Europe में गर्मी का ‘महासंकट’: 23 देशों में टूटे रिकॉर्ड, 20 हजार से ज्यादा मौतों का दावा; अर्थव्यवस्था को ₹11 लाख करोड़ की चपत!
News-Desk
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भीषण हीटवेव के कारण यूरोप के कई शहरों में अस्पतालों पर मरीजों का दबाव बढ़ा, बिजली की मांग तेजी से ऊपर गई, परिवहन व्यवस्था प्रभावित हुई और खेती को भारी नुकसान की आशंका पैदा हो गई। अलग-अलग अनुमानों में इस भीषण गर्मी के कारण 20 हजार से अधिक मौतों का दावा किया जा रहा है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि गर्मी का असर केवल लोगों के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। शुरुआती आर्थिक आकलन संकेत दे रहे हैं कि यूरोप को इस हीटवेव के कारण भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। एलियांज रिसर्च मॉडल पर आधारित गणनाओं के अनुसार, भीषण गर्मी यूरोपीय अर्थव्यवस्था को करीब ₹11 लाख करोड़ तक का झटका दे सकती है। वहीं, 2030 तक जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी के कारण यह आर्थिक नुकसान बढ़कर करीब ₹61 लाख करोड़ तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
23 देशों में टूटा गर्मी का रिकॉर्ड, स्पेन में 45 डिग्री पार पहुंचा तापमान
यूरोप में इस साल की गर्मी ने कई पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। कम से कम 23 देशों में जून के दौरान असामान्य और रिकॉर्ड तोड़ तापमान दर्ज किया गया।
स्पेन के कुछ इलाकों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड्स और ब्रिटेन में भी गर्मी ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए।
यूरोप के लिए इतनी अधिक गर्मी इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि महाद्वीप के अधिकांश शहर और इमारतें लंबे समय तक ठंडे मौसम को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं।
तापमान में अचानक और असामान्य वृद्धि के कारण घरों, कार्यालयों, अस्पतालों, नर्सिंग होम और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है।
20 हजार से ज्यादा मौतों का दावा, बुजुर्गों और बीमार लोगों पर सबसे बड़ा खतरा
यूरोप में भीषण गर्मी से होने वाली मौतों को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आ रहे हैं। इन अनुमानों में दावा किया जा रहा है कि इस साल की गर्मी से 20 हजार से अधिक लोगों की जान जा सकती है या जा चुकी है।
हीटवेव का सबसे गंभीर प्रभाव बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों पर पड़ता है।
अत्यधिक गर्मी में शरीर का तापमान नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर होने लगती है। लंबे समय तक गर्मी में रहने से डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक, किडनी संबंधी समस्याएं और हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
यूरोप की बढ़ती उम्र वाली आबादी के कारण भी हीटवेव को बड़ी स्वास्थ्य चुनौती माना जा रहा है।
₹11 लाख करोड़ तक का आर्थिक नुकसान, गर्मी ने बिगाड़ा यूरोप का हिसाब
भीषण गर्मी का असर अब यूरोप की अर्थव्यवस्था पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
एलियांज रिसर्च मॉडल के आधार पर की गई गणनाओं के अनुसार, इस हीटवेव से यूरोपीय अर्थव्यवस्था को करीब ₹11 लाख करोड़ तक का नुकसान हो सकता है।
गर्मी के कारण कर्मचारियों की उत्पादकता में गिरावट, बिजली की बढ़ती मांग, कृषि उत्पादन को नुकसान, पर्यटन गतिविधियों में बदलाव और बुनियादी ढांचे पर बढ़ता दबाव आर्थिक नुकसान के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तापमान बढ़ने की मौजूदा प्रवृत्ति जारी रहती है तो आने वाले वर्षों में यूरोप को और बड़े आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।
2030 तक ₹61 लाख करोड़ के नुकसान की आशंका
यूरोप के लिए चिंता केवल वर्तमान हीटवेव तक सीमित नहीं है।
आर्थिक अनुमानों के अनुसार, बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन के कारण वर्ष 2030 तक यूरोप को लगभग ₹61 लाख करोड़ तक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
यह नुकसान कृषि, ऊर्जा, स्वास्थ्य, श्रम उत्पादकता, पर्यटन और बुनियादी ढांचे सहित विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है।
गर्मी बढ़ने के साथ ही एयर कंडीशनिंग और बिजली की मांग भी बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
भारत में 45 डिग्री सह लेते हैं, फिर यूरोप में 36 डिग्री पर क्यों मच जाती है आफत?
