इटली में Giorgia Meloni का बड़ा चुनावी दांव पास, 42% वोट पर मिलेंगी 105 बोनस सीटें; विपक्ष बोला- सत्ता का संतुलन बिगड़ सकता है
Italy Electoral Reform को लेकर इटली की राजनीति में कई महीनों से चल रही बहस अब एक अहम पड़ाव पर पहुंच गई है। प्रधानमंत्री Giorgia Meloni की सरकार द्वारा लाई गई चुनावी व्यवस्था में बड़े बदलाव वाली योजना को संसद की निचली सदन ने 8 अक्टूबर 2026 को अंतिम मंजूरी दे दी। गुप्त मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में 227 और विपक्ष में 164 वोट पड़े। नई व्यवस्था में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले गठबंधन को, यदि वह कम से कम 42 प्रतिशत वोट हासिल करता है और निर्धारित शर्तें पूरी करता है, तो संसद में अतिरिक्त सीटों का बोनस मिलेगा।
इस व्यवस्था का सबसे चर्चित हिस्सा 105 सीटों का बहुमत बोनस है। इसमें 70 सीटें निचले सदन यानी Chamber of Deputies के लिए और 35 सीटें Senate के लिए निर्धारित हैं। हालांकि इसे समझते समय एक बात बेहद महत्वपूर्ण है—ये सीटें संसद की मौजूदा कुल संख्या के ऊपर नई सीटों के रूप में नहीं जोड़ी जाएंगी। बोनस का इस्तेमाल मौजूदा सीटों के भीतर विजेता गठबंधन को मजबूत बहुमत दिलाने के लिए किया जाएगा।
सरकार का तर्क है कि इस बदलाव से चुनाव के बाद बनने वाली सरकार को ज्यादा स्थिर बहुमत मिल सकेगा और गठबंधन के अंदर छोटे दलों के दबाव के कारण सरकार के बार-बार कमजोर होने की संभावना कम होगी। दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि सीट बोनस चुनावी नतीजों और संसद में वास्तविक वोट हिस्सेदारी के बीच बड़ा अंतर पैदा कर सकता है। इन आरोपों को सरकार की आलोचना के रूप में देखा जाना चाहिए; वे स्वयं सरकार की मंशा का स्थापित तथ्य नहीं हैं।
42% वोट का आंकड़ा क्यों बना सबसे बड़ा मुद्दा?
Italy Electoral Reform की पूरी बहस में 42 प्रतिशत का आंकड़ा सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक है। नई व्यवस्था में बहुमत बोनस तभी लागू होगा जब संबंधित पार्टी या गठबंधन 42 प्रतिशत की सीमा पार करे और दोनों सदनों में आवश्यक शर्तों के अनुरूप सबसे आगे रहे। यदि यह सीमा पूरी नहीं होती या दोनों सदनों में परिणाम आवश्यक तरीके से मेल नहीं खाते, तो बोनस लागू नहीं होगा और आनुपातिक तरीके से सीटों का वितरण किया जाएगा।
यानी केवल चुनाव में सबसे ज्यादा वोट हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा। विजेता गठबंधन को 42 प्रतिशत की निर्धारित सीमा भी पार करनी होगी।
यही प्रावधान सरकार और विरोधियों के बीच बहस का केंद्र बना हुआ है। सरकार के नजरिए से यह सीमा इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि बहुत कम वोट प्रतिशत के साथ कोई गठबंधन संसद में अत्यधिक बहुमत हासिल न कर सके। दूसरी ओर आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि 42 प्रतिशत वोट हासिल करने वाला गठबंधन 105 सीटों के बोनस के जरिए संसद में अपनी वास्तविक वोट हिस्सेदारी की तुलना में काफी अधिक प्रभाव हासिल कर सकता है।
105 बोनस सीटों का पूरा गणित क्या है?
