Muzaffarnagar जिला सहकारी बैंक में ‘कुर्सी का खेल’ पलटा, हाईकोर्ट के फैसले से सभापति ठाकुर रामनाथ सिंह समेत 3 संचालक OUT!
Muzaffarnagar District Cooperative Bank में ऐसा प्रशासनिक और कानूनी उलटफेर हुआ कि सहकारी राजनीति के समीकरणों पर भी चर्चा शुरू हो गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बैंक के सभापति ठाकुर रामनाथ सिंह समेत तीन संचालकों के पद पर बने रहने की वैधता से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। फैसले के बाद ठाकुर रामनाथ सिंह के साथ संचालक पंकज पाल और बिजेंद्र मलिक एडवोकेट भी संचालक पद से पदमुक्त हो गए हैं।
यानी जिस बोर्ड में कुछ समय पहले तक कुर्सियां बाकायदा आबाद थीं, वहां हाईकोर्ट के आदेश के बाद तीन सीटें अचानक खाली हो गईं। और सबसे बड़ा झटका सभापति ठाकुर रामनाथ सिंह को लगा, क्योंकि संचालक पद खत्म होते ही सभापति की कुर्सी पर बने रहने का आधार भी समाप्त हो गया।
सहकारी बैंक की राजनीति में इसे साधारण कागजी फेरबदल समझना शायद जल्दबाजी होगी। मामला सीधे सहकारी समितियों के पुनर्गठन और उनके विभाजन के बाद संचालक पद की वैधता से जुड़ा है। अदालत का फैसला आया तो सवाल सिर्फ तीन पदों का नहीं रहा, बल्कि बैंक के मौजूदा बोर्ड के स्वरूप और आगे की सहकारी चुनावी प्रक्रिया को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गईं।
कुर्सी पर बैठे थे सभापति, अदालत के आदेश ने बदल दिया पूरा समीकरण
ठाकुर रामनाथ सिंह जून 2023 में मुजफ्फरनगर जिला सहकारी बैंक के सभापति चुने गए थे। उनके कार्यकाल के दौरान अब समितियों के पुनर्गठन से जुड़ा विवाद अदालत तक पहुंचा और हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनकी सभापति की कुर्सी ही चली गई। राजनीतिक हलकों में ठाकुर रामनाथ सिंह को भाजपा के पूर्व विधायक उमेश मलिक का कट्टर समर्थक माना जाता है। ऐसे में सहकारी बैंक के स्तर पर इस घटनाक्रम को राजनीतिक दृष्टि से भी देखा जा रहा है। हालांकि अदालत का फैसला जिस मुद्दे पर आया है, वह सहकारी समितियों के पुनर्गठन और संचालक पद की वैधता से संबंधित है। इसलिए इसे केवल राजनीतिक चश्मे से देखना पूरे मामले को अधूरा कर देगा।फिलहाल इतना जरूर है कि सहकारी बैंक की कुर्सियों का गणित हाईकोर्ट के आदेश के बाद बदल चुका है।
सहकारी समितियों के पुनर्गठन ने खोल दिया था कानूनी पेंच
पूरे मामले की जड़ सहकारी समितियों के पुनर्गठन और उनके विभाजन से जुड़ी बताई गई है। याचिका में संबंधित संचालकों के पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती दी गई थी।याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि समितियों के विभाजन और पुनर्गठन के बाद संबंधित प्रतिनिधि अपनी पूर्व समितियों के बोर्ड का हिस्सा नहीं रह गए थे। ऐसे में पुरानी समितियों के आधार पर जिला सहकारी बैंक के संचालक पद पर बने रहना नियमों के अनुरूप नहीं था।
यही वह बिंदु था जिसने मामले को सीधे अदालत के सामने ला खड़ा किया।
कागजों में समिति बदली, बोर्ड बदला या नहीं—मामला देखने में भले ही तकनीकी लगे, लेकिन इसका असर आखिरकार बैंक की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंच गया।
छह महीने पहले दाखिल हुई याचिका, अब आया बड़ा फैसला
जानकारी के अनुसार, संजय जैन बनाम सरकार मामले में याचिकाकर्ता सचिन जैन की ओर से करीब छह महीने पहले रिट याचिका दाखिल की गई थी।
याचिका में संबंधित संचालकों के पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती दी गई थी। मामले में पक्षकारों की दलीलें सुनी गईं और संबंधित तथ्यों पर विचार किया गया।
इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की सीनियर बेंच ने अपना फैसला सुनाया। पीठ में न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला शामिल थे।
अदालत के आदेश के बाद ठाकुर रामनाथ सिंह, पंकज पाल और बिजेंद्र मलिक एडवोकेट के संचालक पद समाप्त हो गए।
तीन संचालक गए तो सभापति की कुर्सी भी साथ चली गई
यहां कहानी में असली ट्विस्ट यही है।
ठाकुर रामनाथ सिंह केवल संचालक ही नहीं थे, बल्कि जिला सहकारी बैंक के सभापति भी थे। ऐसे में जब संचालक पद पर बने रहने का आधार ही अदालत के आदेश के बाद समाप्त हो गया, तो सभापति पद भी उनके पास नहीं रह सका।मतलब सहकारी बैंक की राजनीति में मामला सिर्फ एक सीट खाली होने तक सीमित नहीं रहा।
एक फैसले ने तीन संचालकों को पद से बाहर किया और उसी के साथ बैंक की शीर्ष कुर्सी भी बदल गई।
बोर्ड में पहले कितने सदस्य थे, अब कितने रह गए?
