Allahabad High Court ने नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी की 10 साल की सजा रखी बरकरार, कहा—पीड़िता की भरोसेमंद गवाही पर्याप्त
Allahabad High Court ने नाबालिग से दुष्कर्म के एक मामले में दोषी को सुनाई गई 10 साल की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद और विश्वसनीय है, तो दोषसिद्धि के लिए वही पर्याप्त साक्ष्य हो सकती है। केवल मेडिकल जांच में चोट के निशान नहीं मिलने या प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने में देरी के आधार पर पीड़िता के बयान को खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने गाजियाबाद निवासी दोषी की ओर से सजा के खिलाफ दाखिल अपील खारिज कर दी। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और पीड़िता के बयान पर विचार करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
पीड़िता की गवाही को माना गया विश्वसनीय
मामले में अभियोजन पक्ष ने बताया कि घटना के दौरान पीड़िता का परिवार पड़ोस में जागरण देखने गया था। सुबह करीब चार बजे परिवार के लौटने पर पीड़िता घर से गायब मिली। पूछताछ के दौरान पता चला कि आरोपी, जो पीड़िता का दूर का रिश्तेदार था, उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया था।
अभियोजन के अनुसार, आरोपी शादीशुदा था और उसके तीन बच्चे भी थे। पीड़िता ने अपने बयान में बताया कि आरोपी उसे पहले भी अपने साथ ले गया था। दूसरी बार वह उसे शादी का झांसा देकर फरीदाबाद ले गया और वहां किराये के कमरे में अपनी पत्नी बताकर रखा। अदालत ने पीड़िता के बयान का मूल्यांकन करते हुए उसकी विश्वसनीयता को महत्वपूर्ण माना।
मेडिकल जांच में चोट नहीं मिलने से गवाही कमजोर नहीं होती
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेडिकल साक्ष्य में चोट के निशान नहीं मिलना अपने आप में पीड़िता की गवाही को अविश्वसनीय बनाने का आधार नहीं है। इसी तरह, प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी भी हर मामले में अभियोजन की कहानी को गलत साबित नहीं करती। अदालत के अनुसार, ऐसे तथ्यों का मूल्यांकन पूरे मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के साथ किया जाना चाहिए।
इस टिप्पणी का अर्थ यह है कि किसी आपराधिक मामले में साक्ष्यों का आकलन केवल एक पहलू के आधार पर नहीं किया जा सकता। पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता, घटना से जुड़ी परिस्थितियों और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को समग्र रूप से देखना आवश्यक है। हालांकि, प्रत्येक मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।
उम्र के विवाद में हाईस्कूल प्रमाणपत्र को महत्व
मामले में पीड़िता की उम्र को लेकर भी सवाल उठा था। हाईकोर्ट ने हाईस्कूल प्रमाणपत्र को महत्वपूर्ण माना, जिसके अनुसार घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 वर्ष थी। दूसरी ओर, मुख्य चिकित्सा अधिकारी की ओर से की गई जांच में उसकी उम्र 18 वर्ष बताई गई थी।
अदालत ने उम्र के निर्धारण में उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्य पर विचार किया। इस मामले में हाईस्कूल प्रमाणपत्र ने पीड़िता की उम्र तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नाबालिग होने का प्रश्न ऐसे मामलों में कानूनी रूप से अहम होता है, इसलिए उम्र से जुड़े दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों का मूल्यांकन न्यायिक निर्णय का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है।
दोषी की अपील खारिज, 10 साल की सजा जारी रहेगी
दोषी ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 10 साल की सजा को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने अपील खारिज कर दी और सजा को बरकरार रखा। अदालत की टिप्पणी ने यह स्पष्ट किया कि भरोसेमंद पीड़िता की गवाही को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए तथा मेडिकल साक्ष्य में चोट न मिलना या FIR में देरी अपने आप में दोषसिद्धि को कमजोर नहीं करती।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दोषी की 10 साल की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि पीड़िता की विश्वसनीय गवाही दोषसिद्धि का पर्याप्त आधार हो सकती है। अदालत ने मेडिकल जांच में चोट न मिलने और प्राथमिकी में देरी को अपने आप में गवाही खारिज करने का निर्णायक आधार मानने से इनकार किया।