इटली की संसद में कुल 600 निर्वाचित सीटें हैं। इनमें 400 सीटें Chamber of Deputies यानी निचले सदन में और 200 सीटें Senate में हैं।
नई व्यवस्था के तहत बहुमत बोनस की संरचना इस प्रकार है:
- निचला सदन: 70 बोनस सीटें
- सीनेट: 35 बोनस सीटें
- कुल बोनस: 105 सीटें
लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना बेहद आवश्यक है। 70 और 35 सीटें संसद की मौजूदा 400 और 200 सीटों के ऊपर जोड़कर कुल संख्या को 705 नहीं बनातीं। ये सीटें मौजूदा सीटों के वितरण के भीतर विजेता गठबंधन को अधिक संसदीय ताकत देने के लिए इस्तेमाल होंगी।
इसके अलावा सीटों पर ऊपरी सीमा भी रखी गई है। रिपोर्टों के मुताबिक निचले सदन में बोनस के बाद अधिकतम 220 सीटों और सीनेट में 113 सीटों तक की सीमा निर्धारित की गई है।
आसान उदाहरण से समझिए, लेकिन वास्तविक गणना इससे ज्यादा जटिल है
मान लीजिए चुनाव में एक गठबंधन को 43 प्रतिशत वोट मिलते हैं और वह निर्धारित शर्तों के तहत सबसे आगे रहता है। दूसरा गठबंधन 35 प्रतिशत और बाकी दल मिलकर 22 प्रतिशत वोट हासिल करते हैं।
ऐसी स्थिति में 43 प्रतिशत वोट वाला गठबंधन 42 प्रतिशत की सीमा पार कर चुका होगा। इसलिए वह बहुमत बोनस के लिए पात्र हो सकता है।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि केवल 43 प्रतिशत वोट को किसी सरल गणित से सीटों में बदलकर उसमें सीधे 105 जोड़ दिए जाएंगे।
सीटों का वास्तविक वितरण चुनावी क्षेत्र, पात्र दलों, निर्धारित थ्रेसहोल्ड, दोनों सदनों के परिणाम और कानून में रखी गई अधिकतम सीट सीमा जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा। इसलिए सोशल मीडिया पर चलने वाले “वोट प्रतिशत + 105 सीट = अंतिम सीट” जैसे सीधे फार्मूले वास्तविक परिणाम को सही तरीके से नहीं दर्शाते।
नई व्यवस्था में 42% से कम वोट मिलने पर क्या होगा?
यह सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है।
यदि कोई गठबंधन 42 प्रतिशत की निर्धारित सीमा तक नहीं पहुंचता, तो बहुमत बोनस लागू नहीं होगा। ऐसी स्थिति में सीटों का वितरण आनुपातिक प्रणाली के आधार पर किया जाएगा। इसी तरह दोनों सदनों के नतीजों में ऐसी स्थिति बनने पर भी बोनस रुक सकता है जिसमें कानून में निर्धारित शर्तें पूरी नहीं होतीं।
इसका मतलब यह हुआ कि 42 प्रतिशत का आंकड़ा केवल राजनीतिक भाषणों में इस्तेमाल होने वाला नंबर नहीं है, बल्कि नई चुनावी व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण ट्रिगर में से एक है।
मेलोनी सरकार क्यों लाई चुनावी व्यवस्था में यह बदलाव?
