उत्तर प्रदेश

Firozabad में सरकारी अभिलेखागार में फर्जी वसीयत चस्पाने का सनसनीखेज मामला, करोड़ों की जमीन हड़पने की साजिश का आरोप

Firozabad। सरकारी दस्तावेजों को आमतौर पर सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद रिकॉर्ड माना जाता है, लेकिन फिरोजाबाद में इन्हीं सरकारी अभिलेखों से छेड़छाड़ का एक गंभीर मामला सामने आया है। तहसील सदर स्थित निबंधन विभाग के केंद्रीय अभिलेखागार में कथित तौर पर कूटरचित वसीयत चस्पा किए जाने का आरोप लगा है। मामला केवल जमीन के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि आरोप है कि फर्जी दस्तावेज को सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा दिखाकर अदालत में पेश किया गया और उसके आधार पर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की गई।

मामले में थाना दक्षिण पुलिस ने आगरा की न्यू लॉयर्स कॉलोनी निवासी लक्ष्मी नारायण समेत निबंधन विभाग के तत्कालीन संदिग्ध कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, कूटरचना और धोखाधड़ी समेत गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है।

करोड़ों की जमीन हड़पने के लिए फर्जी वसीयत बनाने का आरोप

पुलिस को दी गई शिकायत में नोएडा के ग्राम मोरना निवासी खेमचंद ने गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायतकर्ता के मुताबिक उनके पिता मामराज और चाचा धनपाल की करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन को हड़पने की नीयत से आरोपी लक्ष्मी नारायण ने वर्ष 1998 की एक कथित फर्जी वसीयत तैयार की।

आरोप है कि इस दस्तावेज को वास्तविक वसीयत के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई। शिकायतकर्ता के अनुसार कूटरचित दस्तावेज के आधार पर सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गौतमबुद्ध नगर की अदालत में तथ्य पेश किए गए और आरोपी ने अपने पक्ष में फैसला भी हासिल कर लिया।

मामला सामने आने के बाद जब संबंधित सरकारी अभिलेखों की जांच कराई गई तो कथित फर्जीवाड़े की परतें खुलनी शुरू हुईं।

सरकारी रिकॉर्ड में ही बदल दिया गया दस्तावेज?

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू निबंधन विभाग के केंद्रीय अभिलेखागार से जुड़ा है। शिकायत के बाद जब रिकॉर्ड की जांच और संबंधित दस्तावेजों का मिलान कराया गया तो अभिलेखों में कथित तौर पर बड़ा अंतर सामने आया।

उप निबंधक सदर प्रथम, फिरोजाबाद की जांच रिपोर्ट में अभिलेखागार में सुरक्षित रिकॉर्ड की तुलना तत्कालीन दस्तावेजों से की गई। जांच में बताया गया कि अभिलेखागार में बही संख्या-3, खंड-38 में चस्पा की गई वसीयत का विवरण तत्कालीन इंडेक्स, स्याह और रजिस्टर नंबर-8 में उपलब्ध विवरण से मेल नहीं खाता।

यानी जिस दस्तावेज को सरकारी अभिलेखागार में सुरक्षित रिकॉर्ड का हिस्सा बताया जा रहा था, उसका विवरण अन्य संबंधित सरकारी रिकॉर्ड से अलग पाया गया।

इंडेक्स और रजिस्टर से नहीं मिला वसीयत का ब्योरा

जांच रिपोर्ट में सामने आए अंतर ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया। सरकारी अभिलेखों में किसी दस्तावेज की प्रविष्टि, उसकी पहचान और रिकॉर्ड संख्या महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में अगर अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेज और उसी दस्तावेज से संबंधित पुराने इंडेक्स या रजिस्टर में दर्ज विवरण अलग हों, तो रिकॉर्ड की प्रामाणिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसी अंतर के आधार पर शिकायतकर्ता की ओर से सरकारी अभिलेखों में कथित हेरफेर का आरोप लगाया गया।

मामले की जांच अब पुलिस के स्तर पर की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कथित दस्तावेज अभिलेखागार तक कैसे पहुंचा, उसे वहां किस प्रक्रिया के तहत रखा गया और इस पूरे घटनाक्रम में किन लोगों की भूमिका रही।

निबंधन विभाग के तत्कालीन कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में

मामले में केवल लक्ष्मी नारायण के खिलाफ ही कार्रवाई नहीं की गई है। पुलिस ने निबंधन विभाग के संदिग्ध तत्कालीन कर्मचारियों को भी मुकदमे में शामिल किया है।

इससे मामला और गंभीर हो गया है, क्योंकि यदि जांच में सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की पुष्टि होती है तो यह सवाल भी उठेगा कि अभिलेखागार जैसे संवेदनशील स्थान पर कथित कूटरचित दस्तावेज किस तरह पहुंचा और उसे रिकॉर्ड का हिस्सा बनाने में किस स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई।

हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। पुलिस अब दस्तावेजों, पुराने रजिस्टरों और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच कर रही है।

अदालत के फैसले तक पहुंचा कथित फर्जी दस्तावेज

शिकायतकर्ता खेमचंद के आरोपों के मुताबिक कथित फर्जी वसीयत का इस्तेमाल केवल जमीन पर दावा करने के लिए नहीं किया गया, बल्कि इसे न्यायालयी कार्यवाही में भी पेश किया गया।

आरोप है कि इसी दस्तावेज के आधार पर गौतमबुद्ध नगर के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) न्यायालय में ऐसे तथ्य रखे गए, जिनके आधार पर लक्ष्मी नारायण के पक्ष में फैसला आया।

