Budaun प्रभातफेरी विवाद: पुलिस रोक, लाठीचार्ज और जांच की आंच—ब्यौर कासिमाबाद में परंपरा बनाम प्रशासन का टकराव
Budaun Prabhat Pheri dispute ने बदायूं जिले के इस्लामनगर थाना क्षेत्र के गांव ब्यौर कासिमाबाद को अचानक सुर्खियों में ला दिया है। माघ महीने की परंपरागत प्रभातफेरी को रोके जाने के बाद हुए बवाल ने न केवल गांव की शांति को झकझोर दिया, बल्कि पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद एडीएम प्रशासन अरुण कुमार और एसपी देहात हृदेश कठेरिया ने गांव पहुंचकर करीब दो घंटे तक गहन जांच-पड़ताल की और ग्रामीणों से पूछताछ की।
अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि प्रभातफेरी अपने पुराने और परंपरागत रूट से ही निकाली जा रही थी। इसके बावजूद पुलिस ने किस आधार पर इसे रोका, अब यही सवाल जांच के केंद्र में है। बवाल शुरू होने के करीब 12 घंटे बाद आखिरकार प्रभातफेरी उसी पुराने रास्ते से निकलवाई गई, जिससे ग्रामीणों में कुछ हद तक संतोष तो दिखा, लेकिन नाराज़गी अभी भी बनी हुई है।
🔴 परंपरा और टकराव: कैसे शुरू हुआ विवाद
गांव ब्यौर कासिमाबाद में माघ महीने के दौरान प्रभातफेरी निकालने की परंपरा करीब पांच दशकों से चली आ रही है। शुक्रवार तड़के जब श्रद्धालु अपने तय रूट से यात्रा निकाल रहे थे, तभी दूसरे समुदाय की ओर से रास्ते को “विवादित” बताते हुए पुलिस में शिकायत की गई। इसके बाद प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए यात्रा को रोक दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि यह रास्ता वर्षों से इस्तेमाल होता आ रहा है और कभी कोई विवाद नहीं हुआ। जैसे ही पुलिस ने प्रभातफेरी रोकने की कोशिश की, स्थिति तनावपूर्ण हो गई और दोनों पक्षों के बीच बहस बढ़ने लगी।
🔴 लाठीचार्ज और भगदड़: गांव में मचा हड़कंप
स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने लाठियां फटकार दी, जिससे गांव में अफरा-तफरी मच गई। भगदड़ के दौरान महिला और युवकों समेत 10 से अधिक लोग घायल हो गए।
घायलों में चंचल, महेंद्र शर्मा, जसोदा मौर्य, आनंद शर्मा और मोहित सिंह जैसे नाम सामने आए हैं।
हालात को संभालने के लिए एसएसपी ने तुरंत सिविल लाइंस इंस्पेक्टर हरेंद्र सिंह को गांव भेजा। उन्होंने घायलों को अपनी सरकारी गाड़ी से अस्पताल पहुंचाया और इलाज की व्यवस्था कराई। इस कदम से कुछ लोगों ने राहत की सांस ली, लेकिन पुलिस की शुरुआती कार्रवाई को लेकर सवाल अब भी कायम हैं।
🔴 प्रशासन की जांच: दो घंटे की पूछताछ, बड़ा संकेत
घटना के बाद एडीएम प्रशासन अरुण कुमार और एसपी देहात हृदेश कठेरिया ने गांव पहुंचकर मौके का मुआयना किया। उन्होंने ग्रामीणों, प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय पुलिस से बातचीत की। करीब दो घंटे तक चली पूछताछ के बाद अधिकारियों ने माना कि प्रभातफेरी अपने सही और परंपरागत रूट पर ही निकाली जा रही थी।
इसके बाद यह सवाल और गहरा गया कि पुलिस ने किस आधार पर इसे रोका और लाठीचार्ज जैसे सख्त कदम उठाए। अधिकारियों ने इस पहलू पर विस्तृत जांच के संकेत दिए हैं।
🔴 ग्रामीणों की नाराज़गी: ‘मानसिकता पर सवाल’
गांव के लोगों का कहना है कि जब प्रशासन ने खुद मान लिया कि रूट सही था, तो फिर पुलिस की कार्रवाई क्यों हुई। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि थाना पुलिस की “मानसिकता ठीक नहीं थी” और थानाध्यक्ष नरेश कुमार तथा सीओ बिल्सी संजीव कुमार ने अधिकारियों को गुमराह किया, जिससे मामला बढ़ गया।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि उनका किसी के साथ टकराव का कोई इरादा नहीं था, वे केवल अपनी परंपरा निभा रहे थे। जांच का आश्वासन मिलने के बाद वे अपने गांव लौटे, लेकिन अब कार्रवाई की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
🔴 सामूहिक शिकायत: कार्रवाई की मांग तेज
घटना के बाद ग्रामीणों ने एसपी देहात हृदेश कठेरिया को सामूहिक रूप से एक शिकायती पत्र सौंपा। इसमें आरोप लगाया गया कि पुलिस ने धार्मिक कार्य में बाधा डाली और बिना पूरी जांच के सख्त कदम उठाए।
शिकायत में कहा गया कि यदि दूसरे समुदाय की ओर से आपत्ति आई थी, तो पुलिस को पहले श्रद्धालुओं से बातचीत करनी चाहिए थी और स्थिति को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए थी। ग्रामीणों ने थानाध्यक्ष और संबंधित पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग की है।
🔴 एसपी सिटी को सौंपी गई विस्तृत जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत जांच एसपी सिटी विजयेंद्र द्विवेदी को सौंपी गई है। उनकी रिपोर्ट के आधार पर थानाध्यक्ष से लेकर बीट पर तैनात सिपाही तक पर कार्रवाई हो सकती है।
अधिकारियों का कहना है कि यदि जांच में पुलिस की मनमानी या लापरवाही सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।
🔴 कानून-व्यवस्था और धार्मिक परंपराएं: संतुलन की चुनौती
यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और धार्मिक परंपराओं के सम्मान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस न पहुंचे और शांति बनी रहे, वहीं पुलिस का कर्तव्य है कि वह किसी भी संभावित टकराव को समय रहते शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि संवाद और स्थानीय स्तर पर सामंजस्य ही ऐसे मामलों का स्थायी समाधान हो सकता है।
🔴 गांव में लौट रही शांति, लेकिन सवाल बाकी
प्रभातफेरी के पुराने रूट से निकलने के बाद गांव में स्थिति अब सामान्य बताई जा रही है। हालांकि, ग्रामीणों और प्रशासन दोनों की नजरें अब जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।
यह मामला अब केवल एक धार्मिक यात्रा से जुड़ा विवाद नहीं रहा, बल्कि यह पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली और जवाबदेही की भी परीक्षा बन गया है।