जॉर्जिया मेलोनी की सरकार का मुख्य तर्क राजनीतिक स्थिरता है।
इटली का राजनीतिक इतिहास गठबंधन सरकारों, सत्ता परिवर्तन और अपेक्षाकृत अस्थिर संसदीय समीकरणों से भरा रहा है। सरकार का तर्क है कि यदि चुनाव जीतने वाले गठबंधन को स्पष्ट संसदीय बहुमत मिल जाए तो उसे हर बड़े फैसले के लिए छोटे सहयोगी दलों पर निर्भर रहने की आवश्यकता कम होगी।
इससे बजट, आर्थिक नीतियों, प्रशासनिक सुधारों और अन्य विधायी कार्यक्रमों को लागू करने में सरकार को अधिक स्थिर समर्थन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
मेलोनी सरकार का दावा है कि मतदाता चुनाव में केवल यह नहीं तय करना चाहते कि कौन-सी पार्टी सबसे अधिक वोट पाएगी, बल्कि वह यह भी जानना चाहते हैं कि चुनाव के बाद कौन शासन करेगा और उसके पास सरकार चलाने के लिए कितना स्पष्ट बहुमत होगा।
नई व्यवस्था इसी सोच को चुनावी कानून में शामिल करने का प्रयास है।
इटली में सरकारों की अस्थिरता का पुराना इतिहास
इटली की राजनीति में सरकार का लंबे समय तक टिकना ऐतिहासिक रूप से आसान नहीं रहा है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गणराज्य बनने के बाद से देश ने बड़ी संख्या में सरकारें देखी हैं। गठबंधन के भीतर मतभेद, छोटे दलों का प्रभाव और संसद में बहुमत बनाए रखने की चुनौती कई बार सरकारों के लिए मुश्किल पैदा करती रही है।
इसी पृष्ठभूमि में चुनावी सुधार को समझना महत्वपूर्ण है। समर्थकों का कहना है कि चुनाव के बाद महीनों तक गठबंधन की बातचीत चलने या सरकार को छोटे दलों के समर्थन पर निर्भर रहने के बजाय मतदाताओं के सामने चुनाव से पहले ही व्यापक गठबंधन और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की तस्वीर स्पष्ट होनी चाहिए।
मेलोनी की मौजूदा सरकार भी अपने कार्यकाल की लंबाई के कारण इस चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। उनकी सरकार सितंबर 2022 में सत्ता में आई थी और उनकी सरकार इटली की युद्धोत्तर राजनीति में लंबे समय तक चलने वाली सरकारों में शामिल हो चुकी है।
मेलोनी ने चुनावी कानून को सरकार की स्थिरता से क्यों जोड़ा?
नई व्यवस्था को लेकर मेलोनी सरकार का राजनीतिक तर्क साफ है—अगर जनता किसी गठबंधन को पर्याप्त समर्थन देती है तो चुनाव के बाद उस गठबंधन को सरकार बनाने और चलाने के लिए पर्याप्त संसदीय शक्ति भी मिलनी चाहिए।
इस मॉडल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व बरकरार रखते हुए एक “majority bonus” जोड़ा गया है।
यानी चुनावी व्यवस्था पूरी तरह बहुमत आधारित नहीं है। मूल ढांचा आनुपातिक प्रतिनिधित्व का है, लेकिन 42 प्रतिशत की सीमा पार करने वाले सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने में मदद करने के लिए अतिरिक्त संसदीय लाभ दिया जाता है।
विपक्ष को किस बात की चिंता है?
विपक्षी दलों की सबसे बड़ी चिंता प्रतिनिधित्व और संसदीय शक्ति के बीच संभावित अंतर को लेकर है।
उनका तर्क है कि यदि किसी गठबंधन को 42 प्रतिशत से थोड़ा अधिक वोट मिलते हैं, तो उसे 105 सीटों के बोनस से संसद में वास्तविक वोट हिस्सेदारी से कहीं ज्यादा प्रभाव मिल सकता है।
आलोचकों के अनुसार इसका असर केवल सामान्य कानूनों तक सीमित नहीं हो सकता। संसद में मजबूत बहुमत का मतलब सरकार के पास कई महत्वपूर्ण संवैधानिक और संस्थागत फैसलों पर अधिक प्रभाव भी हो सकता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि “लोकतंत्र को खतरा” जैसे शब्द विरोधी पक्ष की राजनीतिक आलोचना हैं, न कि कोई न्यायिक रूप से स्थापित निष्कर्ष। विपक्ष ने इस व्यवस्था को चुनौती देने की बात कही है और संवैधानिक अदालत का रास्ता अपनाने की तैयारी की जानकारी भी सामने आई है।
विरोधियों ने इसे ‘Melonellum’ नाम क्यों दिया?
