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ट्रम्प की ईरान-अमेरिका पीस डील पर Israel का बड़ा विद्रोह! कहा- ‘हम अमेरिका के गुलाम नहीं’, सेना लेबनान-गाजा में रहेगी तैनात

Israel  जहां अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं तेज हैं, वहीं इजराइल ने इस समझौते को लेकर अपनी असहमति खुलकर जाहिर कर दी है।

इजराइल के वरिष्ठ नेताओं ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि चाहे अमेरिका और ईरान के बीच कोई भी समझौता हो जाए, इजराइल अपनी सुरक्षा नीति में कोई बदलाव करने के पक्ष में नहीं है। इस बयान ने क्षेत्रीय समीकरणों और भविष्य की सुरक्षा रणनीतियों को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।


‘हम अमेरिका के गुलाम नहीं’ – इजराइली मंत्री का तीखा बयान

इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री Itamar Ben-Gvir ने संभावित अमेरिका-ईरान समझौते पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

उन्होंने कहा कि इजराइल एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है तथा किसी अन्य देश के निर्णय उसके राष्ट्रीय हितों को निर्धारित नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका द्वारा किया गया कोई समझौता स्वतः इजराइल पर लागू नहीं होगा।

बेन ग्वीर का बयान इस बात का संकेत माना जा रहा है कि इजराइल की वर्तमान सरकार ईरान से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र रणनीति बनाए रखना चाहती है।


लेबनान, सीरिया और गाजा में बनी रहेगी इजराइली सैन्य मौजूदगी

इजराइल के रक्षा मंत्री Israel Katz ने भी सुरक्षा संबंधी रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि इजराइली सेना दक्षिणी लेबनान से पीछे नहीं हटेगी।

उन्होंने कहा कि लेबनान, सीरिया और गाजा के विभिन्न क्षेत्रों में बनाए गए सुरक्षा क्षेत्रों (Security Zones) में इजराइली सैन्य बलों की तैनाती जारी रहेगी।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार इन क्षेत्रों में सैनिकों की मौजूदगी का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना और संभावित खतरों को रोकना है। इजराइल का मानना है कि सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना उसकी रणनीतिक आवश्यकता है।


जेनेवा में हो सकती है ऐतिहासिक बैठक

रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच 19 जून को स्विट्जरलैंड के शहर Geneva में एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।

यदि यह बैठक निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होती है, तो इसे दोनों देशों के बीच दशकों में सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाओं में गिना जा सकता है।

विश्लेषकों का कहना है कि 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे में किसी उच्चस्तरीय समझौते की संभावना वैश्विक राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण विकास मानी जा रही है।


47 वर्षों बाद संबंधों में नई शुरुआत की उम्मीद

अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई दशकों से परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों, क्षेत्रीय संघर्षों और सुरक्षा मुद्दों को लेकर गंभीर मतभेद रहे हैं।

इसी कारण यदि प्रस्तावित समझौता सफल होता है तो इसे दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी प्रकार की सकारात्मक प्रगति का प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र की स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ सकता है।


समझौते से पहले ईरान की तीन प्रमुख शर्तें

US Iran Peace Agreement को लेकर ईरान ने अपनी कुछ प्रमुख शर्तें भी सामने रखी हैं। ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi के अनुसार आगे की बातचीत इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका पहले कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाता है या नहीं।

ईरान की ओर से बताई गई प्रमुख शर्तें हैं:

1. नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त की जाए

ईरान चाहता है कि समुद्री गतिविधियों और व्यापार पर प्रभाव डालने वाले प्रतिबंधात्मक कदमों को समाप्त किया जाए ताकि सामान्य आर्थिक गतिविधियां बहाल हो सकें।

2. सैन्य कार्रवाई और युद्ध संबंधी गतिविधियां रोकी जाएं

तेहरान का कहना है कि किसी भी दीर्घकालिक समझौते के लिए क्षेत्रीय सैन्य तनाव को कम करना आवश्यक है। इसलिए सभी प्रकार की सैन्य कार्रवाई और युद्ध संबंधी गतिविधियों को रोकने की मांग की गई है।

3. फ्रीज किए गए ईरानी फंड जारी किए जाएं

ईरान लंबे समय से विभिन्न देशों और वित्तीय संस्थानों में रोकी गई अपनी संपत्तियों और फंड तक पहुंच की मांग करता रहा है। यह मुद्दा भी वार्ता के प्रमुख बिंदुओं में शामिल बताया जा रहा है।


मध्य पूर्व की राजनीति पर पड़ सकता है बड़ा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता होता है तो उसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा।

इसका प्रभाव इजराइल, खाड़ी देशों, लेबनान, सीरिया, इराक और व्यापक मध्य पूर्व क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि इजराइल की प्रतिक्रिया को गंभीरता से देखा जा रहा है।

कई विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक गठबंधनों से जुड़े मुद्दे आने वाले दिनों में वैश्विक कूटनीति के केंद्र में बने रहेंगे।


आधिकारिक दस्तावेज का इंतजार, कई सवाल अब भी बाकी

फिलहाल संभावित समझौते का पूरा आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टता आना बाकी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अंतिम दस्तावेज सामने आने के बाद ही यह समझा जा सकेगा कि समझौते की वास्तविक शर्तें क्या हैं, अमेरिका कौन-से कदम उठाने को तैयार है और ईरान किन रियायतों के बदले आगे बढ़ेगा।

इसी तरह इजराइल की सुरक्षा चिंताओं और क्षेत्रीय रणनीति पर भी आगे की घटनाओं का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर जहां वैश्विक स्तर पर उम्मीदें और चर्चाएं बढ़ रही हैं, वहीं इजराइल ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सुरक्षा नीतियों से समझौता करने के पक्ष में नहीं है। लेबनान, सीरिया और गाजा में सैन्य मौजूदगी जारी रखने के संकेत तथा ईरान द्वारा रखी गई शर्तों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मध्य पूर्व की राजनीति अभी भी जटिल और संवेदनशील दौर से गुजर रही है। अब दुनिया की नजर जेनेवा में संभावित वार्ता और उससे निकलने वाले परिणामों पर टिकी हुई है।

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