कंधों पर बहंगी, पलड़ों में बैठे नन्हे शिवभक्त: Muzaffarnagar के शिव चौक पर पिता की अनोखी कांवड़ बनी आस्था और संस्कारों की मिसाल
News-Desk
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Kanwar Yatra News, Muzaffarnagar News, कांवड़ यात्रा 2026, धार्मिक समाचार, परिवार, भोलेनाथ, मुज़फ्फरनगर न्यूज़, शिव चौक, श्रावण मास, सनातन संस्कृति, हरिद्वार कांवड यात्राMuzaffarnagar के ऐतिहासिक शिव चौक पर एक ऐसा भावनात्मक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला, जिसने हजारों श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर पैदल लौट रहे दिल्ली निवासी सतीश अपनी कांवड़ यात्रा के कारण नहीं, बल्कि अपनी अनोखी बहंगी (कांवड़) की वजह से चर्चा का केंद्र बन गए।
सतीश ने अपनी बहंगी के दोनों पलड़ों में अपने दो छोटे बच्चों को बैठाया हुआ था। एक ओर उनकी पांच वर्षीय बेटी बैठी थी, जबकि दूसरे पलड़े में उनका ढाई वर्षीय बेटा मुस्कुराते हुए यात्रा का हिस्सा बना हुआ था। कंधों पर बच्चों का भार और हाथों में श्रद्धा का संकल्प लिए सतीश जब शिव चौक पहुंचे तो वहां मौजूद श्रद्धालु इस दृश्य को देखकर भावुक हो उठे। “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयघोषों के बीच लोगों ने इस अनोखी कांवड़ और पिता के समर्पण को नमन किया।
बच्चों को सनातन संस्कृति से जोड़ने का अनूठा संकल्प
सतीश ने बताया कि इस यात्रा का उद्देश्य केवल हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करना नहीं है, बल्कि अपने बच्चों को बचपन से ही सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और श्रेष्ठ जीवन मूल्यों से जोड़ना भी है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में बच्चों को केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार देना भी उतना ही आवश्यक है। यदि बचपन से ही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से परिचय कराया जाए तो आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है।
सतीश का मानना है कि परिवार ही बच्चों की पहली पाठशाला होता है और माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कार जीवनभर उनके व्यक्तित्व का आधार बनते हैं।
‘बचपन के संस्कार ही बनाते हैं जिम्मेदार नागरिक’
यात्रा के दौरान बातचीत में सतीश ने कहा कि बच्चों को केवल किताबों से शिक्षा नहीं मिलती, बल्कि जीवन के अनुभव और पारिवारिक परंपराएं भी उन्हें सही दिशा देती हैं।
उनका कहना था कि यदि बच्चों को बचपन से ही महिलाओं का सम्मान, भारतीय संस्कृति पर गर्व, धार्मिक आस्था और मानवीय मूल्यों की शिक्षा दी जाए, तो वे आगे चलकर जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनते हैं।
इसी सोच के साथ उन्होंने अपने दोनों बच्चों को इस कठिन धार्मिक यात्रा का सहभागी बनाया, ताकि वे बचपन से ही आस्था और संस्कृति का महत्व समझ सकें।
हर दिन 10 से 15 किलोमीटर का पैदल सफर
सतीश अपनी टोली के साथ प्रतिदिन लगभग 10 से 15 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर रहे हैं।
कंधों पर बहंगी के दोनों ओर बैठे बच्चों का भार होने के बावजूद उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि संतोष और श्रद्धा साफ दिखाई देती है। उनका कहना है कि भगवान भोलेनाथ की कृपा से पूरी यात्रा सहज और आनंदमयी महसूस हो रही है।
उन्होंने बताया कि रास्ते में मिलने वाले श्रद्धालुओं और सेवा शिविरों के सहयोग से यात्रा और भी प्रेरणादायक बन जाती है। लोग बच्चों को देखकर उत्साहित होते हैं और उनका हौसला बढ़ाते हैं।
भोलेनाथ की कृपा से कठिन यात्रा भी लग रही आसान
सतीश का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में दो छोटे बच्चों को लेकर इतनी लंबी पैदल यात्रा करना निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन जब मन में श्रद्धा और विश्वास हो तो कठिन रास्ते भी सरल लगने लगते हैं।
उन्होंने कहा कि पूरी यात्रा के दौरान उन्हें भगवान शिव की विशेष कृपा का अनुभव हो रहा है। मौसम की कठिनाइयों और लंबी दूरी के बावजूद उनके उत्साह में कोई कमी नहीं आई है।
उनके अनुसार, कांवड़ यात्रा केवल पैदल चलने का नाम नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन, धैर्य और ईश्वर के प्रति समर्पण का भी प्रतीक है।
मन्नत पूरी होने पर केदारनाथ धाम जाने का संकल्प
सतीश की पत्नी अंजलि ने बताया कि उनके बेटे के जन्म के बाद परिवार ने भगवान शिव के प्रति एक मन्नत मांगी थी।
उन्होंने बताया कि बेटे की मन्नत पूरी होने के बाद परिवार ने बाबा केदारनाथ धाम के दर्शन करने का संकल्प लिया था। अब कांवड़ यात्रा सकुशल संपन्न होने के बाद पूरा परिवार केदारनाथ धाम की यात्रा करेगा।
अंजलि ने कहा कि परिवार के लिए यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति आस्था और कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम भी है।
शिव चौक पर उमड़ा श्रद्धालुओं का हुजूम
मुजफ्फरनगर के ऐतिहासिक शिव चौक पर जैसे ही सतीश अपनी बहंगी के साथ पहुंचे, वहां मौजूद श्रद्धालुओं की नजरें उनकी ओर टिक गईं।
बहंगी के दोनों ओर बैठे मासूम बच्चों को देखकर लोग भावुक हो उठे। अनेक श्रद्धालुओं ने परिवार की आस्था और समर्पण की सराहना की। कई लोगों ने इस दृश्य को अपने मोबाइल फोन में भी कैद किया।
चारों ओर गूंज रहे “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयघोषों के बीच यह दृश्य कांवड़ यात्रा के सबसे प्रेरणादायक क्षणों में से एक बन गया।
कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, संस्कारों की परंपरा भी
श्रावण मास की कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाने की धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है। यह यात्रा समाज में अनुशासन, सेवा, सहयोग, परिवार और सांस्कृतिक मूल्यों को भी मजबूत करती है।
हर वर्ष लाखों श्रद्धालु अपने परिवार के साथ इस यात्रा में शामिल होते हैं। कई लोग अपने बच्चों को भी यात्रा का हिस्सा बनाते हैं ताकि वे भारतीय परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं को निकट से समझ सकें।
सतीश का यह प्रयास भी इसी भावना को दर्शाता है कि अगली पीढ़ी केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ी रहे।
श्रद्धा और परिवार का अद्भुत संगम बना यह दृश्य
कांवड़ यात्रा के दौरान अनेक भावनात्मक दृश्य देखने को मिलते हैं, लेकिन शिव चौक पर दिखाई दिया यह दृश्य श्रद्धा, पारिवारिक प्रेम और संस्कारों का एक अनूठा उदाहरण बन गया।
जहां एक ओर पिता अपने दोनों बच्चों को सुरक्षित बहंगी में बैठाकर भगवान शिव की यात्रा पूरी कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर बच्चे भी मासूम मुस्कान के साथ इस आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा बने हुए थे। इस दृश्य ने वहां मौजूद श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया और कई लोगों ने इसे भारतीय पारिवारिक परंपराओं और आस्था का सुंदर प्रतीक बताया।

