फिल्मी चक्कर

Oscar 2027 में भारत की एंट्री बनी मराठी फिल्म ‘गोंधल’, 33 फिल्मों को पछाड़कर मारी बाजी; गांव के अनुष्ठान से शुरू होती है खौफनाक कहानी

Oscar 2027 India Entry को लेकर भारतीय सिनेमा से बड़ी खबर सामने आई है। मराठी भाषा की साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म ‘गोंधल’ (Gondhal) को 99वें एकेडमी अवॉर्ड्स यानी ऑस्कर 2027 के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री चुना गया है। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की।

ऑस्कर के बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी में अब ‘गोंधल’ भारत का प्रतिनिधित्व करेगी। इस बार भारत की ओर से कुल 33 फिल्मों को ऑस्कर की दौड़ में शामिल किया गया था। अलग-अलग भाषाओं और शैलियों की इन फिल्मों के बीच चयन प्रक्रिया के बाद जूरी ने मराठी फिल्म ‘गोंधल’ के नाम पर मुहर लगाई।

यह चयन इसलिए भी खास है क्योंकि इस सूची में केवल क्षेत्रीय सिनेमा ही नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की कई चर्चित फिल्मों ने भी जगह बनाई थी। कुल 33 फिल्मों में 14 हिंदी फिल्में थीं। इसके बावजूद अंतिम चयन मराठी सिनेमा की इस थ्रिलर फिल्म के पक्ष में गया।

33 फिल्मों की रेस में मराठी ‘गोंधल’ ने बनाई जगह

भारत की ओर से ऑस्कर के लिए इस बार अलग-अलग भारतीय भाषाओं की कुल 33 फिल्मों पर विचार किया गया। इनमें हिंदी फिल्मों की संख्या सबसे ज्यादा 14 थी।

मराठी, तेलुगु और गुजराती भाषा की चार-चार फिल्मों को इस दौड़ में शामिल किया गया था। तमिल की तीन फिल्में भी सूची में थीं, जबकि मलयालम और नागामी भाषा से एक-एक फिल्म ऑस्कर की दावेदारी में शामिल हुई।

हिंदी फिल्मों की सूची में ‘हक’, ‘120 बहादुर’, ‘तेरा मेरा नाता’, ‘मैं वापस आऊंगा’, ‘ओह माय डॉग’, ‘बॉर्डर 2’, ‘खूंटा’, ‘धुरंधर’, ‘धुरंधर द रिवेंज’, ‘गवर्नर’, ‘2020 दिल्ली’, ‘इक्कीस’, ‘ऑब्सेस’ और ‘हनुमान अंश’ शामिल थीं।

इन तमाम फिल्मों के बीच ‘गोंधल’ का चयन क्षेत्रीय भारतीय सिनेमा की बढ़ती मौजूदगी को भी रेखांकित करता है। मराठी सिनेमा पहले भी सामाजिक, ग्रामीण, मनोवैज्ञानिक और प्रयोगधर्मी कहानियों के लिए अपनी अलग पहचान बना चुका है और अब ‘गोंधल’ को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का अवसर मिला है।

क्या है ‘गोंधल’ की कहानी?

‘गोंधल’ करीब दो घंटे की फिल्म है और इसकी कहानी ग्रामीण महाराष्ट्र की लोक परंपरा से जुड़े एक धार्मिक अनुष्ठान के इर्द-गिर्द बुनी गई है। फिल्म में इसी पारंपरिक अनुष्ठान को आधार बनाकर मनोवैज्ञानिक तनाव, पारिवारिक रिश्तों, पुराने विवाद, व्यक्तिगत दुश्मनी और स्थानीय राजनीति को कहानी में जोड़ा गया है।

फिल्म की शुरुआत एक नवविवाहित जोड़े आनंद और सुमन के घर आयोजित होने वाले रातभर चलने वाले गोंधल अनुष्ठान से होती है। शुरुआत में यह आयोजन धार्मिक आस्था और उत्सव का हिस्सा दिखाई देता है, लेकिन जैसे-जैसे रात आगे बढ़ती है, माहौल बदलने लगता है।