यह सवाल अक्सर उठता है कि भारत के कई शहरों में लोग 45 डिग्री सेल्सियस तक तापमान का सामना करते हैं, जबकि यूरोप में 35 से 36 डिग्री तापमान भी गंभीर संकट क्यों पैदा कर देता है?
इसके पीछे केवल तापमान नहीं बल्कि नमी, शरीर की अनुकूलन क्षमता और बुनियादी ढांचे सहित कई कारण जिम्मेदार हैं।
भारत के कई क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी के दौरान वातावरण अपेक्षाकृत शुष्क होता है। ऐसी स्थिति में शरीर से निकलने वाला पसीना जल्दी सूख जाता है और शरीर को ठंडा रखने में मदद करता है।
इसके विपरीत यूरोप के कई हिस्सों में गर्मी के साथ अधिक नमी भी मौजूद रहती है।
जब वातावरण में नमी अधिक होती है तो शरीर से निकलने वाला पसीना आसानी से नहीं सूखता। परिणामस्वरूप शरीर स्वयं को प्रभावी तरीके से ठंडा नहीं कर पाता।
यही स्थिति स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
क्या है ‘वेट-बल्ब’ खतरा, जो स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी बन सकता है जानलेवा?
अत्यधिक तापमान और नमी के संयुक्त प्रभाव को समझने के लिए वैज्ञानिक वेट-बल्ब तापमान का इस्तेमाल करते हैं।
जब वातावरण अत्यधिक गर्म और नम होता है तो पसीना शरीर से निकलने के बावजूद तेजी से नहीं सूखता। इससे शरीर की प्राकृतिक कूलिंग प्रणाली कमजोर हो जाती है।
यदि ऐसी स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो शरीर का आंतरिक तापमान बढ़ सकता है।
इससे हीट स्ट्रोक, अंगों पर दबाव और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक वेट-बल्ब तापमान लंबे समय तक बने रहने पर स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी खतरनाक हो सकता है।
ब्रिटेन में एसी की बिक्री 330% बढ़ी, फ्रांस में 1000% तक उछाल
यूरोप में भीषण गर्मी का असर एयर कंडीशनर और कूलिंग उपकरणों के बाजार पर भी दिखाई दे रहा है।
ब्रिटेन में एसी की बिक्री में कथित तौर पर 330 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि फ्रांस में यह बढ़ोतरी 1000 प्रतिशत तक बताई जा रही है।
गर्मी बढ़ने के साथ कई बाजारों में एयर कंडीशनर का स्टॉक तेजी से कम होने लगा।
पंखों, पोर्टेबल कूलर और अन्य कूलिंग उपकरणों की मांग में भी कई गुना वृद्धि दर्ज की गई।
यूरोप में कभी एयर कंडीशनर को लग्जरी माना जाता था, लेकिन लगातार बढ़ते तापमान के कारण अब इसकी पहचान तेजी से आवश्यकता के रूप में बदल रही है।
यूरोप के केवल 20 प्रतिशत घरों में एसी, इसलिए बढ़ रहा संकट
यूरोप में हीटवेव के अधिक खतरनाक साबित होने का एक बड़ा कारण एयर कंडीशनिंग सुविधाओं की सीमित उपलब्धता भी है।
यूरोप के लगभग 20 प्रतिशत घरों में ही एयर कंडीशनिंग की सुविधा होने का अनुमान है।
इसके विपरीत अमेरिका में 90 प्रतिशत से अधिक घरों में एसी उपलब्ध होने की बात कही जाती है।
यूरोप की अधिकांश इमारतों को पारंपरिक रूप से ठंडे मौसम के अनुरूप बनाया गया है। कई इमारतों का डिजाइन ऐसा है कि वे सर्दियों में गर्मी को अंदर बनाए रखने में मदद करती हैं।
लेकिन यही विशेषता भीषण गर्मी के दौरान परेशानी पैदा कर सकती है।
जब बाहरी तापमान बढ़ता है तो कई घरों, अस्पतालों और नर्सिंग होम में अंदर का तापमान भी असहनीय स्तर तक पहुंच जाता है।
हीटवेव के पीछे ‘ओमेगा ब्लॉक’, गर्म हवा को यूरोप पर रोके हुए है मौसम का यह पैटर्न
यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के पीछे ओमेगा ब्लॉक नामक मौसम पैटर्न को एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है।
ओमेगा ब्लॉक उस स्थिति को कहा जाता है जब एक हाई-प्रेशर सिस्टम दो लो-प्रेशर सिस्टम के बीच फंस जाता है।
मौसम के नक्शे पर इसकी आकृति ग्रीक भाषा के अक्षर ओमेगा जैसी दिखाई देती है, इसलिए इसे ओमेगा ब्लॉक कहा जाता है।
कैसे काम करता है ओमेगा ब्लॉक और क्यों बढ़ जाती है गर्मी?
