PoK में फिर उठी आजादी की आवाज! 25 हजार लोगों का प्रदर्शन, भारत से जुड़ने की मांग; शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के खिलाफ नारे
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में चल रहा विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेता दिखाई दे रहा है। मंधोल इलाके में हजारों लोगों के जुटने और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ नारेबाजी की खबरों के बीच आंदोलनकारियों ने अपने अधिकारों के साथ-साथ भारत से जुड़ने की मांग भी उठाई है। प्रदर्शनकारियों की ओर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के खिलाफ भी नारे लगाए जाने की बात सामने आई है।
दावा है कि LoC यानी नियंत्रण रेखा से करीब 7 किलोमीटर दूर मंधोल में लगभग 25 हजार लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। आंदोलन से जुड़े जॉइंट अवामी लीग (JAL) के नेताओं ने पाकिस्तान सरकार के सामने पुंछ और मेंढर का रास्ता खोलने की मांग रखी है। यह रास्ता भारत की ओर जाता है।
हालांकि, PoK में मौजूदा घटनाक्रम से जुड़े कई दावे अलग-अलग पक्षों की ओर से सामने आ रहे हैं और जमीन पर स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि हर मामले में संभव नहीं है। ऐसे में आंदोलनकारियों, पाकिस्तानी प्रशासन और अन्य स्रोतों के दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
115वें दिन मंधोल में जुटे हजारों लोग
बताया गया है कि 5 जून से PoK में आंदोलन जारी है और सोमवार को इसका 115वां दिन था। इस दौरान मंधोल इलाके में काफी संख्या में लोग एकत्र हुए। रिपोर्टों के मुताबिक PoK की राजधानी मुजफ्फराबाद समेत अलग-अलग इलाकों से लोग LoC के नजदीक पहुंच रहे हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि पाकिस्तान सरकार ने लंबे समय से उनके अधिकारों की अनदेखी की है। प्रदर्शनकारियों की तरफ से अब यह संदेश दिया जा रहा है कि वे अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
मंधोल में बढ़ती भीड़ के बीच भारत से जुड़ने की मांग ने इस पूरे आंदोलन को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। प्रदर्शनकारियों की ओर से पाकिस्तान सरकार के खिलाफ नारेबाजी के साथ भारत की तरफ जाने वाले रास्तों को खोलने की मांग भी उठाई जा रही है।
JAL ने रखा पुंछ-मेंढर रास्ता खोलने का मुद्दा
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जॉइंट अवामी लीग (JAL) के नेताओं ने पाकिस्तान सरकार से पुंछ और मेंढर के रास्ते को खोलने की मांग की है। यह रास्ता भारत की ओर जाता है और इसके खुलने से PoK के इस हिस्से का भारत के जम्मू-कश्मीर क्षेत्र से संपर्क संभव होगा।
JAL नेताओं के मुताबिक यह मांग केवल आवाजाही से जुड़ी नहीं है, बल्कि आंदोलनकारियों के व्यापक राजनीतिक और सामाजिक असंतोष से भी जुड़ी हुई है।
प्रदर्शनकारियों की तरफ से कहा जा रहा है कि लंबे समय से उनके अधिकारों को दबाया गया है और अब वे इस स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।
शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के खिलाफ नारे
मंधोल में प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के खिलाफ नारे लगाए जाने की बात कही गई है।
प्रदर्शनकारियों का गुस्सा केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा है। उनके निशाने पर पाकिस्तान की केंद्र सरकार और सैन्य नेतृत्व भी है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था ने PoK के लोगों की समस्याओं और अधिकारों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
हालांकि इन आरोपों और नारों को आंदोलनकारियों के बयानों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। किसी सरकार या सैन्य नेतृत्व के खिलाफ लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर होनी जरूरी है।
PoK में खाने-पीने की चीजों की कमी का दावा
आंदोलन के बीच पाकिस्तान सरकार पर प्रदर्शन को रोकने के लिए PoK की सप्लाई लाइन प्रभावित करने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कई इलाकों में लोगों को आटा और अन्य जरूरी खाद्य सामग्री की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
अगर सप्लाई बाधित होने की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ सकता है। PoK पहले से ही आर्थिक और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी कई समस्याओं को लेकर असंतोष का सामना करता रहा है।
प्रदर्शनकारियों की ओर से इस स्थिति को सरकार के दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जबकि इस तरह के दावों की वास्तविक स्थिति को स्वतंत्र स्रोतों से सत्यापित किया जाना जरूरी है।
‘डाला ब्रिगेड’ को लेकर क्या दावा किया जा रहा है?
PoK में जारी आंदोलन के बीच पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI से जुड़ी कथित ‘डाला ब्रिगेड’ का भी जिक्र हो रहा है। आंदोलनकारियों से जुड़े दावों के मुताबिक ऐसी जीपों का इस्तेमाल पहले लोगों को हिरासत में लेने के लिए किया जाता था।
अब दावा किया जा रहा है कि विरोध बढ़ने के कारण इन वाहनों का इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया है। प्रदर्शनकारियों द्वारा इन पर पथराव किए जाने की बातें भी सामने आई हैं।
हालांकि ‘डाला ब्रिगेड’ के नाम और उसके मौजूदा इस्तेमाल से संबंधित दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसलिए इसे फिलहाल आंदोलन से जुड़े पक्षों द्वारा किए जा रहे दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
क्या पाकिस्तान सेना PoK में उतर सकती है?
