Liaquat Ali खान की 4,000 करोड़ की संपत्ति पर संग्राम: डबकौली खुर्द की ज़मीन, भूमाफिया, सरकार और हाईकोर्ट की जंग
News-Desk
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corruption allegations, Evacuee Property, Haryana News, high court case, land dispute, legal battle, Liaquat Ali, Liaquat Ali Khan Property, Rural NewsLiaquat Ali Khan property case एक बार फिर सुर्खियों में है और इस बार मामला केवल जमीन के टुकड़े तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह इतिहास, राजनीति, कानून और कथित भ्रष्टाचार की परतों को खोलता हुआ एक बड़े विवाद में बदल गया है। हरियाणा के करनाल जिले के गांव डबकौली खुर्द से जुड़ी यह कहानी पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री नवाब लियाकत अली खान के परिवार की उस संपत्ति से जुड़ी है, जिसकी बाजार कीमत आज करीब 4,000 करोड़ रुपए आंकी जा रही है।
इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की निगाहें टिकी हैं, जहां हरियाणा सरकार ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है। सरकार का कहना है कि इस जमीन का कस्टोडियन केंद्र सरकार नहीं है, बल्कि वर्तमान कब्जाधारी ही इसके संरक्षक माने जाते हैं। इस दलील ने याचिकाकर्ताओं और ग्रामीणों के बीच नाराज़गी और चिंता दोनों को बढ़ा दिया है।
🔴 हाईकोर्ट में सरकार का जवाब, याचिकाकर्ताओं में असंतोष
गुरुवार को याचिकाकर्ताओं के वकीलों इंदूबाला, करूणा शर्मा और रामकिशन ने बताया कि राज्य सरकार की ओर से जो रिप्लाई हाईकोर्ट में दिया गया है, वह उनके लिए “नेगेटिव” है। उनका कहना है कि सरकार ने इस जमीन को भारत सरकार के कस्टोडियन के अधीन मानने से इनकार कर दिया है और मौजूदा कब्जाधारियों जमशेद अली खान और अन्य को ही संरक्षक माना है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि भूमाफिया फर्जी दस्तावेजों और झूठे वारिस खड़े कर जमीन को खुर्द-बुर्द कर रहा है। उनका आरोप है कि इसमें कुछ अधिकारियों और नेताओं की मिलीभगत भी शामिल है, इसलिए इस पूरे मामले की जांच CBI से कराई जानी चाहिए।
हाईकोर्ट में अब अगली सुनवाई 3 फरवरी 2026 को तय की गई है, क्योंकि केंद्र सरकार और CBI की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक जवाब दाखिल नहीं किया गया है।
🔴 4,000 करोड़ की संपत्ति, 1,200 एकड़ की जमीन और करनाल का दिल
याचिका के अनुसार, यह विवादित संपत्ति गांव डबकौली खुर्द में फैली करीब 1,200 एकड़ भूमि से जुड़ी है। इसमें करनाल शहर के भीतर दुकानें, आवासीय प्लॉट और कृषि भूमि शामिल है। ग्रामीणों और याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इस पूरी संपत्ति की मौजूदा बाजार कीमत करीब 4,000 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह जमीन दशकों से विवादों में घिरी रही है। कभी इसे ‘एवाक्यूई प्रॉपर्टी’ कहा गया, तो कभी निजी संपत्ति बताकर कब्जे किए गए। आज यह मामला एक बड़े कानूनी और राजनीतिक संग्राम का रूप ले चुका है।
🔴 सरकार का तर्क: निष्पक्ष जांच और कैंसिलेशन रिपोर्ट
हरियाणा सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दिए गए जवाब में कहा गया है कि इस मामले की जांच एसआईटी और डीएसपी रैंक के अधिकारियों द्वारा निष्पक्ष तरीके से की गई। जांच के दौरान कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया, जिसके आधार पर कार्रवाई की जा सके। इसी वजह से मामले में कैंसिलेशन रिपोर्ट पेश की गई।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकीलों का कहना है कि यह रिपोर्ट कई सवालों को अनुत्तरित छोड़ देती है और असली दोषियों तक पहुंचने के बजाय मामले को दबाने की कोशिश लगती है।
🔴 लियाकत अली खान का इतिहास और डबकौली खुर्द से रिश्ता