गांव में लंबे समय से दबे हुए विवाद धीरे-धीरे सामने आने लगते हैं। व्यक्तिगत रंजिशें और राजनीतिक तनाव भी इस आयोजन के बीच उभरते हैं। धार्मिक अनुष्ठान के माहौल में जब पुराने रिश्तों और दुश्मनियों की परतें खुलने लगती हैं, तो कहानी धीरे-धीरे साइकोलॉजिकल थ्रिलर का रूप लेती है।

यही बदलाव फिल्म को साधारण ग्रामीण कहानी से अलग करता है। उत्सव का माहौल धीरे-धीरे रहस्य, तनाव और अपराध से जुड़े सवालों में बदलता जाता है।

सुमन की शादी से नाराज था सरजेराव

फिल्म के कथानक में गांव के पाटिल का बेटा सरजेराव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बताया गया है कि वह सुमन से शादी नहीं हो पाने के कारण नाराज था और इस विवाह को स्वीकार नहीं कर पाता।

सुमन और आनंद की शादी के बाद सरजेराव की नाराजगी कहानी में एक अहम मोड़ पैदा करती है। गोंधल का धार्मिक आयोजन धीरे-धीरे ऐसी घटनाओं की तरफ बढ़ता है, जहां रिश्तों के साथ-साथ अपराध और रहस्य भी कहानी का हिस्सा बनने लगते हैं।

इस तरह फिल्म में एक पारंपरिक धार्मिक आयोजन केवल पृष्ठभूमि नहीं रह जाता, बल्कि कहानी के तनाव को आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।

गांव का सामाजिक ढांचा, स्थानीय सत्ता, पुराने संबंध और व्यक्तिगत भावनाएं एक-दूसरे से जुड़ती जाती हैं। इसी कारण ‘गोंधल’ को साइकोलॉजिकल थ्रिलर के रूप में पेश किया गया है।

संतोष डावखर ने लिखी और निर्देशित की फिल्म

‘गोंधल’ का लेखन और निर्देशन संतोष डावखर ने किया है। फिल्म के निर्देशन में ग्रामीण महाराष्ट्र की लोक परंपरा को कहानी के रहस्य और तनाव के साथ जोड़ा गया है।

फिल्म के प्रमुख कलाकारों में किशोर कदम, इशिता देशमुख, योगेश सोहणी, निषाद भोईर और सुरेश विश्वकर्मा शामिल हैं।

सुमन का किरदार इशिता देशमुख ने निभाया है। फिल्म की कहानी में उनका किरदार विशेष महत्व रखता है क्योंकि घटनाओं का बड़ा हिस्सा उनकी शादी और उसके बाद बदलते माहौल के इर्द-गिर्द आगे बढ़ता है।

फिल्म में ग्रामीण समाज की मानसिकता, व्यक्तिगत रिश्तों और सामुदायिक तनाव को थ्रिलर के तत्वों के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है।

इलैयाराजा ने तैयार किया फिल्म का संगीत

‘गोंधल’ के संगीत से जुड़ा नाम भी फिल्म को खास बनाता है। फिल्म का संगीत दिग्गज संगीतकार इलैयाराजा ने तैयार किया है।

इलैयाराजा भारतीय फिल्म संगीत के सबसे चर्चित संगीतकारों में शामिल रहे हैं और उनकी संगीत शैली का प्रभाव कई दशकों से भारतीय सिनेमा में दिखाई देता रहा है।

‘गोंधल’ जैसी ग्रामीण लोक परंपरा से जुड़ी कहानी में संगीत का महत्व और बढ़ जाता है। धार्मिक अनुष्ठान, ग्रामीण माहौल, रातभर चलने वाला आयोजन और उसके बीच पैदा होता तनाव—इन सभी परिस्थितियों में संगीत कहानी के वातावरण को मजबूत करने वाला तत्व बन सकता है।

