रक्षाबंधन का धार्मिक महत्व
इस साल सावन के आखिरी सोमवार यानी 3 अगस्त पर रक्षाबंधन का त्योहार पड़ रहा है। भाई-बहन का पवित्र त्योहार रक्षाबंधन इस बार बेहद खास होगा क्योंकि इस साल रक्षाबंधन पर सर्वार्थ सिद्धि और दीर्घायु आयुष्मान का शुभ संयोग बन रहा है। रक्षाबंधन पर ऐसा शुभ संयोग 29 साल बाद आया है। साथ ही इस साल भद्रा और ग्रहण का साया भी रक्षाबंधन पर नहीं पड़ रहा है।
रक्षा करने और करवाने के लिए बांधा जाने वाला पवित्र धागा रक्षा बंधन कहलाता है। यह पवित्र पर्व हर वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की रक्षा के लिए उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और भाई बहनों को जीवन भर उनकी रक्षा का वचन देते हैं।
राजसूय यज्ञ के समय भगवान कृष्ण को द्रौपदी ने रक्षा सूत्र के रूप में अपने आंचल का टुकड़ा बांधा था। इसी के बाद से बहनों द्वारा भाई को राखी बांधने की परंपरा शुरू हो गई।
ब्राहमणों द्वारा अपने यजमानों को राखी बांधकर उनकी मंगलकामना की जाती है। इस दिन वेदपाठी ब्राह्मण यजुर्वेद का पाठ आरंभ करते हैं इसलिए इस दिन शिक्षा का आरंभ करना अच्छा माना जाता है। महाराष्ट्र राज्य के अनेक भागों में श्रावणी-पूर्णिमा के दिन जलदेवता वरुण की आराधना की जाती है।
आपको बता दें कि रक्षाबंधन और श्रावण पूर्णिमा ये दो अलग-अलग पर्व हैं जिसमें उपासना और संकल्प का अद्भुत समन्वय है और एक ही दिन मनाए जाते हैं। पुरातन और महाभारत युग के धर्म ग्रंथों में इन पर्वों का उल्लेख पाया जाता है। यह भी कहा जाता है कि देवासुर संग्राम के युग में देवताओं की विजय से रक्षाबंधन का त्योहार शुरू हुआ।
रक्षाबंधन से पहले 2 अगस्त को रात्रि 8 बजकर 43 मिनट से 3 अगस्त को सुबह 9 बजकर 28 मिनट तक भद्रा रहेगी। इसके साथ ही शाम 7 बजकर 49 मिनट से दीर्घायु कारक आयुष्मान योग भी लग जाएगा।
रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त
राखी बांधने का मुहूर्त- 09:27:30 से 21:11:21 तक।
रक्षा बंधन अपराह्न मुहूर्त- 13:45:16 से 16:23:16 तक।
रक्षा बंधन प्रदोष मुहूर्त- 19:01:15 से 21:11:21 तक।
मुहूर्त अवधि: 11 घंटे 43 मिनट।
3 अगस्त को सुबह 6:51 बजे से ही सर्वार्थ सिद्धि योग शुरू हो रहा है। यह योग बहुत ही फलदाई होता है। इसके साथ ही रक्षा बंधन पर तीन अगस्त को प्रातः उत्तराषाढ़ा नक्षत्र और 7:18 बजे से श्रवण नक्षत्र रहेगा। जो रक्षाबंधन की दृष्टि से अति उत्तम है।
राखी बांधने की सही विधि
ज्योतिषियों के अनुसार राखी को सही समय पर सही विधि से बांधना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले भाई को पूर्व दिशा की तरफ मुंह करके बैठाना चाहिए।
इसके बाद बहन को अच्छे से पूजा की थाली सजानी चाहिएष पूजा की थाली में चावल, रौली, राखी, दीपक होना चाहिए। इसके बाद बहन को भाई के अनामिका उंगली से टीका कर चावल लगाने चाहिए।
अक्षत अखंड शुभता को प्रदर्शित करते हैं। उसके बाद भाई की आरती उतारनी चाहिए और उसके जीवन की मंगल कामना करनी चाहिए। कई जगह बहनें इस दिन अपने भाई की सिक्के से नजर भी उतारती हैं।
विष्णु पुराण की मान्यता
पुराणों में इस त्यौहार का जिक्र उस समय हुआ है जब देवासुर संग्राम हुआ था। विष्णु पुराण में इसका वर्णन अध्याय नवम में किया गया है। पुराण में लिखा है कि देवाताओं और असुरों का संग्राम 12 वर्षों तक चला था।
इस संग्राम में देवताओं की हार हुई और असुरों की जीत हुई। असुरों ने देवताओं के राजा इंद्र को हराकर तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया।
देवता परास्त होकर जब बह्मा जी के पास पहुंचे तो उन्होने कहा देवता गण आप दुष्टों का संहार करने वाले भगवान विष्णु के पास जाओ वे ही संसार की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के कारण हैं।
वहां जाने से तुम्हारा कल्याण होगा। तब सारे देवगणों के साथ लोक पितामह श्री बह्मा जी स्वयं क्षीर सागर के तट पर गए। वहां पहुंच कर भगवान विष्णु की स्तुति की। इसके बाद भगवान प्रकट हो बोले मै तुम्हारा बल फिर बढ़ाऊंगा। इसके बाद देवताओं ने अपने गुरु बृहस्पति से विचार विमर्श किया और रक्षा विधान को कहा। तब सावन की पूर्णिमा को प्रात: काल रक्षा का विधान सम्पन्न किया गया।
येन बद्धोबली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मा चल:।।
इन मंत्र से गुरू ने सावन की पूर्णिमा के दिन रक्षा विधान किया। इंद्राणी ने इंद्र के दायें हाथ में रक्षा सूत्र को बांध दिया। इसी सूत्र के बल पर इंद्र ने दानवों पर विजय प्राप्त की।*
