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Bangladesh में 35 साल बाद राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला: BNP प्रत्याशी फखरुल की जीत तय; कट्टरपंथी जमात ने रिटायर्ड आर्मी अफसर को उम्मीदवार बनाया

Bangladesh  में करीब 35 साल बाद राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवार आमने-सामने हैं। 1991 के बाद यह पहला अवसर है जब राष्ट्रपति चुनाव निर्विरोध होने के बजाय वास्तविक मुकाबले की ओर बढ़ रहा है।

सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP ने गुरुवार को अपने महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया। दूसरी ओर, जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन की ओर से लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त कर्नल ओली अहमद ने भी अपना नामांकन दाखिल कर दिया है।

राष्ट्रपति पद के लिए मतदान 20 अगस्त को होना है।

हालांकि संख्या बल BNP के पक्ष में दिखाई देता है। बांग्लादेश में राष्ट्रपति का चुनाव जनता सीधे नहीं करती, बल्कि संसद सदस्य मतदान करते हैं। फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP को संसद में दो-तिहाई बहुमत मिलने के कारण मिर्जा फखरुल की जीत की संभावना मजबूत मानी जा रही है।

फिर भी 35 साल बाद विपक्षी उम्मीदवार के मैदान में उतरने से इस चुनाव ने बांग्लादेश की राजनीति में नया राजनीतिक संदेश जरूर पैदा किया है।

1991 के बाद पहली बार राष्ट्रपति पद पर आमने-सामने होंगे दो उम्मीदवार

बांग्लादेश के राष्ट्रपति चुनाव का इतिहास काफी अलग रहा है। देश में राष्ट्रपति पद के लिए अब तक 12 चुनाव हो चुके हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश में वास्तविक मुकाबला देखने को नहीं मिला।

आठ बार राष्ट्रपति निर्विरोध चुने गए। 1991 में आखिरी बार दो उम्मीदवार राष्ट्रपति पद के लिए आमने-सामने आए थे।

इसके बाद लंबे समय तक विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार उतारने से परहेज किया। नतीजा यह रहा कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव की प्रक्रिया तकनीकी रूप से जारी रहने के बावजूद मतदाताओं की तरह सांसदों के बीच भी वास्तविक मुकाबले की स्थिति नहीं बनती थी।

अब 2026 में स्थिति बदलती दिखाई दे रही है।

20 अगस्त को सांसद करेंगे राष्ट्रपति का चुनाव

बांग्लादेश की संवैधानिक व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता के वोट से नहीं होता। संसद के सदस्य राष्ट्रपति चुनते हैं।

इसलिए 20 अगस्त को होने वाला मतदान आम जनता के लिए सीधे मतदान का अवसर नहीं होगा। संसद में मौजूद सांसद ही राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के पक्ष या विपक्ष में मतदान करेंगे।

फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP को संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल हुआ था। ऐसे में पार्टी के उम्मीदवार मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर के पक्ष में पर्याप्त संख्या बल मौजूद है।

यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषण में उनकी जीत की संभावना फिलहाल काफी मजबूत मानी जा रही है।

BNP ने महासचिव मिर्जा फखरुल को बनाया उम्मीदवार

सत्तारूढ़ BNP ने गुरुवार को पार्टी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया।

उम्मीदवारी मिलने के बाद फखरुल ने पार्टी महासचिव का पद और पार्टी की स्थायी समिति की सदस्यता छोड़ दी। इसी दिन उनका नामांकन पत्र चुनाव आयोग में जमा कराया गया।

उनके लिए यह चुनाव सिर्फ राष्ट्रपति पद की दौड़ नहीं है, बल्कि लगभग छह दशक लंबे राजनीतिक सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर अब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की दावेदारी तक पहुंच चुका है।

छात्र राजनीति से शुरू हुई थी फखरुल की राजनीतिक यात्रा

मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का राजनीतिक सफर करीब छह दशक पुराना बताया जाता है।

1960 के दशक में ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान उन्होंने छात्र राजनीति में कदम रखा। उस समय वह ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े हुए थे।

1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ बड़े जन आंदोलन के दौरान फखरुल छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। वह ढाका विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष थे।

राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तारी का सामना भी करना पड़ा।

यह वह दौर था जब पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक असंतोष तेजी से बढ़ रहा था और बंगाली राष्ट्रवाद की आवाज मजबूत होती जा रही थी।