इटली में चुनावी कानूनों को अक्सर राजनीतिक उपनाम मिल जाते हैं। मौजूदा सुधार को समर्थक पक्ष की ओर से ‘Stabilicum’ कहा जा रहा है, जो स्थिरता की अवधारणा से जुड़ा नाम है।
वहीं विपक्ष की ओर से इसे ‘Melonellum’ कहा गया है, यानी ऐसा नाम जो प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से जोड़कर इस कानून की आलोचना करता है।
नामों की यह लड़ाई अपने आप में बताती है कि चुनावी कानून केवल तकनीकी नियमों का मामला नहीं रह गया है। यह इटली की मौजूदा राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
प्रधानमंत्री उम्मीदवार का नाम पहले से बताना भी नई व्यवस्था का हिस्सा
नई व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि चुनाव लड़ने वाला गठबंधन मतदान से पहले अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित करेगा।
सरकार के मुताबिक इससे मतदाता को चुनाव से पहले यह स्पष्ट जानकारी मिलेगी कि गठबंधन जीतने की स्थिति में किस व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में आगे किया जाएगा।
इससे चुनावी प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट बनाने का तर्क दिया गया है।
लेकिन यहां भी संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं।
इटली के संविधान के तहत प्रधानमंत्री की औपचारिक नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। इसलिए पहले से किसी उम्मीदवार का नाम घोषित किया जाना राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका को समाप्त नहीं करता। नई चुनावी व्यवस्था का उद्देश्य राजनीतिक रूप से मतदाताओं को संभावित सरकार के नेतृत्व के बारे में पहले से स्पष्टता देना है।
राष्ट्रपति की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
इटली की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति की भूमिका केवल औपचारिक नहीं है। सरकार बनाने की प्रक्रिया में राष्ट्रपति का संवैधानिक स्थान महत्वपूर्ण है।
इसलिए विपक्षी दलों का सवाल है कि यदि चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री का नाम तय कर दिया जाएगा तो राष्ट्रपति की भूमिका और चुनाव के बाद सरकार गठन की संवैधानिक प्रक्रिया के बीच व्यवहारिक संतुलन किस तरह काम करेगा।
हालांकि नई व्यवस्था के बावजूद प्रधानमंत्री की अंतिम नियुक्ति का संवैधानिक अधिकार राष्ट्रपति के पास ही रहता है।
पहले भी इटली में बोनस सीटों वाला मॉडल विवादों में रहा है
इटली में चुनावी व्यवस्था बदलने की कोशिश कोई नई बात नहीं है।
देश ने पिछले दशकों में कई बार चुनावी कानूनों को बदलकर राजनीतिक स्थिरता और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।
2005 में बनाए गए एक चुनावी कानून में भी बहुमत बोनस का प्रावधान था। उस व्यवस्था के तहत सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाले समूह को बड़ा संसदीय लाभ मिल सकता था।
लेकिन उस व्यवस्था पर संवैधानिक सवाल उठे और दिसंबर 2013 में इटली की संवैधानिक अदालत ने उसके बहुमत बोनस वाले हिस्से को असंवैधानिक करार दिया। अदालत की मुख्य आपत्तियों में यह भी शामिल था कि बोनस पाने के लिए पर्याप्त न्यूनतम वोट सीमा निर्धारित नहीं थी।
यही वजह है कि मौजूदा कानून में 42 प्रतिशत जैसी स्पष्ट सीमा को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रावधान के तौर पर पेश किया जा रहा है।
2013 के फैसले के बाद इस बार क्या बदला?