फिल्म के संगीत को लेकर भी इसलिए विशेष रुचि बनी हुई है कि इसमें ग्रामीण महाराष्ट्र की पृष्ठभूमि और इलैयाराजा की संगीतात्मक दृष्टि का मेल देखने को मिलता है।

संतोष डावखर को मिल चुका है सिल्वर पीकॉक

‘गोंधल’ के निर्देशक संतोष डावखर के लिए यह उपलब्धि अचानक सामने आई सफलता नहीं है। उन्हें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया यानी IFFI में सिल्वर पीकॉक पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

यह पुरस्कार उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए मिला था। ऐसे में अब उनकी फिल्म का भारत की ओर से ऑस्कर के लिए चुना जाना उनके फिल्मी सफर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है।

IFFI जैसे प्रतिष्ठित मंच पर निर्देशन के लिए सम्मान हासिल करने के बाद अब ‘गोंधल’ का ऑस्कर की रेस में भारत का प्रतिनिधित्व करना फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा मंच देता है।

13 सदस्यीय जूरी ने किया चयन

भारत की ऑस्कर एंट्री का चयन करने के लिए फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से विशेष जूरी का गठन किया गया था। इस 13 सदस्यीय जूरी में सिनेमा जगत से जुड़े कई अनुभवी नाम शामिल थे।

जूरी में पी शेषाद्री, विजय पाटकर, हितू कनोडिया, शांति कुमार, संदीप पराशर, संजय पाटिल, साबू जोसेफ, अनिल थॉमस, विवेक वासवानी, बिजॉन दासगुप्ता, हासन, वासन और तनिष्ठा चटर्जी शामिल थे।

जूरी ने भारत की ओर से भेजी गई सभी प्रविष्टियों की समीक्षा की और इसके बाद ‘गोंधल’ को ऑस्कर 2027 के लिए चुना।

इस चयन के साथ अब फिल्म भारतीय सिनेमा की अंतरराष्ट्रीय यात्रा के अगले चरण में प्रवेश करेगी।

ऑस्कर की रेस में 14 हिंदी फिल्में भी थीं

इस साल की भारतीय प्रविष्टियों में हिंदी फिल्मों की संख्या सबसे अधिक थी। कुल 33 फिल्मों में 14 हिंदी फिल्मों को शामिल किया गया था।

‘हक’ से लेकर ‘बॉर्डर 2’, ‘धुरंधर’ और ‘इक्कीस’ तक कई चर्चित नाम इस सूची का हिस्सा थे। इसके अलावा ‘120 बहादुर’, ‘तेरा मेरा नाता’, ‘मैं वापस आऊंगा’, ‘ओह माय डॉग’, ‘खूंटा’, ‘धुरंधर द रिवेंज’, ‘गवर्नर’, ‘2020 दिल्ली’, ‘ऑब्सेस’ और ‘हनुमान अंश’ भी दौड़ में शामिल थीं।

इसके अलावा मराठी, तेलुगु और गुजराती सिनेमा की चार-चार फिल्में, तमिल की तीन फिल्में तथा मलयालम और नागामी भाषा की एक-एक फिल्म पर भी विचार किया गया।

इस विविधता से भारतीय सिनेमा की भाषाई और सांस्कृतिक व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

क्षेत्रीय सिनेमा का अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक और कदम

‘गोंधल’ का चयन भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के लिए भी महत्वपूर्ण खबर है। भारतीय फिल्मों की अंतरराष्ट्रीय पहचान केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं रही है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों ने लगातार अपनी कहानियों और फिल्म निर्माण शैली के जरिए वैश्विक दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया है।

मराठी सिनेमा की अपनी मजबूत परंपरा रही है। सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, लोक संस्कृति, पारिवारिक संबंधों और मानवीय मनोविज्ञान पर आधारित कहानियां मराठी फिल्मों में लंबे समय से देखने को मिलती रही हैं।

‘गोंधल’ भी ग्रामीण महाराष्ट्र की लोक परंपरा को कहानी के केंद्र में रखती है। यही स्थानीय परिवेश इसे व्यापक भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ता है।