जिला सहकारी बैंक में ठाकुर रामनाथ सिंह के अलावा 13 संचालक बताए गए हैं। हाईकोर्ट के फैसले के बाद तीन संचालक पद समाप्त हो गए।
अब बैंक के संचालक मंडल में 10 सदस्यीय बोर्ड के अस्तित्व में होने की जानकारी सामने आई है।
इस बोर्ड में किसान नेता राजू अहलावत, पूर्व प्रमुख अमित चौधरी बढेडी, पूर्व प्रमुख अनार सिंह रवि और पूर्व जिला पंचायत सदस्य हरेन्द्र शर्मा समेत अन्य सदस्य शामिल हैं। बोर्ड में दो महिला संचालक भी हैं।
मुकेश कुमार जैन उप सभापति हैं।
यानी तीन कुर्सियां खाली होने के बाद अब बैंक के भीतर आगे का प्रशासनिक और सहकारी गणित इन्हीं बचे हुए सदस्यों के इर्द-गिर्द घूमेगा।
मुजफ्फरनगर जिला सहकारी बैंक की तस्वीर अब पहले जैसी नहीं रही
सहकारी बैंक का संचालक मंडल केवल नामों की सूची नहीं होता। इसी बोर्ड के माध्यम से बैंक से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और सहकारी निर्णय आगे बढ़ते हैं।ऐसे में तीन संचालकों का पद समाप्त होना बैंक के बोर्ड के कामकाज पर स्वाभाविक रूप से असर डालने वाला घटनाक्रम है।खासकर तब, जब पदमुक्त होने वालों में बैंक के सभापति भी शामिल हों।अब आगे क्या होगा, यह संबंधित सहकारी नियमों और शासन के निर्देशों के अनुसार तय किया जाएगा।
सहकारी राजनीति में ‘कुर्सी’ का खेल फिर चर्चा में
मुजफ्फरनगर की राजनीति में सहकारी संस्थाओं की अपनी अलग अहमियत रही है। ऐसे में जिला सहकारी बैंक के शीर्ष पद में अचानक बदलाव की खबर का राजनीतिक चर्चा में आना स्वाभाविक है।
व्यंग्य की भाषा में कहें तो कुर्सी पर बैठने के लिए चुनावी गणित जितना जरूरी होता है, उतना ही जरूरी यह भी है कि जिस आधार पर कुर्सी मिली है, वह कानूनी रूप से कायम रहे।
यहां हाईकोर्ट के फैसले ने उसी आधार पर सवाल का जवाब दे दिया।
अब राजनीतिक समर्थक अपने-अपने हिसाब से इसकी व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन अदालत के आदेश का असर साफ दिखाई दे रहा है—तीन संचालक पदमुक्त और सभापति की कुर्सी भी खाली।
उमेश मलिक के समर्थक माने जाते हैं ठाकुर रामनाथ सिंह
ठाकुर रामनाथ सिंह को भाजपा के पूर्व विधायक उमेश मलिक का कट्टर समर्थक माना जाता है। जून 2023 में उन्हें जिला सहकारी बैंक का सभापति चुना गया था।
उनके कार्यकाल में बैंक ने अपनी सामान्य प्रशासनिक गतिविधियां जारी रखीं, लेकिन अब समितियों के पुनर्गठन से जुड़ा विवाद अदालत के फैसले तक पहुंच गया है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाईकोर्ट का फैसला संबंधित संचालक पद की वैधता से जुड़े कानूनी प्रश्न पर है। किसी व्यक्ति की राजनीतिक निष्ठा या समर्थक के रूप में उसकी पहचान इस न्यायिक मुद्दे से अलग विषय है।
सचिन जैन की याचिका ने उठाया था पद की वैधता का सवाल
मामले में याचिकाकर्ता सचिन जैन की ओर से दाखिल रिट याचिका ने मूल रूप से यही प्रश्न उठाया था कि समितियों के पुनर्गठन और विभाजन के बाद पुराने प्रतिनिधियों का जिला सहकारी बैंक के संचालक पद पर बने रहना वैध था या नहीं।
यह सवाल सीधे तौर पर प्रतिनिधित्व की वैधानिकता से जुड़ा था।
