उत्तर प्रदेश

Farrukhabad-हाईकोर्ट की फटकार से हिली यूपी पुलिस! अवैध हिरासत, धमकी और तोड़फोड़ के आरोपों से दागदार हुई कायमगंज पुलिस

Farrukhabad जिले में पुलिस की मनमानी और अवैध कार्यशैली का एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को जिले की पुलिस पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “कानून व्यवस्था के नाम पर नागरिकों को अवैध रूप से कैद करना लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।” यह मामला तब सामने आया जब फतेहगढ़ निवासी प्रीति यादव ने हाईकोर्ट में एक हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की, जिसमें उनके परिजनों को कायमगंज थाने की पुलिस द्वारा छह दिन तक अवैध हिरासत में रखने का आरोप लगाया गया था।


🚨8 सितंबर की रात – जब कानून के रखवाले खुद बन गए अपराधी

प्रीति यादव के वकील संतोष पांडेय ने अदालत को बताया कि आठ सितंबर की रात करीब नौ बजे कायमगंज थाना प्रभारी अनुराग मिश्रा, सीओ समेत चार-पांच पुलिसकर्मी, और अन्य अधिकारी रात के अंधेरे में बिना वारंट के घर में घुस आए
परिवार के दो सदस्यों को जबरन हिरासत में ले लिया गया। अगले छह दिनों तक किसी को उनकी लोकेशन की जानकारी नहीं दी गई — न कोई रिकॉर्ड, न कोई एंट्री। यह खुलासा होने के बाद अदालत ने इसे “गंभीर संवैधानिक उल्लंघन” माना।


📜पुलिस ने कराया जबरन बयान – ‘कोई कार्रवाई नहीं करेंगे’

14 सितंबर की रात को पुलिस ने दोनों लोगों को छोड़ा, लेकिन जाने से पहले कई कागज़ों पर जबरन दस्तखत कराए, जिनमें लिखा था — “हम कोई मुकदमा नहीं करेंगे, न ही कोई शिकायत करेंगे।”
यह झूठे दस्तावेज़ बाद में पुलिस ने हाईकोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किए, लेकिन अदालत ने इसे “अवैध दबाव में प्राप्त बयान” कहकर खारिज कर दिया और खुद प्रीति यादव को कोर्ट में बुलाया।


📹CCTV तोड़े, DVR उठा ले गए – न्याय की गूंज को मिटाने की कोशिश

कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रीति यादव ने बताया कि 11 अक्तूबर को लगभग 100 पुलिसकर्मी उनके वकील अवधेश मिश्रा के घर पहुंच गए। उन्होंने घर में घुसकर तोड़फोड़ की, सामान फेंक दिया, और CCTV कैमरे तोड़कर DVR भी उठा ले गए
यह घटना दर्शाती है कि पुलिस ने न केवल अवैध हिरासत रखी, बल्कि सबूतों को भी नष्ट करने का प्रयास किया।

इस पर जस्टिस मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने सख्त नाराजगी जताई और सभी संबंधित अधिकारियों को डीटेल रिपोर्ट दाखिल करने के लिए बुधवार तक का समय दिया


⚠️हाईकोर्ट का दो टूक आदेश – “न धमकाएं, न संपर्क करें”

14 अक्टूबर को जब प्रीति यादव अदालत में पेश हुईं, तो उन्होंने बताया कि उन्हें लगातार पुलिस से धमकियां मिल रही हैं। इस पर कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए आदेश दिया —

“कायमगंज थाने की पुलिस, सीओ और एसपी किसी भी रूप में याचिकाकर्ता से संपर्क या धमकी नहीं देंगे। ऐसा करने पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी।”


👮‍♀️चौकी प्रभारी लाइन हाजिर, SP पर कोर्ट की फटकार

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी आरती सिंह को भी कोर्ट में पेश होना पड़ा
हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि “जिले की पुलिस न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रही है।”
इसके बाद तत्काल प्रभाव से नगर चौकी प्रभारी नागेंद्र सिंह को लाइन हाजिर कर दिया गया।

साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पुलिसकर्मियों ने आदेश की अवहेलना की तो गंभीर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।


🔥पुलिस की कार्यशैली पर सवाल – ‘मित्र पुलिस’ या ‘दबंग पुलिस’?