PoK में बढ़ते आंदोलन के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व आगे क्या कदम उठाएगा। रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि सेना प्रमुख आसिम मुनीर PoK की स्थिति पर नजर रख रहे हैं और वहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन आंदोलनकारियों के खिलाफ सेना के इस्तेमाल का सवाल बेहद संवेदनशील है। किसी भी क्षेत्र में नागरिक प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल पर कानूनी और राजनीतिक सवाल उठ सकते हैं।
इस बीच यह दावा भी किया जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना गुप्त रूप से अपने सैनिकों को PoK भेज रही है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
PoK में आंदोलन और पाकिस्तान सरकार के सामने चुनौती
आंदोलन की अवधि बढ़ने के साथ पाकिस्तान सरकार के सामने चुनौती भी बढ़ती दिखाई दे रही है। प्रदर्शनकारी अगर लंबे समय तक सड़कों पर बने रहते हैं और अलग-अलग इलाकों से लोगों की भागीदारी बढ़ती है, तो प्रशासन के लिए स्थिति को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
दूसरी ओर, यदि सरकार बातचीत या राजनीतिक समाधान की दिशा में कदम उठाती है तो आंदोलन की कुछ मांगों पर चर्चा का रास्ता खुल सकता है।
मंधोल में बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की खबर इस बात का संकेत देती है कि स्थानीय असंतोष अब केवल छोटे स्तर के विरोध तक सीमित नहीं रह गया है।
क्या PoK का रास्ता भारत की ओर खुल पाएगा?
आंदोलन का सबसे संवेदनशील मुद्दा भारत की ओर जाने वाले पुंछ-मेंढर रास्ते को खोलने की मांग है। अगर यह मांग स्वीकार की जाती है तो इसका केवल स्थानीय आवाजाही पर असर नहीं पड़ेगा, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों और LoC से जुड़े राजनीतिक समीकरणों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाएगी। आंदोलनकारियों का कहना है कि रास्ता खोला जाना चाहिए, जबकि इस तरह के किसी कदम के लिए पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा तंत्र की मंजूरी जरूरी होगी।
इसलिए इस मांग का आगे बढ़ना पूरी तरह राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर करेगा।
1947-48 के बाद बदले समीकरणों की चर्चा
PoK का मौजूदा सवाल ऐतिहासिक रूप से भी बेहद संवेदनशील है। 1947-48 के दौरान जम्मू-कश्मीर में हुए संघर्ष और कबायली हमले के बाद क्षेत्र का एक हिस्सा पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया। इसके बाद से यह इलाका भारत-पाकिस्तान विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
आज भी LoC दोनों पक्षों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों को अलग करती है। ऐसे में PoK में भारत से जुड़ने या भारत की ओर जाने वाले रास्ते खोलने की मांग केवल स्थानीय प्रशासन का मुद्दा नहीं रह जाती, बल्कि इसका संबंध व्यापक भारत-पाकिस्तान विवाद से जुड़ जाता है।
PoK सरकार की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक PoK में 27 जुलाई को स्थानीय विरोध के बावजूद चुनाव कराए गए थे। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी PML-N सरकार बनाने में सफल रही।
आंदोलन के बीच स्थानीय सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है। दावा है कि कैबिनेट के कई सदस्य प्रदर्शनकारियों के बीच जाने से बच रहे हैं।
अगर सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच सीधा संवाद नहीं होता है तो आंदोलन और लंबा खिंच सकता है। दूसरी तरफ बातचीत की शुरुआत होने पर सरकार के सामने आंदोलनकारियों की मांगों पर ठोस प्रतिक्रिया देने की चुनौती होगी।
नवाज शरीफ की पार्टी की सरकार, लेकिन सड़कों पर विरोध
चुनाव के बाद PML-N के सत्ता में आने के बावजूद PoK में विरोध का बने रहना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। प्रदर्शनकारियों का असंतोष अब केवल किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं बल्कि शासन व्यवस्था और अधिकारों से जुड़े व्यापक मुद्दों पर केंद्रित दिखाई देता है।
आंदोलनकारियों की तरफ से बार-बार यह कहा जा रहा है कि वे अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर फैसला चाहते हैं।
क्या आंदोलन पाकिस्तान सरकार के लिए बड़ा संकट बन सकता है?
PoK में जारी विरोध का भविष्य कई कारकों पर निर्भर करेगा—प्रदर्शनकारियों की संख्या, आंदोलन की भौगोलिक पहुंच, पाकिस्तान सरकार की प्रतिक्रिया, सुरक्षा बलों की भूमिका और स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व का रुख।
अगर प्रदर्शन अलग-अलग इलाकों में फैलता है तो सरकार पर बातचीत का दबाव बढ़ सकता है। वहीं कठोर कार्रवाई की स्थिति में टकराव बढ़ने का खतरा भी पैदा हो सकता है।
मंधोल में बड़ी भीड़ का जुटना इस आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है, लेकिन इससे आगे की राजनीतिक दिशा को लेकर अभी निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
LoC के करीब बढ़ती भीड़ ने बढ़ाई संवेदनशीलता
मंधोल का भौगोलिक स्थान इस पूरे घटनाक्रम को और संवेदनशील बनाता है। LoC से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर हजारों लोगों का एकत्र होना भारत-पाकिस्तान सीमा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
आंदोलनकारियों की ओर से भारत से जुड़ने की मांग और पुंछ-मेंढर मार्ग खोलने की मांग के कारण यह विरोध अब स्थानीय प्रशासनिक शिकायतों से आगे निकलकर क्षेत्रीय राजनीति का विषय बन गया है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान सरकार आंदोलनकारियों के साथ बातचीत का रास्ता अपनाती है या सुरक्षा और प्रशासनिक उपायों के जरिए विरोध को नियंत्रित करने की कोशिश करती है।