2013 में संवैधानिक अदालत की चिंता का एक प्रमुख बिंदु यह था कि बहुत कम वोट प्रतिशत के बावजूद बहुमत बोनस मिल सकता था।
नई व्यवस्था में स्थिति अलग है।
यहां बोनस को 42 प्रतिशत वोट की सीमा से जोड़ा गया है। यानी केवल सबसे बड़ा दल या गठबंधन होना पर्याप्त नहीं होगा। उसे निर्धारित न्यूनतम समर्थन भी हासिल करना होगा।
यही अंतर मौजूदा सुधार के समर्थकों के लिए महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर आलोचक अभी भी सवाल उठा रहे हैं कि 42 प्रतिशत के बाद मिलने वाला बोनस प्रतिनिधित्व और शासन क्षमता के बीच कितना संतुलन बनाए रखता है।
छोटी पार्टियों के लिए भी बदल सकता है चुनावी खेल
नई व्यवस्था का असर केवल मेलोनी की पार्टी या सबसे बड़े गठबंधन पर ही नहीं पड़ेगा। छोटे दलों और गठबंधन राजनीति पर भी इसका असर हो सकता है।
क्योंकि बोनस पाने की स्थिति तक पहुंचने के लिए गठबंधन बनाना जरूरी हो सकता है, इसलिए चुनाव से पहले पार्टियों के बीच समझौते अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
नई व्यवस्था में पार्टियों और गठबंधनों के लिए अलग-अलग न्यूनतम वोट सीमा भी रखी गई है। रिपोर्टों के अनुसार गठबंधन के लिए 10 प्रतिशत और व्यक्तिगत पार्टियों के लिए 3 प्रतिशत की सीमा शामिल है।
इसका मतलब यह है कि छोटी पार्टियों के सामने दो रास्ते हो सकते हैं—या तो अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ चुनाव लड़ें और अपनी वोट सीमा सुनिश्चित करें, या किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा बनकर संसदीय प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करें।
विपक्ष की चुनौती भी कम नहीं
नई व्यवस्था का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू यह है कि इसका लाभ किसे मिलेगा, यह केवल मौजूदा सरकार की लोकप्रियता से तय नहीं होगा।
42 प्रतिशत की सीमा तक पहुंचने के लिए व्यापक गठबंधन की जरूरत हो सकती है। ऐसे में विपक्षी दलों के बीच तालमेल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाएगा।
Reuters की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र-वाम विपक्ष के भीतर नेतृत्व और गठबंधन को लेकर मतभेद इस नई व्यवस्था के सामने उसकी रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए कानून पारित होना कहानी का अंत नहीं है। असली राजनीतिक परीक्षा अगले आम चुनाव के दौरान होगी, जब पार्टियों को इस नए नियम के तहत गठबंधन और उम्मीदवार तय करने होंगे।
मेलोनी के लिए संसद में कानून पास होना क्यों महत्वपूर्ण है?
मेलोनी सरकार ने इस चुनावी सुधार को अपनी प्रमुख राजनीतिक पहलों में शामिल किया है।
8 अक्टूबर को निचली सदन में अंतिम मंजूरी मिलने के बाद सरकार के लिए यह एक महत्वपूर्ण संसदीय उपलब्धि बनी है। मतदान 227-164 रहा।
इससे अब इटली अगले आम चुनाव में एक नए चुनावी मॉडल की ओर बढ़ेगा।
हालांकि, इस कानून को लेकर राजनीतिक विवाद समाप्त नहीं हुआ है। विपक्ष की ओर से संवैधानिक चुनौती की संभावना बनी हुई है और आने वाले समय में अदालतों तथा राजनीतिक दलों के बीच इस व्यवस्था की व्याख्या को लेकर बहस जारी रह सकती है। AP News
क्या यह कानून सीधे मेलोनी को अगली सरकार दिलाएगा?
यह कहना जल्दबाजी होगी।
कानून किसी भी गठबंधन को केवल तभी बोनस देगा जब वह निर्धारित 42 प्रतिशत सीमा और अन्य शर्तें पूरी करेगा। इसलिए मौजूदा सरकार का चुनावी लाभ या नुकसान केवल कानून देखकर तय नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा चुनाव से पहले गठबंधन कैसे बनते हैं, कौन प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनता है, कितने दल एक साथ आते हैं और मतदाता किसे समर्थन देते हैं—ये सभी कारक परिणाम को प्रभावित करेंगे।
इसलिए इस कानून को मेलोनी के लिए “गारंटीड जीत” के रूप में देखना सही नहीं होगा। यह चुनाव का नियम बदलता है, चुनाव का नतीजा पहले से तय नहीं करता।
इटली की राजनीति अब गठबंधन की नई परीक्षा में
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रभाव शायद चुनाव से पहले दिखाई देगा।
पहले से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा, गठबंधन का गठन और 42 प्रतिशत की सीमा—इन तीनों के कारण पार्टियों को मतदान से पहले ही ज्यादा स्पष्ट राजनीतिक गठबंधन बनाने पड़ सकते हैं।
जहां पहले अलग-अलग दल स्वतंत्र रूप से वोट मांग सकते थे, वहीं अब सरकार बनाने की क्षमता के लिए व्यापक गठबंधन का महत्व और बढ़ सकता है।
इसका असर राजनीतिक अभियान, उम्मीदवारों के चयन और छोटे दलों की रणनीति पर भी पड़ने की संभावना है।
‘Stabilicum’ बनाम ‘Melonellum’ की लड़ाई के पीछे असली मुद्दा क्या है?