राजनीति से पहले शिक्षक रहे फखरुल

छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद फखरुल ने तुरंत पूर्णकालिक राजनीति का रास्ता नहीं चुना।

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में करियर बनाया। 1972 में वह ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने।

बाद में उन्होंने कई सरकारी कॉलेजों में भी अध्यापन किया।

शिक्षक के रूप में काम करने के दौरान उनका सार्वजनिक जीवन से जुड़ाव बना रहा, लेकिन सक्रिय दलीय राजनीति में उनकी निर्णायक वापसी बाद में हुई।

1986 में सरकारी नौकरी छोड़ी, फिर राजनीति में आए

मिर्जा फखरुल ने 1986 में सरकारी नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया।

इसके बाद उन्होंने स्थानीय राजनीति से अपना राजनीतिक आधार मजबूत किया। 1988 में वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ठाकुरगांव नगरपालिका के चेयरमैन चुने गए।

यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

स्थानीय राजनीति में मिली सफलता ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ने का रास्ता दिया।

1990 के दशक में BNP से जुड़े

1990 के दशक की शुरुआत में फखरुल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी से जुड़े।

1992 में वह BNP की ठाकुरगांव जिला इकाई के प्रमुख बने। इसी दौर में उनकी पहचान पार्टी के भीतर तेजी से मजबूत हुई।

स्थानीय संगठन में जिम्मेदारी संभालने के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ता गया।

2001 में पहली बार सांसद बने

2001 के आम चुनाव में मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर BNP के टिकट पर ठाकुरगांव-1 सीट से सांसद चुने गए।

यह उनके राष्ट्रीय राजनीतिक करियर की बड़ी उपलब्धि थी।

BNP की सरकार बनने के बाद उन्हें कृषि राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई। बाद में उन्होंने नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री के रूप में भी काम किया।

सरकार में मंत्री के तौर पर उनके अनुभव ने पार्टी के भीतर उनकी स्थिति और मजबूत की।

कार्यवाहक महासचिव से पार्टी के स्थायी नेतृत्व तक

2011 में मिर्जा फखरुल को BNP का कार्यवाहक महासचिव बनाया गया।

पार्टी संगठन और राजनीतिक गतिविधियों में उनकी सक्रियता के बाद 2016 में उन्हें आधिकारिक रूप से BNP का महासचिव नियुक्त किया गया।

करीब एक दशक तक वह इस महत्वपूर्ण पद पर रहे।

इस दौरान उन्होंने पार्टी के राजनीतिक अभियानों, संगठनात्मक गतिविधियों और नेतृत्व के साथ समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अब राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के बाद उन्होंने महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया है।

फखरुल के सामने अब संवैधानिक पद की दौड़

BNP महासचिव के तौर पर लंबी राजनीतिक भूमिका निभाने के बाद फखरुल अब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं।

राष्ट्रपति का पद बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था में संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और सरकार के पास रहती है, लेकिन राष्ट्रपति देश के संवैधानिक ढांचे में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

इसलिए फखरुल की उम्मीदवारी BNP के लिए राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

जमात गठबंधन ने भी उतारा उम्मीदवार

इस चुनाव को खास बनाने वाली दूसरी बड़ी बात यह है कि विपक्षी खेमे ने भी अपना उम्मीदवार मैदान में उतार दिया है।

जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन की ओर से लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष सेवानिवृत्त कर्नल ओली अहमद ने नामांकन दाखिल किया है।

ओली अहमद बांग्लादेश की राजनीति और सैन्य इतिहास दोनों में पहचान रखने वाला नाम हैं।

उनकी उम्मीदवारी ने राष्ट्रपति चुनाव को औपचारिकता के बजाय मुकाबले का रूप दे दिया है।

कर्नल ओली अहमद का सैन्य और राजनीतिक अतीत

सेवानिवृत्त कर्नल ओली अहमद को बांग्लादेश के प्रमुख सैन्य वीरता सम्मानों में शामिल ‘वीर विक्रम’ सम्मान से नवाजा जा चुका है।

वह 1971 के बांग्लादेश लिबरेशन वॉर में भी शामिल रहे थे।

सेना से वर्ष 1980 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा।

उनका सैन्य अनुभव और राजनीतिक जीवन उन्हें विपक्षी गठबंधन के लिए अलग पहचान वाला उम्मीदवार बनाता है।