गोंधल अनुष्ठान बना फिल्म की कहानी का केंद्र

फिल्म के नाम और कहानी दोनों का संबंध महाराष्ट्र की पारंपरिक लोक परंपरा से है। ‘गोंधल’ एक धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान है, जिसे महाराष्ट्र की लोक परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है।

फिल्मकार ने इसी अनुष्ठान को कहानी की पृष्ठभूमि बनाकर एक अलग तरह का थ्रिलर संसार तैयार किया है। धार्मिक आयोजन के दौरान गांव के लोग एक जगह एकत्र होते हैं और इसी सामूहिक वातावरण में पुराने मतभेद तथा छिपे हुए तनाव सामने आने लगते हैं।

एक ओर जहां अनुष्ठान का धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष है, वहीं दूसरी ओर पात्रों के बीच मौजूद निजी संघर्ष कहानी को रहस्य की तरफ ले जाता है।

यही विरोधाभास फिल्म के कथानक को दिलचस्प बनाता है—एक तरफ आस्था और उत्सव, दूसरी तरफ दबे हुए विवाद और बढ़ता अपराध।

‘गोंधल’ से अब ऑस्कर की अगली दौड़ शुरू

भारत की आधिकारिक एंट्री चुने जाने के बाद फिल्म का सफर यहीं खत्म नहीं होता। अब ‘गोंधल’ को ऑस्कर की अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया में आगे बढ़ना होगा।

भारत की ओर से आधिकारिक रूप से भेजी गई फिल्म को Best International Feature Film श्रेणी की प्रक्रिया में आगे प्रतिस्पर्धा करनी होगी। अंतिम नामांकन तक पहुंचने की प्रक्रिया अलग-अलग चरणों से होकर गुजरती है।

इसलिए भारत की आधिकारिक एंट्री चुने जाने को ऑस्कर नामांकन या पुरस्कार के बराबर नहीं माना जा सकता। यह भारत की ओर से आधिकारिक प्रतिनिधित्व का महत्वपूर्ण चरण है, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

पिछले साल ‘होमबाउंड’ थी भारत की ऑस्कर एंट्री

पिछले साल भारत की ओर से ‘होमबाउंड’ को ऑस्कर के लिए भेजा गया था। फिल्म में ईशान खट्टर और विशाल जेठवा मुख्य भूमिकाओं में थे।

2025 में भारत की ऑस्कर एंट्री के लिए अलग-अलग भाषाओं की कुल 24 फिल्मों पर विचार किया गया था। इनमें से ‘होमबाउंड’ का चयन हुआ।

उस समय चयन समिति के चेयरपर्सन एन. चंद्रा ने चयन प्रक्रिया को चुनौतीपूर्ण बताया था। उन्होंने कहा था कि प्रतियोगिता में शामिल फिल्में ऐसी थीं, जिन्होंने लोगों की जिंदगी को छुआ।

‘होमबाउंड’ का निर्देशन नीरज घायवान ने किया था और फिल्म बशारत पीर के वर्ष 2020 में प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स लेख ‘टेकिंग अमृत होम’ से प्रेरित थी।

इस बार 33 फिल्मों की सूची में से ‘गोंधल’ का चयन हुआ है और अब मराठी फिल्म को भारत की ओर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी कहानी पेश करने का अवसर मिलेगा।

ऑस्कर 2026 में ‘वन बैटल आफ्टर अनदर’ का दबदबा

98वें एकेडमी अवॉर्ड्स यानी 2026 के ऑस्कर समारोह की बात करें तो ‘वन बैटल आफ्टर अनदर’ ने सबसे ज्यादा छह पुरस्कार जीते थे, जिसमें बेस्ट फिल्म का पुरस्कार भी शामिल था।

वहीं ‘सिनर्स’ के लिए माइकल बी. जॉर्डन को बेस्ट एक्टर चुना गया था और ‘हेमनेट’ के लिए जेसी बकले को बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार मिला था।