नाम चाहे Stabilicum हो या Melonellum, असली बहस दो अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों के बीच है।
एक पक्ष कहता है कि चुनाव का उद्देश्य केवल संसद में वोटों का अनुपात दिखाना नहीं, बल्कि ऐसी सरकार बनाना भी है जो अपना कार्यकाल पूरा कर सके और नीतियों को लागू कर सके।
दूसरा पक्ष कहता है कि सरकार की स्थिरता जरूरी है, लेकिन इसके लिए वोट और सीटों के बीच संतुलन भी बनाए रखना चाहिए।
यही कारण है कि 105 सीटों का बोनस इस पूरी बहस का केंद्र बना हुआ है।
यूरोप की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर
इटली यूरोप की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और यूरोपीय संघ की राजनीति में उसका महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए देश के चुनावी नियमों में बड़ा बदलाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित विषय नहीं है।
सरकार के स्थायित्व, गठबंधन की संरचना और भविष्य की चुनावी प्रतिस्पर्धा का प्रभाव इटली की यूरोपीय नीतियों पर भी पड़ सकता है।
हालांकि यह कहना अभी संभव नहीं है कि नई व्यवस्था से भविष्य में किस तरह की सरकार बनेगी या कौन-सा गठबंधन बहुमत हासिल करेगा।
अब आगे क्या होगा?
निचली सदन से अंतिम मंजूरी मिलने के बाद नई चुनावी व्यवस्था अगले आम चुनाव के लिए महत्वपूर्ण आधार बनेगी। इसका सबसे बड़ा परीक्षण तब होगा जब राजनीतिक दल इस कानून के तहत अपने गठबंधन और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तय करेंगे।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि क्या कोई गठबंधन 42 प्रतिशत की सीमा पार कर पाता है और दोनों सदनों में बोनस के लिए आवश्यक शर्तें पूरी करता है।
अगर ऐसा होता है तो 105 सीटों का बहुमत बोनस इटली की संसद की शक्ति-संरचना को काफी बदल सकता है। अगर कोई गठबंधन इस सीमा तक नहीं पहुंचता, तो आनुपातिक वितरण का रास्ता सक्रिय होगा।
यानी आने वाले चुनाव में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि किस दल को सबसे ज्यादा वोट मिले। यह भी देखना होगा कि कौन-सा गठबंधन 42 प्रतिशत के आसपास पहुंचता है और नई व्यवस्था के तहत सरकार बनाने की स्थिति में आता है।
इटली में चुनावी राजनीति का नया अध्याय शुरू
Italy Electoral Reform के पारित होने के साथ इटली ने अपने चुनावी सिस्टम में एक बड़ा बदलाव दर्ज किया है। सरकार इसे राजनीतिक स्थिरता की दिशा में कदम बता रही है, जबकि विपक्ष प्रतिनिधित्व, शक्ति के संतुलन और संवैधानिक प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहा है।
105 सीटों का बोनस, 42 प्रतिशत की सीमा, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की पूर्व घोषणा और आनुपातिक प्रतिनिधित्व—ये सभी प्रावधान मिलकर इटली के अगले चुनाव को पहले के मुकाबले अलग राजनीतिक ढांचे में ले जाएंगे।
अब असली सवाल यह नहीं है कि कानून पास होगा या नहीं—क्योंकि 8 अक्टूबर 2026 को निचली सदन ने इसे अंतिम मंजूरी दे दी है। असली सवाल यह है कि जब अगला चुनाव इस नए नियम के तहत होगा, तब 42 प्रतिशत की सीमा कौन पार करता है, कौन गठबंधन कितना मजबूत बनाता है और 105 सीटों का बोनस इटली की संसद में सत्ता का समीकरण किस तरह बदलता है।