यदि जिस समिति के आधार पर कोई प्रतिनिधि जिला स्तर की संस्था में पहुंचा था, वही समिति पुनर्गठन के बाद उसी स्वरूप में अस्तित्व में नहीं रही, तो प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या होगी—मामले का कानूनी पेच इसी तरह के प्रश्नों से जुड़ा बताया गया।
अदालत ने पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद सुनाया फैसला
हाईकोर्ट की पीठ ने मामले में संबंधित पक्षों की दलीलों और तथ्यों पर सुनवाई की।इसके बाद अदालत ने संचालक पद की वैधता को लेकर फैसला सुनाया। आदेश के बाद तीनों संबंधित संचालकों के पद समाप्त हो गए।इस फैसले का प्रभाव सीधे जिला सहकारी बैंक के बोर्ड पर पड़ा है।अब खाली हुई तीन सीटों को लेकर आगे की प्रक्रिया सहकारी नियमों और शासन के निर्देशों के मुताबिक निर्धारित की जाएगी।
आगे क्या होगा? यही सवाल अब सबसे बड़ा
तीन पदों के समाप्त होने के बाद स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा है कि इन पदों को दोबारा कैसे भरा जाएगा।क्या नई प्रक्रिया शुरू होगी? क्या संबंधित समितियों के पुनर्गठन के बाद नए प्रतिनिधित्व का रास्ता खुलेगा? क्या इसके लिए चुनावी प्रक्रिया होगी? या सहकारी कानूनों के तहत कोई अन्य प्रक्रिया लागू होगी?इन सवालों का जवाब फिलहाल संबंधित नियमों और शासन के निर्देशों से तय होगा।
इसलिए अभी से किसी व्यक्ति का नाम अगले सभापति या किसी नए पदाधिकारी के तौर पर तय मान लेना उचित नहीं होगा।
मुजफ्फरनगर जिला सहकारी बैंक में अब ‘अगला कदम’ अहम
Muzaffarnagar District Cooperative Bank के लिए अब अगला चरण बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है। बोर्ड का नया स्वरूप सामने है और शीर्ष पद पर भी बदलाव की स्थिति पैदा हो गई है।
बैंक के कामकाज को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को नए कानूनी और सहकारी समीकरणों के अनुसार ढालना होगा।सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि आगे की प्रक्रिया नियमों के अनुसार किस तरह पूरी होती है। सहकारी संस्थाओं में पद केवल राजनीतिक प्रभाव का विषय नहीं होते; उनके साथ वैधानिक पात्रता, प्रतिनिधित्व और निर्वाचन संबंधी नियम भी जुड़े होते हैं।
सवा दो साल बाद सभापति की कुर्सी पर आया बड़ा झटका
जून 2023 में सभापति बनने के बाद ठाकुर रामनाथ सिंह ने जिला सहकारी बैंक का नेतृत्व किया। अब करीब तीन साल के आसपास के कार्यकाल के बाद हाईकोर्ट के फैसले ने उनकी स्थिति बदल दी है।
जिस पद पर पहुंचने के लिए चुनावी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, उस पद पर बने रहने की वैधता को लेकर अदालत में चुनौती दी गई और अब फैसला भी आ गया।
सहकारी राजनीति में इससे बड़ा ‘ट्विस्ट’ शायद यही है कि कुर्सी का फैसला हमेशा केवल चुनावी गणित से नहीं होता—कानूनी गणित भी बराबर मायने रखता है।
तीन पद खाली, दस सदस्य बचे—अब आगे की रणनीति पर नजर
बैंक के संचालक मंडल में अब 10 सदस्यीय बोर्ड के अस्तित्व में होने की जानकारी है। किसान नेता राजू अहलावत, पूर्व प्रमुख अमित चौधरी बढेडी, पूर्व प्रमुख अनार सिंह रवि, पूर्व जिला पंचायत सदस्य हरेन्द्र शर्मा और दो महिला संचालकों समेत अन्य सदस्य अब बोर्ड का हिस्सा हैं।
मुकेश कुमार जैन उप सभापति के रूप में मौजूद हैं।
