श्रीमती कांति देवी जैन की स्मृति में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन
नई दिल्ली – हिंदी पत्रिका चाणक्य वार्ता एवं हंसराज कॉलेज द्वारा वैश्विक भारतीयता विषय पर श्रीमती कांति देवी जैन की स्मृति में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया।
19 से 21 सितंबर के बीच चली इस व्याख्यानमाला में लगभग बीस देशों एवं अस्सी विश्वविद्यालयों से संबद्ध पाँच हजार से अधिक श्रोता जुड़े। हंसराज कॉलेज की सक्रिय प्राचार्य डॉ. रमा ने स्वागत सत्रों में बताया कि भारतीयता कई धर्मों के विवेक और विज्ञान पर आधारित तर्कों से रची गई संवाहक संस्कृति है। उन्होंने प्रतिभा पलायन की बात करते हुए भारतीयता के वैश्विक फलक पर आरूढ़ होने को विभिन्न संदर्भों में रेखांकित किया।
प्रथम सत्र में ऑस्ट्रेलिया की सुश्री रेखा राजवंशी, अमेरिका के श्री अनुराग शर्मा, कनाडा के श्री संजीव अग्रवाल और पोलैंड के डॉ. सुधांशु शुक्ला ने अपने कर्मदेशों में समृद्ध हो रही भारतीयता पर प्रकाश डाला.
उज्जैन के युवा चिंतक डॉ. विक्रांत सिंह तोमर ने भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत अपने गंभीर व्याख्यान से श्रोताओं को मोह लिया। प्रो. शिवाजी सरकार ने अपने व्याख्यान में भारतीय एवं पश्चिमी राष्ट्रवाद की पड़ताल की और सत्र की अध्यक्षता करते हुए विचारक श्री लक्ष्मी नारायण भाला ने हिंदू के व्यापक अर्थों की चर्चा की।
दूसरे सत्र में डॉ. जवाहर कर्नावट ने विदेशों में पिछले 110 वर्षों में उभरे हिंदी मीडिया और इसके द्वारा शांति संदेश के प्रसार को रेखांकित किया
डॉ. दीपक पांडेय ने विदेशों, विशेषकर गिरमिटिया देशों, में भारतीय संस्कृति एवं कला की गहरी पैठ पर अपने विशेषज्ञ विचार व्यक्त किए। मॉरीशस के यंतुदेव बुधु व अमेरिका की सुश्री नीलू गुप्ता ने हिंदी को भारतीयता से जोड़ा
विशिष्ट वक्ता कथाकार तेजेंद्र शर्मा ब्रिटेन से जुड़े और विदेशों में प्रतिष्ठा पा रही भारतीयता की ताकत की झलक प्रस्तुत की। प्रो. अवनीश कुमार ने अपने वक्तव्य में आर्यभट्ट और नालंदा-तक्षशिला के ज्ञानकोष की चर्चा की।
नीदरलैंड से जुड़े आचार्य शंकर उपाध्याय ने डचभूमि में उनके आचार-व्यवहार से प्रभावित होती डच भाषा और संस्कृति पर रोमांचकारी अनुभव साझा किये।
तीसरे सत्र में सिंगापुर से जुड़ीं डॉ. संध्या सिंह ने वहाँ की महकती भारतीयता का जीवंत चित्रण किया तो समालोचक प्रो. बी. एल. आच्छा ने धरती, नदी, स्त्री, भाषा, गाय, इन पाँच माताओं का जिक्र करते हुए आशा व्यक्त की कि जब श्रेष्ठतम वैश्विक संस्कृति आएगी तो उसे हम लाएँगे।
नीदरलैंड्स से बोलते हुए डॉ. रामा तक्षक ने एक स्रोत से उपजे झरने की धाराओं के सापेक्ष वैश्विक भारतीयता पर चर्चा की।
शिक्षाविद् एवं पूर्व प्रशासक डॉ. योगेंद्र नारायण ने इतिहास के आलोक में भारतीय दर्शन द्वारा राज्य के बजाय लोगों के हृदयों को जीतने की परंपरा का विवेचन किया।
समापन सत्र के अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने ‘भारत’ शब्द की ऊर्जावान सांस्कृतिक व्याख्या की। तीन सत्रों के व्याख्यानों पर टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए कनाडा की डॉ. हंसा दीप ने कहा कि भारतीयता के आकाश से दुनिया का साक्षात्कार हो रहा है, जहाँ हम ध्रूव तारे के रूप में चमक सकते हैं, चाँद भी बन सकते हैं और सूरज भी।
विषय प्रवर्तन करते हुए चाणक्य वार्ता के संपादक डॉ. अमित जैन ने व्याख्यानमाला के उद्देश्य और श्रीमती कांति देवी जैन मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा किए जा रहे परमार्थ कार्यों की जानकारी दी। व्याख्यानमाला का संयोजन व संचालन कनाडा के धर्मपाल महेंद्र जैन ने किया।