BNP के शुरुआती संस्थापकों में शामिल रहे ओली अहमद

राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में ओली अहमद BNP से जुड़े और पार्टी के शुरुआती संस्थापकों में शामिल रहे।

वह खालिदा जिया के करीबी नेताओं में भी गिने जाते थे।

1991 में BNP की सरकार बनने के बाद ओली अहमद को संचार मंत्री बनाया गया।

इसके अलावा उन्होंने युवा विकास और बिजली-ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़े मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी संभाली।

BNP से अलग होकर बनाई LDP

समय के साथ ओली अहमद और BNP नेतृत्व के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ी।

2006 में उन्होंने BNP से अलग होकर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी यानी LDP का गठन किया और बाद में इसके अध्यक्ष बने।

वह कई बार संसद सदस्य भी रह चुके हैं।

अब राष्ट्रपति चुनाव में उनकी उम्मीदवारी उसी राजनीतिक यात्रा का नया चरण है।

एक तरफ सत्ता का संख्या बल, दूसरी तरफ विपक्ष का राजनीतिक संदेश

राष्ट्रपति चुनाव में दोनों उम्मीदवारों की स्थिति अलग-अलग है।

मिर्जा फखरुल के पक्ष में BNP का भारी संसदीय बहुमत है। दूसरी ओर ओली अहमद की उम्मीदवारी का महत्व इस बात में है कि 1991 के बाद पहली बार राष्ट्रपति पद पर वास्तविक मुकाबला देखने को मिलेगा।

इसलिए भले ही चुनाव का परिणाम संख्या बल के आधार पर काफी हद तक स्पष्ट माना जा रहा हो, लेकिन विपक्ष का उम्मीदवार चुनाव को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।

35 साल बाद सांसदों को वास्तव में करना होगा मतदान

1991 के बाद लगातार राष्ट्रपति चुनावों में विपक्षी उम्मीदवारों की अनुपस्थिति के कारण सांसदों के सामने वास्तविक विकल्प नहीं रहा।

2026 में दो उम्मीदवार होने के कारण संसद में मतदान होगा।

इसका मतलब यह भी है कि लंबे समय बाद राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया बांग्लादेश की राजनीति में सार्वजनिक चर्चा का विषय बनी है।

यह बदलाव अपने आप में राजनीतिक वातावरण में आए परिवर्तन का संकेत माना जा सकता है।

राष्ट्रपति चुनाव का इतिहास 1974 से शुरू हुआ

बांग्लादेश में संविधान लागू होने के बाद पहला राष्ट्रपति चुनाव 1974 में हुआ था।

उस समय सांसदों ने मतदान कर मोहम्मद मोहम्मदुल्लाह को राष्ट्रपति चुना था।

बाद में देश की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

1975 में संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति के चुनाव की व्यवस्था बदलकर जनता के सीधे मतदान पर आधारित कर दी गई।

1978, 1981 और 1986 में जनता ने चुना राष्ट्रपति

संवैधानिक बदलाव के बाद 1978, 1981 और 1986 में राष्ट्रपति का चुनाव जनता के सीधे वोट से हुआ।

इन चुनावों में राष्ट्रपति पद के लिए व्यापक राजनीतिक गतिविधियां देखने को मिलीं।

इसके बाद 1991 में बांग्लादेश फिर संसदीय व्यवस्था की ओर लौटा और राष्ट्रपति के चुनाव की जिम्मेदारी संसद सदस्यों को दी गई।

इसी वर्ष आखिरी बार दो उम्मीदवारों के बीच राष्ट्रपति चुनाव हुआ था।

1991 के बाद लगातार निर्विरोध चुनाव

1991 के बाद राष्ट्रपति चुनावों में विपक्ष की ओर से उम्मीदवार नहीं उतारे जाने के कारण मुकाबला खत्म हो गया।

2023 तक राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में सभी राष्ट्रपति निर्विरोध चुने गए।

इसका अर्थ यह नहीं था कि राष्ट्रपति पद का चुनाव नहीं होता था, बल्कि संसद में मतदान की प्रक्रिया वास्तविक प्रतिस्पर्धा के बिना पूरी होती रही।

अब 2026 में दो उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से यह परंपरा टूट रही है।

BNP के दो-तिहाई बहुमत ने फखरुल की स्थिति मजबूत की

फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP ने संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया।

चूंकि राष्ट्रपति का चुनाव सांसद करते हैं, इसलिए संसदीय संख्या सीधे राष्ट्रपति चुनाव की तस्वीर को प्रभावित करती है।

इसी वजह से मिर्जा फखरुल की जीत को राजनीतिक रूप से मजबूत संभावना माना जा रहा है।

फिर भी मतदान का औपचारिक महत्व बना हुआ है क्योंकि पहली बार लंबे अंतराल के बाद सांसदों के सामने दो उम्मीदवार हैं।

क्या राष्ट्रपति चुनाव बदल देगा बांग्लादेश की राजनीति?