ऐसे में आने वाले समय में बैंक के भीतर नेतृत्व और रिक्त पदों को लेकर गतिविधियां बढ़ना स्वाभाविक है।
हालांकि, किसी भी नए पदाधिकारी के बारे में फैसला होने से पहले आधिकारिक प्रक्रिया का इंतजार करना जरूरी होगा।
सहकारी चुनावी प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है असर
इस फैसले का असर आगामी सहकारी चुनावी प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। हालांकि इसका वास्तविक स्वरूप संबंधित नियमों और शासन के आगामी निर्देशों के बाद ही स्पष्ट होगा।
सहकारी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व की संरचना बदलने से कई स्तरों पर चुनावी समीकरण भी बदल सकते हैं। कौन-सी समिति किस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगी, कौन पात्र होगा और किस प्रक्रिया से नए संचालक आएंगे—इन सबका निर्धारण नियमों के तहत होगा।
यही वजह है कि हाईकोर्ट का यह आदेश केवल वर्तमान बोर्ड तक सीमित घटनाक्रम नहीं माना जा रहा।
राजनीतिक हलकों में अब नई चर्चाओं का दौर
फैसले के बाद मुजफ्फरनगर के राजनीतिक और सहकारी हलकों में चर्चाओं का दौर शुरू होना स्वाभाविक है।
किसके पास कितनी ताकत है, कौन किसके साथ खड़ा है और आगे बैंक की कमान किसके हाथ में जाएगी—ऐसे सवाल अब स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन सकते हैं।
लेकिन इन राजनीतिक अटकलों से अलग वास्तविक स्थिति यह है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद तीन संचालक पदमुक्त हो चुके हैं और ठाकुर रामनाथ सिंह का सभापति पद पर बने रहने का आधार समाप्त हो गया है।
बाकी कहानी अब आगे की आधिकारिक प्रक्रिया तय करेगी।
फैसले का सबसे बड़ा संदेश—कानूनी वैधता सर्वोपरि
सहकारी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व से जुड़ी प्रक्रिया कागजी औपचारिकता भर नहीं है। समितियों का गठन, पुनर्गठन, विभाजन, प्रतिनिधित्व और संचालक मंडल में स्थान—हर चरण के साथ नियम जुड़े होते हैं।
मुजफ्फरनगर जिला सहकारी बैंक का यह मामला इसी बात की याद दिलाता है कि किसी भी पद पर बने रहने के लिए कानूनी आधार महत्वपूर्ण होता है।
राजनीतिक समर्थन अपनी जगह हो सकता है, चुनावी समीकरण अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन अदालत का फैसला आने के बाद स्थिति उसी के अनुरूप बदलती है।
अब बैंक में अगली ‘कुर्सी’ किसके नाम होगी?
फिलहाल सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि जिला सहकारी बैंक की सभापति की कुर्सी पर आगे कौन बैठेगा।
लेकिन इस सवाल का जवाब अभी अटकलों से नहीं दिया जा सकता। तीन संचालकों के पद समाप्त होने के बाद पहले रिक्तियों और प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया स्पष्ट होगी। उसके बाद ही नेतृत्व को लेकर स्थिति साफ होगी।
इतना जरूर है कि ठाकुर रामनाथ सिंह के लिए जिला सहकारी बैंक की राजनीति में यह बड़ा झटका है और बैंक के लिए यह एक नए अध्याय की शुरुआत है।
कभी-कभी सहकारी राजनीति में चुनाव के पोस्टर से ज्यादा ताकत अदालत का एक आदेश दिखा देता है। यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ है—तीन पद खत्म हुए, सभापति की कुर्सी खाली हुई और अब निगाहें आगे की प्रक्रिया पर टिक गई हैं।

