ईरान-अमेरिका संघर्ष में Pakistan की एंट्री? नूर खान एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमानों की मौजूदगी के दावे से बढ़ी हलचल
News-Desk
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Donald Trump, Global Politics, international news, Iran Conflict, Iran Nuclear Program, Middle East crisis, pakistan, Pakistan Air Force, ईरान अमेरिका तनाव, ट्रम्प बयान, नूर खान एयरबेस, पाकिस्तान न्यूज़, होर्मुज स्ट्रेटपश्चिम एशिया में जारी United States और Iran के बीच तनाव के दौरान अब Pakistan की भूमिका को लेकर भी नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संघर्ष और सीजफायर के बीच ईरान ने अपने कुछ सैन्य विमानों को पाकिस्तान एयरफोर्स के नूर खान एयरबेस पर भेजा था।
इस दावे के सामने आने के बाद क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि अप्रैल में सीजफायर लागू होने के कुछ दिनों बाद कई ईरानी विमान पाकिस्तान पहुंचे थे।
रिपोर्ट में RC-130 विमान का जिक्र, खुफिया मिशन से जुड़ा माना जाता है एयरक्राफ्ट
रिपोर्ट के मुताबिक जिन विमानों को पाकिस्तान भेजा गया, उनमें ईरानी एयरफोर्स का RC-130 विमान भी शामिल था। यह विमान लॉकहीड C-130 हरक्यूलिस ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का विशेष संस्करण माना जाता है, जिसका उपयोग निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और विशेष सैन्य अभियानों में किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी संघर्ष की स्थिति में ऐसे विमानों की गतिविधियां बेहद संवेदनशील मानी जाती हैं। यही वजह है कि इस दावे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
हालांकि अब तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि इन विमानों का उद्देश्य क्या था और वे कितने समय तक पाकिस्तान में रहे।
पाकिस्तान ने स्वीकार की विमानों की मौजूदगी, लेकिन सैन्य भूमिका से किया इनकार
Pakistan के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर स्वीकार किया कि ईरानी विमान उसके एयरबेस पर पहुंचे थे, लेकिन उनका किसी सैन्य अभियान से कोई संबंध नहीं था।
पाकिस्तान ने कहा कि ये विमान युद्धविराम के दौरान आए थे और उन्हें केवल तकनीकी एवं अस्थायी व्यवस्था के तहत जगह दी गई थी। इस बयान के जरिए इस्लामाबाद ने खुद को सीधे संघर्ष से अलग दिखाने की कोशिश की है।
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान फिलहाल बेहद संतुलित रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि वह एक साथ अमेरिका, चीन और ईरान तीनों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है।
अफगानिस्तान में भी ईरानी विमानों की मौजूदगी का दावा
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि ईरान ने कुछ नागरिक विमानों को Afghanistan भी भेजा था। एक अफगान सिविल एविएशन अधिकारी के अनुसार माहान एयर का एक विमान युद्ध शुरू होने से पहले काबुल पहुंचा था और ईरानी एयरस्पेस बंद होने के बाद वहीं रुका रहा।
बाद में पाकिस्तान और तालिबान सरकार के बीच तनाव बढ़ने तथा काबुल एयरपोर्ट पर संभावित खतरे की आशंका के चलते उस विमान को सुरक्षा कारणों से हेरात एयरपोर्ट भेज दिया गया।
हालांकि तालिबान के मुख्य प्रवक्ता Zabihullah Mujahid ने अफगानिस्तान में ईरानी विमानों की मौजूदगी से इनकार किया है।
ईरान और चीन को नाराज नहीं करना चाहता पाकिस्तान
भूराजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इस पूरे संकट में बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रहा है। एक तरफ वह खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन और ईरान जैसे रणनीतिक साझेदारों को नाराज करने से भी बचना चाहता है।
रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले एक दशक में पाकिस्तान की सैन्य निर्भरता चीन पर काफी बढ़ गई है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्टडी के मुताबिक 2020 से 2024 के बीच पाकिस्तान को मिलने वाले लगभग 80 प्रतिशत बड़े हथियार चीन से आए।
इसी कारण पाकिस्तान के लिए क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
इस्लामाबाद में हुई थी अमेरिका-ईरान वार्ता, लेकिन नहीं बनी सहमति
रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल में इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का पहला दौर भी आयोजित किया गया था। यह वार्ता लगभग 21 घंटे तक चली, लेकिन किसी ठोस समझौते पर सहमति नहीं बन सकी।
बताया गया कि दोनों पक्षों के बीच होर्मुज स्ट्रेट के नियंत्रण और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर गंभीर मतभेद बने रहे। बाद में ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को एक प्रस्ताव भी भेजा, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने खारिज कर दिया।
ईरान ने युद्ध खत्म करने और प्रतिबंध हटाने का प्रस्ताव दिया था
रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की ओर से दिए गए प्रस्ताव में युद्ध समाप्त करने, फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा आर्थिक प्रतिबंधों में राहत की बात शामिल थी।
इसके अलावा परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत बातचीत जारी रखने की पेशकश भी की गई थी। हालांकि अमेरिका ने इस प्रस्ताव को पर्याप्त नहीं माना।
अमेरिका ने रखी यूरेनियम सौंपने की शर्त
अमेरिका ने इस सप्ताह ईरान को 14 सूत्रीय प्रस्ताव भेजा, जिसमें कहा गया कि ईरान को कम से कम 12 वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन रोकना होगा। इसके साथ ही उसके पास मौजूद लगभग 440 किलो 60 प्रतिशत एनरिच्ड यूरेनियम अमेरिका को सौंपने की शर्त भी रखी गई।
बदले में अमेरिका ने प्रतिबंधों में राहत, फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों को रिलीज करने और ईरानी बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की बात कही।
हालांकि रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और हाईली एनरिच्ड यूरेनियम पर पूरी तरह समझौता करने को तैयार नहीं है।
ट्रम्प बोले- ‘ईरान के साथ सीजफायर अब वेंटिलेटर पर’
Donald Trump ने हाल ही में कहा कि ईरान के साथ लागू सीजफायर अब “वेंटिलेटर” पर पहुंच चुका है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिए कि अमेरिका अब “पूर्ण जीत” चाहता है और दबाव की रणनीति जारी रखेगा।
ट्रम्प ने कहा कि ईरान यह सोचता है कि अमेरिका थक जाएगा या दबाव में आ जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं होने वाला। उन्होंने साफ किया कि वॉशिंगटन अपनी शर्तों पर ही किसी समझौते को स्वीकार करेगा।
उनके इस बयान के बाद एक बार फिर शांति वार्ता के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
होर्मुज स्ट्रेट और तेल बाजार पर बढ़ रहा असर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। खास तौर पर Strait of Hormuz को लेकर चिंता बढ़ी हुई है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल कारोबार इसी मार्ग से गुजरता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर बड़ा असर पड़ सकता है।