जब हाई-प्रेशर सिस्टम किसी क्षेत्र के ऊपर लंबे समय तक स्थिर रहता है तो वह गर्म हवा को उसी स्थान पर रोक देता है।
इस दौरान बादल कम बनते हैं, बारिश की संभावना घटती है और जमीन लगातार सूर्य की गर्मी को सोखती रहती है।
दिन गुजरने के साथ जमीन और वातावरण का तापमान बढ़ता जाता है।
यदि यह मौसम पैटर्न कई दिनों या हफ्तों तक बना रहे तो गंभीर हीटवेव पैदा हो सकती है।
उत्तरी अफ्रीका और भूमध्यसागर की गर्म हवा यूरोप पर फंसी
यूरोप की मौजूदा हीटवेव के दौरान ओमेगा ब्लॉक ने उत्तरी अफ्रीका और भूमध्यसागर से आने वाली गर्म हवा को यूरोप के ऊपर लंबे समय तक रोकने में भूमिका निभाई।
इसके कारण कई देशों में तापमान लगातार बढ़ता गया।
स्पेन, फ्रांस, इटली और अन्य यूरोपीय देशों के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच गया।
विशेषज्ञों के अनुसार जब गर्म हवा लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में फंसी रहती है तो रात के समय भी तापमान में पर्याप्त गिरावट नहीं आती।
इस कारण शरीर को गर्मी से उबरने का समय नहीं मिल पाता और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ जाते हैं।
एक तरफ गर्मी और सूखा, दूसरी तरफ भारी बारिश और बाढ़ का खतरा
ओमेगा ब्लॉक केवल गर्मी ही नहीं बढ़ाता बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में विपरीत मौसम स्थितियां भी पैदा कर सकता है।
जहां हाई-प्रेशर सिस्टम मौजूद रहता है, वहां लंबे समय तक गर्मी और सूखे की स्थिति बन सकती है।
इसके विपरीत लो-प्रेशर सिस्टम वाले क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
यही कारण है कि एक ही समय में यूरोप के कुछ हिस्सों में रिकॉर्ड गर्मी और दूसरे हिस्सों में अत्यधिक बारिश जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन ने ओमेगा ब्लॉक को क्यों बना दिया ज्यादा खतरनाक?