राष्ट्रपति चुनाव अपने आप में सरकार बदलने वाला चुनाव नहीं है। बांग्लादेश की शासन व्यवस्था में कार्यकारी सत्ता की भूमिका अलग है।

फिर भी लंबे समय बाद राष्ट्रपति पद पर मुकाबला होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

इससे विपक्ष को अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर मिला है और संसद के भीतर राष्ट्रपति चुनाव में वास्तविक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा दिखाई देगी।

जमात-ए-इस्लामी गठबंधन की उम्मीदवारी का महत्व

जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की राजनीति में एक प्रभावशाली और विवादित राजनीतिक धारा रही है। इस बार उसके नेतृत्व वाले गठबंधन ने ओली अहमद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया है।

ओली अहमद का राजनीतिक अतीत BNP से जुड़ा रहा है। ऐसे में यह मुकाबला केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि बांग्लादेश के बदलते राजनीतिक समीकरणों को भी दर्शाता है।

एक ओर सत्ता में मजबूत BNP है, तो दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन अपनी राजनीतिक उपस्थिति दिखाने की कोशिश कर रहा है।

फखरुल के इस्तीफे से BNP में भी बदलाव

राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी स्वीकार करने के बाद फखरुल ने BNP के महासचिव पद और पार्टी की स्थायी समिति से इस्तीफा दे दिया।

इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद BNP के संगठनात्मक ढांचे में भी बदलाव की संभावना रहेगी।

करीब दस वर्षों तक महासचिव पद संभालने के बाद उनका पार्टी संगठन से हटना BNP के लिए भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

एक शिक्षक से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार तक का सफर

फखरुल की राजनीतिक यात्रा में कई अलग-अलग पड़ाव रहे हैं।

छात्र राजनीति, गिरफ्तारी, अध्यापन, सरकारी सेवा, स्थानीय निकाय राजनीति, BNP संगठन, सांसद, राज्य मंत्री, कार्यवाहक महासचिव और फिर पार्टी के स्थायी महासचिव—इन सभी भूमिकाओं के बाद अब वह राष्ट्रपति पद की दौड़ में हैं।

करीब छह दशक की राजनीतिक यात्रा का यह सबसे बड़ा संवैधानिक पड़ाव हो सकता है।

ओली अहमद की कहानी भी संघर्ष और बदलाव से भरी

ओली अहमद का सफर भी अलग-अलग क्षेत्रों से होकर गुजरा है।

1971 के मुक्ति संग्राम में भाग लेने से लेकर सेना में सेवा, फिर राजनीति में प्रवेश और BNP से जुड़ाव—उनके करियर में सैन्य और राजनीतिक दोनों अनुभव रहे हैं।

बाद में BNP से अलग होकर LDP बनाना उनके राजनीतिक जीवन में बड़ा बदलाव था।

अब वह उसी देश के राष्ट्रपति पद के लिए विपक्षी उम्मीदवार हैं, जहां वह लंबे समय से सक्रिय राजनीति करते आए हैं।

20 अगस्त का मतदान क्यों रहेगा खास?