‘सिनर्स’ को उस वर्ष सबसे ज्यादा 16 नॉमिनेशन मिले थे, हालांकि फिल्म चार पुरस्कार ही जीत सकी।

भारतीय मूल की फिल्ममेकर गीता गंदभीर की दो डॉक्यूमेंट्री भी ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थीं। भारतीय सिनेमा और भारतीय मूल के फिल्मकारों की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी को देखते हुए यह क्षेत्र भारतीय दर्शकों के लिए लगातार रुचि का विषय बना हुआ है।

अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने भी दूसरी बार ऑस्कर समारोह में प्रेजेंटर की भूमिका निभाई थी।

मराठी सिनेमा के लिए ‘गोंधल’ का चयन क्यों महत्वपूर्ण है

‘गोंधल’ का चयन इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि फिल्म ने एक स्थानीय सांस्कृतिक परंपरा को अपनी कहानी के केंद्र में रखा है। ग्रामीण महाराष्ट्र की पृष्ठभूमि, पारंपरिक अनुष्ठान, परिवार और गांव की राजनीति के बीच पैदा होने वाला तनाव इसे एक विशिष्ट कहानी का रूप देता है।

भारतीय सिनेमा की खासियत उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद लोक परंपराएं और सामाजिक संरचनाएं फिल्मों को ऐसी कहानियां देती हैं जिनकी जड़ें स्थानीय होती हैं, लेकिन भावनाएं व्यापक दर्शक वर्ग से जुड़ सकती हैं।

‘गोंधल’ की ऑस्कर एंट्री इस बात को सामने लाती है कि भारतीय फिल्म चयन प्रक्रिया में क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण है।

ऑस्कर 2027 के लिए अब नजर ‘गोंधल’ की आगे की यात्रा पर

फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया द्वारा आधिकारिक एंट्री चुने जाने के बाद अब ‘गोंधल’ भारतीय सिनेमा की ओर से ऑस्कर 2027 की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ेगी।

फिल्म के सामने अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत फिल्मों के बीच प्रतिस्पर्धा होगी। जूरी चयन, आगे की शॉर्टलिस्ट प्रक्रिया और नामांकन से जुड़े अगले चरण फिल्म की यात्रा को तय करेंगे।

फिलहाल सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि 33 भारतीय फिल्मों की प्रतिस्पर्धा के बाद ‘गोंधल’ को भारत की ओर से आधिकारिक रूप से चुना गया है।

एक ग्रामीण धार्मिक अनुष्ठान से शुरू होकर व्यक्तिगत दुश्मनी, सामाजिक तनाव, राजनीति, अपराध और रहस्य तक पहुंचने वाली इस कहानी ने चयन समिति का ध्यान खींचा है। अब देखना होगा कि संतोष डावखर की यह मराठी थ्रिलर अंतरराष्ट्रीय मंच पर किस तरह की प्रतिक्रिया हासिल करती है।

‘गोंधल’ का ऑस्कर 2027 के लिए भारत की आधिकारिक चयनित फिल्म बनना मराठी सिनेमा के साथ-साथ भारतीय क्षेत्रीय फिल्मों के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर है। 33 फिल्मों की प्रतिस्पर्धा के बाद चुनी गई यह साइकोलॉजिकल थ्रिलर ग्रामीण महाराष्ट्र की लोक परंपरा और ‘गोंधल’ अनुष्ठान को कहानी के केंद्र में रखती है। संतोष डावखर के निर्देशन, इशिता देशमुख, किशोर कदम, योगेश सोहणी, निषाद भोईर और सुरेश विश्वकर्मा के अभिनय तथा इलैयाराजा के संगीत से सजी फिल्म अब भारत की ओर से Best International Feature Film की ऑस्कर प्रक्रिया में आगे बढ़ेगी। हालांकि आधिकारिक एंट्री चुने जाने और ऑस्कर नामांकन या पुरस्कार मिलने के बीच कई चरण होते हैं, इसलिए आगे की प्रक्रिया पर नजर बनी रहेगी।

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