ओमेगा ब्लॉक कोई नया मौसम पैटर्न नहीं है। इस प्रकार की परिस्थितियां पहले भी बनती रही हैं।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक तापमान ने ऐसे मौसम पैटर्न के प्रभाव को और अधिक गंभीर बना दिया है।
जब पृथ्वी का औसत तापमान पहले से अधिक हो तो किसी क्षेत्र में फंसी गर्म हवा भी पहले की तुलना में ज्यादा गर्म हो सकती है।
इसका सीधा प्रभाव हीटवेव की तीव्रता और अवधि पर पड़ता है।
दुनिया में सबसे तेजी से गर्म हो रहा यूरोप
यूरोप को दुनिया में सबसे तेजी से गर्म हो रहे महाद्वीपों में गिना जा रहा है।
लगातार बढ़ते तापमान के कारण हीटवेव की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्र रूप में सामने आने की चिंता बढ़ गई है।
दक्षिणी यूरोप के देशों के लिए स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।
स्पेन, इटली और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में पानी की कमी, जंगलों में आग और कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ने का खतरा बना हुआ है।
अगले साल तक 34 प्रतिशत आबादी पर जल संकट का खतरा
यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी के अनुमान के अनुसार, अगले साल तक यूरोप की लगभग 34 प्रतिशत आबादी जल संकट की चपेट में आ सकती है।
दक्षिणी यूरोप में स्थिति और गंभीर हो सकती है, क्योंकि गर्मियों के दौरान पानी की मांग तेजी से बढ़ती है।
तापमान बढ़ने से घरेलू उपयोग, कृषि और औद्योगिक गतिविधियों के लिए पानी की आवश्यकता बढ़ जाती है।
वहीं, कम बारिश और लंबे सूखे के कारण जलाशयों और नदियों में पानी का स्तर कम हो सकता है।
कृषि क्षेत्र पर दोहरी मार, फसल उत्पादन घटने का खतरा
यूरोप की हीटवेव का गंभीर प्रभाव कृषि क्षेत्र पर भी पड़ रहा है।
अत्यधिक तापमान के कारण मिट्टी में नमी कम होती है और सिंचाई के लिए पानी की मांग बढ़ जाती है।
यदि जल संकट गहराता है तो किसानों के लिए फसलों को बचाना मुश्किल हो सकता है।
फसल उत्पादन में कमी का असर खाद्य कीमतों पर भी पड़ सकता है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक गर्मी और सूखे की स्थिति बने रहने से अनाज, फल और सब्जियों सहित कई कृषि उत्पाद प्रभावित हो सकते हैं।
बिजली ग्रिड पर बढ़ा दबाव, कूलिंग की मांग से खपत में उछाल
एयर कंडीशनर और अन्य कूलिंग उपकरणों की बढ़ती मांग के कारण यूरोप के बिजली ग्रिड पर भी दबाव बढ़ रहा है।
गर्मी बढ़ने के साथ बिजली की खपत तेजी से ऊपर जाती है।
यदि बिजली की मांग उत्पादन और वितरण क्षमता से अधिक हो जाए तो ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
इससे बिजली कटौती या ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का खतरा पैदा हो सकता है।
पर्यटन उद्योग भी गर्मी से प्रभावित
यूरोप दुनिया के सबसे लोकप्रिय पर्यटन क्षेत्रों में शामिल है, लेकिन बढ़ती गर्मी पर्यटन उद्योग के लिए भी नई चुनौती बन रही है।
गर्मियों में बड़ी संख्या में पर्यटक स्पेन, फ्रांस, इटली और अन्य यूरोपीय देशों की यात्रा करते हैं।
लेकिन अत्यधिक तापमान के कारण पर्यटकों की पसंद और यात्रा के समय में बदलाव आने की संभावना है।
यदि दक्षिणी यूरोप में गर्मियां लगातार अधिक गर्म होती हैं तो पर्यटक अपेक्षाकृत ठंडे क्षेत्रों की ओर रुख कर सकते हैं।
इसका सीधा प्रभाव स्थानीय होटल, रेस्तरां, परिवहन और पर्यटन उद्योग से जुड़े कारोबारों पर पड़ सकता है।
अस्पतालों और नर्सिंग होम पर सबसे ज्यादा दबाव
हीटवेव के दौरान अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ सकती है।
डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक, हृदय रोग और सांस संबंधी समस्याओं से प्रभावित लोगों को चिकित्सा सहायता की आवश्यकता पड़ती है।
बुजुर्गों की बड़ी आबादी वाले यूरोपीय देशों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
नर्सिंग होम और अस्पतालों की कई पुरानी इमारतों में पर्याप्त कूलिंग सिस्टम न होने के कारण मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों दोनों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
गर्मी अब मौसम नहीं, यूरोप के लिए आर्थिक और सामाजिक चुनौती
यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने स्पष्ट कर दिया है कि हीटवेव का असर केवल बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है।
इसका सीधा प्रभाव स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, कृषि, ऊर्जा, जल संसाधन, परिवहन और पर्यटन पर पड़ रहा है।
यूरोपीय देशों के सामने अब बड़ी चुनौती यह है कि वे भविष्य में अधिक तीव्र और लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव के लिए अपने शहरों और बुनियादी ढांचे को किस तरह तैयार करते हैं।

