासी प्रणाली से जोड़ा जाएगा।

संभल का बढ़ता गौरव

संभल की यह प्राचीन बावड़ी न केवल स्थानीय धरोहर है, बल्कि यह देश के ऐतिहासिक धरोहरों की सूची में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह खोज क्षेत्र के गौरव को बढ़ाएगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित की जाएगी।

निष्कर्ष नहीं, एक नई शुरुआत

यह बावड़ी एक उदाहरण है कि भारत के गांव और कस्बे किस तरह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संपदा से परिपूर्ण हैं। प्रशासन, विशेषज्ञ और स्थानीय समुदाय के संयुक्त प्रयासों से इस अनमोल धरोहर को पुनर्जीवित किया जा रहा है।

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