फर्रुखाबाद की पुलिस पहले भी कई बार न्यायालय की फटकार झेल चुकी है।
कभी फर्जी असलहा लगाकर गिरफ्तारी तो कभी मुकदमों में मनमर्जी से धाराएं बदलने जैसी घटनाओं ने पुलिस की विश्वसनीयता को झटका दिया है।
इस बार तो अदालत को कहना पड़ा —

“ऐसा लगता है कि यूपी पुलिस को न्यायपालिका की परवाह नहीं रही। जब तक सख्त कार्रवाई नहीं होगी, जनता का भरोसा नहीं लौटेगा।”


📁केस-1: दुष्कर्म के मामले में लापरवाही से आरोपी को मिली राहत

थाना मऊदरवाजा क्षेत्र के एक ग्रामीण ने छह अक्टूबर 2024 को अपनी 14 वर्षीय बेटी के अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
पुलिस ने पहले पॉक्सो एक्ट और गैंगरेप की धाराएं लगाईं, लेकिन बाद में रिपोर्ट से गंभीर धाराएं हटा दीं और केस को ‘छेड़छाड़’ में बदल दिया।
इससे आरोपी को अंतरिम जमानत मिल गई, और पीड़िता के पिता की पैरवी के दौरान मौत हो गई।
पोस्टमार्टम में चोटों के निशान मिले, लेकिन फिर भी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई।

पॉक्सो कोर्ट के जज राकेश कुमार ने तत्कालीन एसपी आलोक प्रियदर्शी, थानाध्यक्ष बलराज भाटी और अन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए।


📁केस-2: बाइक मिस्त्री नंदू को फर्जी तमंचे में फंसाया गया

अगस्त 2024 में मोहम्मदाबाद पुलिस ने नंदू नामक बाइक मिस्त्री को बुलाकर फर्जी केस में फंसा दिया।
जांच में पता चला कि पुलिस ने उसके खिलाफ फर्जी तमंचा दिखाकर गिरफ्तारी की थी।
एडीजी कानपुर की जांच में आरोप सही पाए गए और थानाध्यक्ष मनोज भाटी, दरोगा महेंद्र सिंह, व अन्य कांस्टेबलों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई।
हालांकि, पुलिस की जानबूझकर देरी से विवेचना करने के कारण, दोषी कर्मियों को अदालत से जमानत मिल गई


⚡हाईकोर्ट की चेतावनी – कायमगंज पुलिस पर लटकी कार्रवाई की तलवार

अब कायमगंज सीओ राजेश कुमार द्विवेदी, थानाध्यक्ष अनुराग मिश्रा, और अन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई लगभग तय मानी जा रही है।
अदालत ने कहा है कि बुधवार तक डीटेल जवाब दाखिल न करने पर गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया जा सकता है।


🧠विश्लेषण: जब पुलिस ही बन जाए कानून से ऊपर

यह मामला केवल एक अवैध हिरासत का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सड़ांध को उजागर करता है। पुलिस का काम नागरिकों की रक्षा करना है, लेकिन जब वही संस्था न्यायिक प्रक्रिया में बाधा बने, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।हाईकोर्ट की सख्ती न केवल न्याय का संकेत है, बल्कि एक संदेश भी — कि कानून से बड़ा कोई नहीं।


**अंतिम पैराग्राफ:** फर्रुखाबाद का यह मामला यूपी पुलिस के सिस्टम में व्याप्त गैरजवाबदेही का आईना है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि “न्यायालय के आदेश से ऊपर कोई नहीं।” प्रीति यादव की हिम्मत ने न केवल अपने लिए बल्कि उन तमाम लोगों के लिए उम्मीद जगाई है जो पुलिस की मनमानी का शिकार हुए हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि अदालत के आदेश के बाद प्रशासन इस केस को कितनी ईमानदारी से अंजाम तक पहुंचाता है।

 

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