नवाब लियाकत अली खान का जन्म करनाल के डबकौली गांव में हुआ था। उनका परिवार एक जमींदार मुस्लिम परिवार था। उनके पिता नवाब रुकनुद्दौला बड़े जमींदार थे और उन्हें ब्रिटिश शासन के दौरान नवाबी उपाधि भी मिली थी।
लियाकत अली खान ने प्रारंभिक शिक्षा भारत में प्राप्त की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए, जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। इसी परिवार से जुड़े उमरदराज अली खान की जमीन को लेकर आज यह पूरा विवाद खड़ा हुआ है।
🔴 1935 से 1950 तक: जमीन से ‘एवाक्यूई प्रॉपर्टी’ बनने की कहानी
1935 में उमरदराज अली खान की मृत्यु के बाद उनकी करीब 1,200 एकड़ जमीन का इंतकाल उनके पांच पुत्रों—नवाबजादा शमशाद अली खान, इरशाद अली खान, एजाज अली खान, मुमताज अली खान और इम्तियाज अली खान—के नाम हुआ। उनकी बेटी जहांगीर बेगम का विवाह 1918 में लियाकत अली खान से हुआ था।
1945-46 के दौरान डबकौली खुर्द गांव यमुना नदी के बहाव के कारण उजड़ गया और इसका रकबा उत्तर प्रदेश की ओर चला गया। आज़ादी के बाद उमरदराज अली खान के सभी वारिस पाकिस्तान चले गए।
1950 में उत्तर प्रदेश सरकार ने जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम लागू किया। इसके तहत यह जमीन राज्य के अधीन आ गई और इसे ‘एवाक्यूई प्रॉपर्टी’ घोषित किया गया। 1962 में जनरल कस्टोडियन ऑफ इंडिया ने यह फैसला दिया कि यह जमीन कस्टोडियन के अधीन रहेगी।
🔴 कैसे शुरू हुआ कथित भूमाफिया नेटवर्क?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि 1990 के दशक में कुछ भूमाफियाओं ने फर्जी वसीयत और झूठे वारिस दिखाकर करीब 6,000 बीघा यानी लगभग 1,200 एकड़ कृषि भूमि पर कब्जा कर लिया। ग्रामीणों का दावा है कि इसमें पटवारी, कानूनगो, चकबंदी अधिकारी, राजस्व विभाग के बड़े अधिकारी और कुछ राजनीतिक लोग शामिल थे।
2005 में गांव के लोगों ने मुख्यमंत्री कार्यालय में 150 से ज्यादा शिकायतें सौंपीं। इसके बाद इंद्री थाने में एफआईआर दर्ज हुई, जिसमें धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश जैसी धाराएं लगाई गईं। आरोप है कि जांच रिपोर्ट को दबा दिया गया और मामला आगे नहीं बढ़ने दिया गया।
🔴 कोर्ट की दहलीज पर ग्रामीणों की लड़ाई
2007-08 में जब जमीन पर कब्जा करने की कोशिश हुई, तो ग्रामीणों ने विरोध किया। इसके बाद 2009-10 में मामला पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। कोर्ट के आदेश पर एसआईटी बनाई गई, लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यहां भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
2012-13 में भूमाफियाओं ने केस रद्द कराने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। तब से यह मामला “सोनू एंड अदर्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स” के नाम से चल रहा है।
🔴 CBI और केंद्र सरकार की भूमिका पर टिकी निगाहें
इस Liaquat Ali Khan property case में अब सबसे बड़ी निगाहें केंद्र सरकार और CBI के जवाब पर टिकी हैं। याचिकाकर्ताओं को उम्मीद है कि इन दोनों की रिपोर्ट से मामले की दिशा बदलेगी और कथित घोटाले की परतें खुलेंगी।
ग्रामीणों का कहना है कि वे मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से मिलकर अपनी बात फिर से रखेंगे, ताकि इस मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो सके।
🔴 जमीन से जुड़ा संघर्ष, राजनीति और प्रशासन की परीक्षा
यह मामला केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी परीक्षा बन गया है। 4,000 करोड़ की संपत्ति का विवाद हरियाणा की ग्रामीण राजनीति, भूमि सुधार व्यवस्था और सरकारी निगरानी तंत्र पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होती है, तो यह भविष्य में भूमि घोटालों पर एक मजबूत मिसाल बन सकता है।

