50 साल बाद शराब निर्यात की वापसी, कर्ज के बोझ तले दबे Pakistan का बड़ा आर्थिक दांव?
News-Desk
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यह कदम सिर्फ व्यापारिक नहीं बल्कि पाकिस्तान की आर्थिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि देश इस समय भारी विदेशी कर्ज और वित्तीय असंतुलन से जूझ रहा है।
शुरुआती चरण में विदेशी बाजार तैयार करने पर जोर
कंपनी के एक्सपोर्ट मैनेजर रमीज शाह के अनुसार फिलहाल प्राथमिक लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नेटवर्क स्थापित करना है। उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले समय में उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाएगी ताकि निर्यात को व्यापक स्तर पर ले जाया जा सके।
पिछले कई वर्षों से कंपनी केवल नॉन-अल्कोहलिक उत्पादों—जैसे जूस, मिनरल वाटर और फ्लेवर ड्रिंक्स—का ही निर्यात कर रही थी। अब शराब के निर्यात की अनुमति मिलने के बाद यह कंपनी फिर से वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
सरकारी नीति में बदलाव के बाद खुला रास्ता
पाकिस्तान में मुस्लिम आबादी के लिए शराब पर प्रतिबंध लगभग 50 साल पहले लागू किया गया था। हालांकि गैर-मुस्लिम समुदाय के लिए कुछ सीमित छूट हमेशा से बनी रही है।
2025 में सरकार ने एक अहम नीति बदलाव करते हुए शराब निर्यात की अनुमति दी। इसके तहत उन देशों को प्राथमिकता दी गई जो ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) का हिस्सा नहीं हैं। इसी नीति के तहत अब निर्यात की प्रक्रिया शुरू की गई है।
कर्ज के भारी बोझ ने बढ़ाया दबाव
पाकिस्तान इस समय गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश पर कुल बाहरी कर्ज लगभग 138 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। सरकारी आय और खर्च के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।
वित्त वर्ष 2026 में सरकार की आय करीब 40 अरब डॉलर आंकी गई है, जबकि खर्च 58 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसमें से करीब 30 अरब डॉलर सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च हो रहे हैं। इस स्थिति ने सरकार को नए राजस्व स्रोत तलाशने के लिए मजबूर कर दिया है।
शहबाज शरीफ का बयान—कर्ज मांगने में होती है शर्म
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने भी देश की आर्थिक स्थिति पर चिंता जताई है। इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि विदेशी कर्ज पर बढ़ती निर्भरता देश के आत्मसम्मान के लिए चुनौती बन गई है।
उन्होंने कहा कि जब उन्हें और सैन्य नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय सहायता के लिए जाना पड़ता है, तो यह स्थिति असहज और शर्मनाक महसूस होती है। उन्होंने यह भी माना कि कई बार बाहरी दबावों के चलते समझौते करने पड़ते हैं।
इतिहास में पहली बार नहीं—पहले भी करता था निर्यात
मरी ब्रूअरी पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शराब का निर्यात करती रही है। बैन से पहले भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका जैसे देशों में इसकी सप्लाई होती थी। हालांकि 1977 में लगे प्रतिबंध के बाद यह गतिविधि लगभग पूरी तरह बंद हो गई थी।
अब दशकों बाद कंपनी एक बार फिर वैश्विक बाजार में वापसी कर रही है, जो पाकिस्तान की बदलती आर्थिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
भुट्टो के दौर में लगा था शराब पर प्रतिबंध
1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Zulfikar Ali Bhutto ने देश में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे और विपक्ष की मांगों में शराब और नाइट क्लब पर रोक भी शामिल थी।
राजनीतिक दबाव के चलते यह निर्णय लिया गया, जिसने पाकिस्तान की सामाजिक और आर्थिक संरचना पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला।
जिया उल हक के शासन में कानून हुआ और सख्त
भुट्टो सरकार के पतन के बाद जनरल Zia-ul-Haq ने सत्ता संभाली और शराब से जुड़े कानूनों को और कठोर बना दिया। इसे इस्लामी कानून से जोड़ते हुए मुसलमानों के लिए शराब पीना और बेचना पूरी तरह गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
हालांकि गैर-मुस्लिमों और विदेशी नागरिकों के लिए लाइसेंस के जरिए सीमित अनुमति जारी रखी गई।
मुशर्रफ काल में कुछ हद तक ढील
जनरल Pervez Musharraf के शासनकाल में इन नियमों को लागू करने में कुछ ढील दी गई। इस दौरान लाइसेंस वाली दुकानों की संख्या बढ़ी और व्यवहारिक स्तर पर नियंत्रण कुछ कमजोर हुआ।
इसके बावजूद आधिकारिक तौर पर कानून में बड़ा बदलाव नहीं किया गया।
प्रतिबंध के बावजूद जारी रहा अवैध व्यापार
विशेषज्ञों का मानना है कि शराब पर प्रतिबंध के बावजूद इसका अवैध कारोबार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। बल्कि इससे अवैध शराब नेटवर्क और जहरीली शराब की घटनाओं में वृद्धि हुई।
कुछ विश्लेषकों का यह भी दावा है कि प्रतिबंध के कारण कुछ लोग अधिक खतरनाक नशीले पदार्थों की ओर मुड़ गए, जिससे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ीं।
दक्षिण एशिया में प्राचीन काल से मौजूद रही शराब संस्कृति
इतिहासकार बताते हैं कि दक्षिण एशिया में शराब का उपयोग हजारों वर्षों से होता आया है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मुगल काल तक विभिन्न रूपों में शराब का प्रचलन रहा है।
यह तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि सामाजिक और सांस्कृतिक आदतों को केवल कानून के माध्यम से पूरी तरह नियंत्रित करना आसान नहीं होता।
आर्थिक मजबूरी या रणनीतिक बदलाव?
विश्लेषकों के अनुसार शराब निर्यात की यह पहल केवल व्यापारिक विस्तार नहीं बल्कि आर्थिक दबाव का परिणाम भी है। सरकार नए राजस्व स्रोतों की तलाश में है और यह कदम उसी दिशा में एक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है।
आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह निर्णय पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को कितना सहारा दे पाता है और वैश्विक बाजार में इसकी कितनी स्वीकार्यता बनती है।

