उत्तर प्रदेश

आगरा से अलीगढ़ तक फैला Fake Medicine का काला साम्राज्य! व्हाट्सएप कॉल, रोडवेज बस और हवाला से चलता था करोड़ों का खेल

Fake Medicine Racket को लेकर उत्तर प्रदेश में सामने आया ताजा खुलासा बेहद चौंकाने वाला माना जा रहा है। आगरा में करोड़ों रुपये की नकली दवाओं के मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस पूरे सिंडिकेट की परतें खुलती जा रही हैं। अब इस मामले के तार पूरी तरह अलीगढ़ से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं।

ड्रग्स विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में सामने आया है कि इस पूरे नेटवर्क का कथित मास्टरमाइंड अलीगढ़ निवासी मयंक गुप्ता उर्फ किट्टू है, जो बेहद संगठित तरीके से उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों में नकली दवाओं का अवैध कारोबार चला रहा था।

जांच एजेंसियों के मुताबिक यह केवल स्थानीय स्तर का मामला नहीं बल्कि कई शहरों तक फैला एक संगठित नेटवर्क हो सकता है, जिसमें नकली दवाओं की सप्लाई, हवाला पेमेंट और पहचान छिपाने के लिए हाई-टेक तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा था।


रूड़की की सीक्रेट फैक्टरी से तैयार होती थीं नकली दवाएं

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि नकली दवाओं का निर्माण उत्तराखंड के रूड़की स्थित एक कथित गुप्त फैक्टरी में किया जा रहा था। यहीं से बड़ी मात्रा में दवाओं की खेप तैयार कर अलग-अलग शहरों में भेजी जाती थी।

सूत्रों के अनुसार फैक्टरी को इस तरह संचालित किया जा रहा था कि सामान्य स्तर पर किसी को उस पर शक न हो। दवाओं की पैकेजिंग और ब्रांडिंग इतनी पेशेवर तरीके से की जाती थी कि पहली नजर में असली और नकली दवा में अंतर करना मुश्किल हो जाता था।

जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस फैक्टरी में कौन-कौन लोग शामिल थे और क्या इस नेटवर्क के तार दूसरे राज्यों तक भी फैले हुए हैं।


1.78 लाख से ज्यादा नकली टैबलेट स्ट्रिप बेचने का आरोप

जांच के दौरान सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ कि अप्रैल 2025 से अब तक आगरा के एक दवा कारोबारी को करीब 1.78 लाख से ज्यादा नकली ऑक्साल्जिन-डीपी टैबलेट स्ट्रिप सप्लाई की गईं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी मात्रा में नकली दवाओं की बिक्री केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। नकली दवाएं मरीजों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ मानी जाती हैं क्योंकि इनमें इस्तेमाल होने वाले रसायन या तो कम प्रभावी होते हैं या कई बार बेहद नुकसानदायक साबित हो सकते हैं।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार यदि समय रहते यह नेटवर्क पकड़ा नहीं जाता तो हजारों मरीज प्रभावित हो सकते थे।


सरकारी रोडवेज बसों से भेजी जाती थी दवाओं की खेप

इस Fake Medicine Racket की कार्यप्रणाली ने जांच एजेंसियों को भी चौंका दिया है। आरोपियों ने पकड़े जाने से बचने के लिए बेहद शातिर तरीका अपनाया था।

जांच में पता चला है कि नकली दवाओं की खेप किसी प्राइवेट कूरियर कंपनी से नहीं बल्कि सरकारी रोडवेज बसों के जरिए अलग-अलग शहरों में भेजी जाती थी। इससे शक की संभावना कम हो जाती थी और सामान्य पार्सल की तरह माल आसानी से पहुंच जाता था।

सूत्रों के मुताबिक दवाओं के पैकेट को आम सामान की तरह भेजा जाता था ताकि किसी को उस पर संदेह न हो। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस प्रक्रिया में और कौन-कौन लोग शामिल थे।


