Allahabad High Court का अहम फैसला: केवल लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर चरित्र प्रमाणपत्र से इनकार नहीं किया जा सकता
News-Desk
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Allahabad High Court, Allahabad High Court Character Certificate, Allahabad High Court Order, Bharat Lal Gupta Case, Character Certificate Judgment, pending criminal caseAllahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होने के आधार पर उसका चरित्र प्रमाणपत्र (Character Certificate) जारी करने या उसका नवीनीकरण करने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा संबंधित व्यक्ति को दोषी करार नहीं दिया जाता, तब तक केवल लंबित मुकदमे के आधार पर उसके चरित्र पर प्रतिकूल टिप्पणी करना कानून की दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए जालौन निवासी भरत लाल गुप्ता की याचिका स्वीकार कर ली और जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) द्वारा पारित आदेश को निरस्त करते हुए निर्धारित प्रारूप में तीन सप्ताह के भीतर उनका चरित्र प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया।
खंडपीठ ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला
यह निर्णय न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने सुनाया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि जब तक किसी व्यक्ति का अपराध न्यायालय में सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक उसे दोषी नहीं माना जा सकता। केवल किसी मुकदमे का लंबित होना किसी व्यक्ति के चरित्र को संदिग्ध घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता।
क्या था पूरा मामला?
मामला जालौन निवासी भरत लाल गुप्ता से जुड़ा है।
उन्होंने अपने चरित्र प्रमाणपत्र के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था। हालांकि, जिला मजिस्ट्रेट ने 1 नवंबर 2021 को उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया।
डीएम ने अपने आदेश में कहा था कि याची के खिलाफ वर्ष 2018 का एक आपराधिक मुकदमा लंबित है, जिसमें मारपीट और गाली-गलौज से संबंधित आरोप लगाए गए हैं। इसी लंबित मुकदमे के आधार पर चरित्र प्रमाणपत्र का नवीनीकरण करने से इनकार कर दिया गया।
इस निर्णय को चुनौती देते हुए भरत लाल गुप्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने कहा—दोष सिद्ध होने तक व्यक्ति निर्दोष माना जाता है
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत यह है कि जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध नहीं किया जाता, तब तक प्रत्येक व्यक्ति निर्दोष माना जाता है।
अदालत ने कहा कि केवल लंबित मुकदमे के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र को नकारात्मक रूप से आंकना न्यायसंगत नहीं होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक अधिकारियों को किसी भी आवेदन पर निर्णय लेते समय केवल मुकदमे के लंबित होने को ही अंतिम आधार नहीं बनाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के ‘अवतार सिंह’ फैसले का दिया हवाला
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘अवतार सिंह’ मामले में दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय का भी उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि यदि किसी अभ्यर्थी ने अपने विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामले की जानकारी सही और पूरी तरह दी है तथा कोई तथ्य नहीं छिपाया है, तो सक्षम प्राधिकारी को प्रत्येक मामले का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करना चाहिए।
निर्णय लेते समय केवल मुकदमे के अस्तित्व को नहीं, बल्कि—
- आरोपों की प्रकृति,
- मामले की गंभीरता,
- उपलब्ध परिस्थितियों,
- तथा अन्य प्रासंगिक तथ्यों
को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
केवल लंबित मुकदमा आवेदन खारिज करने का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा केवल विचाराधीन है और उसका अंतिम निर्णय अभी नहीं आया है, तो मात्र इसी आधार पर उसका आवेदन अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक निर्णय विवेकपूर्ण, संतुलित और कानून के अनुरूप होने चाहिए। प्रत्येक मामले के तथ्यों का अलग-अलग परीक्षण करना आवश्यक है।
डीएम का आदेश किया निरस्त
मामले में उपलब्ध अभिलेखों और कानूनी स्थिति का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित अधिकारी निर्धारित प्रारूप में तीन सप्ताह के भीतर याची भरत लाल गुप्ता का चरित्र प्रमाणपत्र जारी करें।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लंबित मुकदमे का हवाला देकर चरित्र प्रमाणपत्र रोका जाना विधिसम्मत नहीं माना जा सकता।
चरित्र प्रमाणपत्र क्यों होता है महत्वपूर्ण?
चरित्र प्रमाणपत्र कई सरकारी और निजी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। इसका उपयोग रोजगार, लाइसेंस, अनुबंध, सुरक्षा संबंधी अनुमति और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।
ऐसे में यदि केवल लंबित मुकदमे के आधार पर चरित्र प्रमाणपत्र रोक दिया जाए, तो इसका सीधा प्रभाव संबंधित व्यक्ति के अधिकारों और भविष्य के अवसरों पर पड़ सकता है।
इसी कारण अदालतों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक निर्णय तथ्यों और कानून के अनुरूप होने चाहिए तथा किसी व्यक्ति को दोष सिद्ध होने से पहले दोषी मानने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।
फैसले का व्यापक कानूनी महत्व
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि किसी भी आवेदन पर निर्णय लेते समय केवल मुकदमे के लंबित होने की स्थिति पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक मामले की प्रकृति, आरोपों की गंभीरता, आवेदक द्वारा दी गई जानकारी तथा उपलब्ध कानूनी स्थिति का समग्र मूल्यांकन आवश्यक होगा।
यह निर्णय प्राकृतिक न्याय और निर्दोषता की संवैधानिक अवधारणा को भी मजबूत करता है, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति को न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने से पहले अपराधी नहीं माना जा सकता।
प्रशासनिक निर्णयों में संतुलन बनाए रखने पर जोर
हाईकोर्ट की टिप्पणी से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक अधिकारियों को अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कानून के अनुरूप और संतुलित तरीके से करना चाहिए।
यदि आवेदक ने किसी आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई नहीं है और मुकदमा अभी विचाराधीन है, तो केवल उसी आधार पर उसके अधिकारों को सीमित करना न्यायसंगत नहीं होगा।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन ही प्रशासनिक न्याय का आधार होना चाहिए।