अब जब संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में कथित विसंगतियां सामने आई हैं, तो यह जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा कि अदालत के समक्ष कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे और उनका सरकारी अभिलेखों से क्या संबंध था।

केंद्रीय अभिलेखागार में रिकॉर्ड की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

निबंधन विभाग का केंद्रीय अभिलेखागार पुराने और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए होता है। जमीन, संपत्ति और पंजीकृत दस्तावेजों से जुड़े पुराने रिकॉर्ड भविष्य में होने वाले विवादों और न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

ऐसे में अगर किसी अभिलेखागार में रखे रिकॉर्ड में कथित तौर पर बाहरी दस्तावेज चस्पा कर दिया जाए या मूल रिकॉर्ड से अलग दस्तावेज शामिल हो जाए, तो इसका असर सिर्फ एक संपत्ति विवाद तक सीमित नहीं रहता। इससे सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

फिरोजाबाद का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जांच में कथित तौर पर बही संख्या-3, खंड-38 के रिकॉर्ड और पुराने इंडेक्स व रजिस्टरों के बीच अंतर सामने आने की बात कही गई है।

पुलिस ने दर्ज किया आपराधिक षड्यंत्र, कूटरचना और धोखाधड़ी का मामला

मामले की गंभीरता को देखते हुए थाना दक्षिण पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। आरोपी लक्ष्मी नारायण और निबंधन विभाग के तत्कालीन संदिग्ध कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, कूटरचना और धोखाधड़ी से संबंधित धाराओं में कार्रवाई की गई है।

पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास करेगी कि कथित फर्जी वसीयत कब तैयार हुई, किसने तैयार की, अभिलेखागार में उसे किस तरह चस्पा किया गया और अदालत में इसे किस आधार पर प्रस्तुत किया गया।

इसके अलावा जांच में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि सरकारी रिकॉर्ड में कथित बदलाव के पीछे किसी व्यक्ति या समूह की सुनियोजित भूमिका थी या मामला किसी अन्य तरीके से हुआ।

सीओ सिटी ने क्या कहा?

मामले को लेकर सीओ सिटी संतोष कुमार सिंह ने बताया कि थाना दक्षिण पुलिस ने गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और कथित फर्जीवाड़े से जुड़े नेटवर्क का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

पुलिस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सरकारी रिकॉर्ड की मूल स्थिति और कथित तौर पर बाद में चस्पा की गई वसीयत के बीच संबंध को स्पष्ट करना है।

कई साल पुराना जमीन विवाद अब पहुंचा आपराधिक जांच तक

मामले की जड़ वर्ष 1998 की कथित वसीयत से जुड़ी बताई जा रही है, लेकिन इसका प्रभाव बाद की न्यायिक कार्यवाही तक पहुंचा। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनके पिता मामराज और चाचा धनपाल की करोड़ों रुपये की जमीन को हड़पने के उद्देश्य से फर्जी दस्तावेज तैयार किया गया।

यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल संपत्ति विवाद नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी अभिलेखों से छेड़छाड़ और कथित दस्तावेजी फर्जीवाड़े के बड़े मामले के रूप में सामने आ सकता है।

फिलहाल पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और सभी संबंधित दस्तावेजों तथा आरोपों की जांच की जा रही है।

अब जांच में इन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे

इस मामले में पुलिस की जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण सवालों का जवाब सामने आना बाकी है—कथित वसीयत मूल रूप से कहां तैयार हुई? इसे निबंधन विभाग के अभिलेखागार में किसने चस्पा किया? रिकॉर्ड में मौजूद अन्य दस्तावेजों से इसका विवरण क्यों अलग है? तत्कालीन कर्मचारियों की इसमें क्या भूमिका थी? और अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों की प्रमाणिकता क्या थी?

इन सवालों के जवाब जांच आगे बढ़ने के साथ सामने आएंगे।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मामला सरकारी अभिलेख, करोड़ों की जमीन, कथित फर्जी वसीयत और अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों से जुड़ा है। इसलिए पुलिस की जांच में दस्तावेजी साक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ के आरोप ने मचाई हलचल

फिरोजाबाद तहसील सदर स्थित निबंधन विभाग के केंद्रीय अभिलेखागार से जुड़ा यह मामला सामने आने के बाद सरकारी रिकॉर्ड की सुरक्षा और उसकी प्रमाणिकता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

थाना दक्षिण पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है और मामले में शामिल बताए जा रहे सभी लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। आने वाले समय में जांच के दौरान सामने आने वाले दस्तावेज और बयान यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि कथित फर्जी वसीयत का पूरा नेटवर्क किस तरह काम कर रहा था और सरकारी अभिलेख में वह कैसे पहुंची।

फिरोजाबाद का यह मामला सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा और संपत्ति विवाद में दस्तावेजों की प्रमाणिकता से जुड़ा गंभीर प्रकरण है। पुलिस ने लक्ष्मी नारायण समेत निबंधन विभाग के तत्कालीन संदिग्ध कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। उप निबंधक की जांच में बही संख्या-3, खंड-38 में चस्पा वसीयत और तत्कालीन इंडेक्स, स्याह तथा रजिस्टर नंबर-8 के विवरण में अंतर सामने आने की बात कही गई है। अब पुलिस जांच से यह स्पष्ट होगा कि कथित कूटरचना कैसे हुई और इसमें किन लोगों की भूमिका थी।

 

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