व्हाट्सएप कॉल से चलता था पूरा नेटवर्क

जांच अधिकारियों के अनुसार आरोपी अपनी बातचीत के लिए सामान्य मोबाइल कॉल का इस्तेमाल नहीं करते थे। पूरा संपर्क केवल व्हाट्सएप कॉल के जरिए किया जाता था ताकि कॉल रिकॉर्ड आसानी से ट्रेस न किए जा सकें।

यह तरीका दिखाता है कि आरोपी तकनीकी निगरानी से बचने के लिए पहले से सतर्क थे। पुलिस अब डिजिटल डाटा, चैट हिस्ट्री और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की जांच कर रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में कई संगठित अपराधी नेटवर्क पारंपरिक फोन कॉल से बचते हुए एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने लगे हैं।


हवाला नेटवर्क और पांच रुपये के नोट का कोडवर्ड

इस मामले में सामने आया हवाला कनेक्शन जांच एजेंसियों के लिए सबसे अहम पहलुओं में से एक माना जा रहा है। करोड़ों रुपये के लेनदेन के लिए कथित तौर पर हवाला चैनल का इस्तेमाल किया जाता था।

सूत्रों के अनुसार पेमेंट सिस्टम इतना गोपनीय बनाया गया था कि कैश डिलीवरी के समय पांच रुपये के नोट का नंबर “कोडवर्ड” की तरह इस्तेमाल होता था। नोट का वही नंबर पहचान के रूप में बताया जाता और उसके बाद कैश हैंडओवर किया जाता था।

बताया जा रहा है कि यह लेनदेन मुख्य रूप से अलीगढ़ के रामघाट रोड और हाथरस रोड इलाके में किए जाते थे।

जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि हवाला नेटवर्क में कौन लोग शामिल थे और पैसा कहां-कहां ट्रांसफर किया गया।


जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा मामला

विशेषज्ञों के अनुसार नकली दवा रैकेट केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि “साइलेंट हेल्थ टेरर” की तरह होता है। मरीज जब डॉक्टर की सलाह पर दवा खरीदते हैं तो उन्हें यह भरोसा होता है कि दवा सुरक्षित और प्रभावी होगी।

लेकिन नकली दवाएं—

  • बीमारी को और गंभीर बना सकती हैं
  • शरीर पर खतरनाक साइड इफेक्ट डाल सकती हैं
  • इलाज को पूरी तरह विफल कर सकती हैं
  • कई मामलों में जानलेवा भी साबित हो सकती हैं

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अब बाजार में पहुंची संदिग्ध दवाओं की पहचान और सैंपलिंग में जुटे हुए हैं।


क्या पूरे उत्तर प्रदेश में फैला है नेटवर्क?

जांच एजेंसियों को आशंका है कि यह रैकेट केवल आगरा और अलीगढ़ तक सीमित नहीं हो सकता। जिस स्तर पर सप्लाई और पेमेंट नेटवर्क सामने आया है, उससे अंदेशा जताया जा रहा है कि कई अन्य शहर भी इसकी चपेट में हो सकते हैं।

ड्रग्स विभाग अब अन्य जिलों में भी मेडिकल स्टोर्स और सप्लाई चैन की जांच कर रहा है। पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि कहीं अन्य राज्यों में भी इसी तरह की सप्लाई तो नहीं की गई।


पुलिस और ड्रग्स विभाग की संयुक्त जांच तेज

इस मामले के सामने आने के बाद पुलिस और ड्रग्स विभाग ने जांच और तेज कर दी है। कई स्थानों पर दस्तावेजों, बैंकिंग लेनदेन और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस नेटवर्क की पूरी चेन सामने आती है तो यह उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े नकली दवा रैकेट में से एक साबित हो सकता है।


 

आगरा और अलीगढ़ से जुड़ा यह नकली दवा रैकेट केवल एक आपराधिक मामला नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है। व्हाट्सएप कॉल, हवाला नेटवर्क और रोडवेज बसों के जरिए चल रहे इस कथित सिंडिकेट ने जांच एजेंसियों को भी चौंका दिया है। आने वाले दिनों में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे इस नेटवर्क से जुड़े और बड़े खुलासे सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

 

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