20 अगस्त का चुनाव परिणाम भले ही संसदीय संख्या बल के कारण पहले से काफी हद तक अनुमानित माना जा रहा हो, लेकिन प्रक्रिया के लिहाज से यह दिन महत्वपूर्ण रहेगा।

सांसदों को दो उम्मीदवारों में से एक का चुनाव करना होगा।

35 साल बाद राष्ट्रपति पद के लिए वास्तविक प्रतिस्पर्धा होना अपने आप में बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में दर्ज होने वाली घटना है।

बांग्लादेश की राजनीति में नई तस्वीर

राष्ट्रपति चुनाव की यह प्रतिस्पर्धा ऐसे समय में हो रही है जब बांग्लादेश में सत्ता और विपक्ष के समीकरण बदल रहे हैं।

BNP का मजबूत संसदीय बहुमत, विपक्षी गठबंधन की सक्रियता और राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवारों का मैदान में उतरना राजनीति के नए चरण की ओर संकेत करता है।

हालांकि राष्ट्रपति पद की शक्तियां सरकार और प्रधानमंत्री की तुलना में सीमित हैं, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव का राजनीतिक संदेश व्यापक हो सकता है।

बिजली संकट के बीच हो रहा राष्ट्रपति चुनाव

इसी बीच बांग्लादेश आर्थिक और ऊर्जा संबंधी चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। देश के कई हिस्सों में बिजली कटौती की खबरें सामने आई हैं और कुछ इलाकों में रोजाना लंबे समय तक बिजली उपलब्ध नहीं होने की समस्या बताई जा रही है।

भीषण गर्मी और हीटवेव के बीच बिजली संकट ने आम लोगों की परेशानियां बढ़ाई हैं।

ऐसे माहौल में राष्ट्रपति चुनाव बांग्लादेश की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।

बाजारों के समय और बिजली संकट पर भी सरकार के सामने चुनौती

बिजली संकट के बीच बाजारों के संचालन को लेकर भी सरकार को कदम उठाने पड़े हैं। रात में बाजारों को जल्दी बंद करने जैसे निर्देशों की चर्चा हो रही है।

ऊर्जा की कमी का असर उद्योग, कारोबार, घरेलू उपभोक्ताओं और ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ रहा है।

ऐसे समय में राजनीतिक नेतृत्व के सामने केवल चुनावी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े सवाल भी हैं।

भारत के लिए भी बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिरता महत्वपूर्ण

भारत और बांग्लादेश के बीच भौगोलिक निकटता, व्यापार, ऊर्जा, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय संपर्क जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे जुड़े हुए हैं।

बांग्लादेश में सत्ता और राजनीतिक व्यवस्था में होने वाले बदलावों पर भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया की नजर रहती है।

हालांकि राष्ट्रपति का चुनाव सीधे सरकार की विदेश नीति निर्धारित नहीं करता, लेकिन देश की व्यापक राजनीतिक स्थिरता का क्षेत्रीय संबंधों पर प्रभाव पड़ सकता है।

अब निगाहें 20 अगस्त पर

फिलहाल दोनों उम्मीदवारों के नामांकन के बाद चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

BNP के मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर और जमात-ए-इस्लामी नेतृत्व वाले गठबंधन के ओली अहमद के बीच मुकाबला अब औपचारिक रूप ले चुका है।

संसद में BNP की मजबूत स्थिति को देखते हुए फखरुल को स्पष्ट बढ़त हासिल है। लेकिन 1991 के बाद पहली बार दो उम्मीदवारों के बीच राष्ट्रपति चुनाव होना इस प्रक्रिया को ऐतिहासिक बना रहा है।

20 अगस्त को सांसदों के मतदान के बाद यह तय होगा कि बांग्लादेश के राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी किसे मिलती है।

बांग्लादेश में 35 साल बाद राष्ट्रपति पद के लिए वास्तविक चुनावी मुकाबला देखने को मिल रहा है। BNP ने अपने महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को उम्मीदवार बनाया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन की ओर से लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष सेवानिवृत्त कर्नल ओली अहमद ने नामांकन दाखिल किया है। 20 अगस्त को संसद सदस्य मतदान करेंगे। फरवरी के आम चुनाव में BNP को दो-तिहाई बहुमत मिलने के कारण फखरुल की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, लेकिन 1991 के बाद पहली बार राष्ट्रपति पद पर दो उम्मीदवारों की मौजूदगी ने चुनाव को ऐतिहासिक राजनीतिक महत्व दे दिया है। फखरुल का सफर छात्र राजनीति और अध्यापन से होते हुए सांसद, राज्य मंत्री और करीब एक दशक तक BNP महासचिव रहने तक पहुंचा है, जबकि ओली अहमद 1971 के मुक्ति संग्राम के अनुभवी सैन्य अधिकारी, पूर्व मंत्री और LDP प्रमुख रहे हैं। अब पूरे राजनीतिक परिदृश्य की नजर 20 अगस्त के संसदीय मतदान पर है।

 

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