फिल्मी चक्कर

Mammootty के माथे पर तिलक क्या लगा, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस! ‘इस्लाम का अपमान’ कहने वालों को हरिश्री यूसुफ ने दिया करारा जवाब

मुंबई/गुजरात।  मलयालम सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और नेशनल अवॉर्ड विजेता Mammootty  का गुजरात में पारंपरिक तरीके से स्वागत किए जाने का एक वीडियो सामने आया, जिसमें उनके माथे पर तिलक लगाया गया। इसके बाद सोशल मीडिया के एक वर्ग ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।

कुछ यूजर्स ने ममूटी के मुस्लिम होने का हवाला देते हुए माथे पर तिलक लगाए जाने को धर्म के खिलाफ बताया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और इंस्टाग्राम पर कुछ लोगों ने इसे लेकर आलोचनात्मक टिप्पणियां कीं। वहीं दूसरी तरफ बड़ी संख्या में प्रशंसकों ने अभिनेता का बचाव करते हुए कहा कि किसी अतिथि का तिलक लगाकर स्वागत करना भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है और इसे किसी व्यक्ति के धार्मिक विश्वास से जोड़ना उचित नहीं है।

इस विवाद के बीच मलयालम अभिनेता और फिल्ममेकर हरिश्री यूसुफ ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर ट्रोल करने वालों को जवाब दिया। उन्होंने कहा कि तिलक लगाना किसी धर्म का प्रचार नहीं बल्कि अतिथि के सम्मान और स्वागत की भारतीय परंपरा का हिस्सा है।

यूसुफ ने धर्म के मूल उद्देश्य को लेकर भी अपनी बात रखी और कहा कि धर्म इंसानों को एक-दूसरे से लड़ाने के लिए नहीं, बल्कि बेहतर इंसान बनाने के लिए होना चाहिए।


गुजरात में ममूटी का पारंपरिक अंदाज में हुआ स्वागत

ममूटी हाल ही में एक राष्ट्रीय सम्मान समारोह के सिलसिले में गुजरात पहुंचे थे। इसी दौरान उनके स्वागत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया।

वीडियो में ममूटी का पारंपरिक तरीके से स्वागत करते हुए उनके माथे पर तिलक लगाया गया। कार्यक्रम से जुड़े इस दृश्य को कई लोगों ने सामान्य सांस्कृतिक स्वागत के तौर पर देखा, लेकिन वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचते ही कुछ यूजर्स ने इसे धार्मिक बहस में बदल दिया।

ममूटी के माथे पर तिलक लगाए जाने को लेकर कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाए कि एक मुस्लिम अभिनेता ने तिलक क्यों लगाया। कुछ टिप्पणियों में इसे इस्लाम के खिलाफ बताया गया।

हालांकि, दूसरी तरफ कई प्रशंसकों ने इस आलोचना को अनावश्यक बताते हुए कहा कि किसी समारोह में अतिथि के माथे पर तिलक लगाना भारतीय स्वागत परंपराओं का हिस्सा है और इसे धार्मिक पहचान की परीक्षा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


‘माथे पर तिलक लगाना इस्लाम का अपमान’ कहकर कुछ यूजर्स ने उठाए सवाल

वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। अब्बास नाम के एक यूजर समेत कुछ लोगों ने ममूटी के माथे पर तिलक लगाए जाने पर आपत्ति जताई।

कुछ यूजर्स का तर्क था कि ममूटी मुस्लिम हैं और इसलिए उनके माथे पर तिलक लगाया जाना इस्लामी मान्यताओं के अनुरूप नहीं है। कुछ टिप्पणियों में इसे धर्म का अपमान तक बताया गया।

हालांकि, सोशल मीडिया पर मौजूद हर प्रतिक्रिया को व्यापक समाज की राय मानना उचित नहीं है। उसी पोस्ट और वीडियो के आसपास ऐसे भी अनेक लोग नजर आए जिन्होंने ममूटी का समर्थन किया और कहा कि किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में सम्मान के तौर पर किए गए स्वागत को धार्मिक पहचान के विवाद में बदलना सही नहीं है।

यही वजह है कि यह मामला केवल ममूटी तक सीमित नहीं रहा और सोशल मीडिया पर भारतीय संस्कृति, धार्मिक पहचान और सार्वजनिक जीवन में कलाकारों की स्वतंत्रता को लेकर बहस शुरू हो गई।


हरिश्री यूसुफ ने ट्रोलर्स को बताया ‘कुएं का मेंढक’

ममूटी को लेकर चल रही सोशल मीडिया बहस के बीच मलयालम अभिनेता और फिल्ममेकर हरिश्री यूसुफ ने वीडियो जारी कर अपनी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने आलोचना करने वालों को ‘कुएं का मेंढक’ बताते हुए कहा कि कलाकारों की सोच संकीर्ण नहीं होती। उनके मुताबिक कलाकार अलग-अलग संस्कृतियों और समाजों के संपर्क में रहते हैं, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक होती है।

यूसुफ ने कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी बड़े होटल, समारोह या सार्वजनिक कार्यक्रम में जाता है तो कई जगहों पर मेहमानों का स्वागत फूलों के गुलदस्ते के साथ किया जाता है और कई भारतीय परंपराओं में माथे पर तिलक भी लगाया जाता है।

उनके अनुसार इसे किसी धर्म के प्रचार के तौर पर देखना सही नहीं है।


‘यह भारतीय आदर की परंपरा है, धर्म का प्रचार नहीं’

हरिश्री यूसुफ ने अपने वीडियो में तिलक को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर कहा कि अतिथि के सम्मान में माथे पर तिलक लगाना भारतीय स्वागत परंपरा का हिस्सा हो सकता है।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति का सांस्कृतिक सम्मान किया जा रहा है, तो उसे अनिवार्य रूप से धार्मिक पहचान के साथ क्यों जोड़ा जाना चाहिए?

उनकी बात का मूल तर्क यह था कि भारत जैसे विविधता वाले देश में अलग-अलग समुदायों की सांस्कृतिक परंपराएं एक-दूसरे के संपर्क में आती रहती हैं। किसी समारोह में किसी विशेष परंपरा के तहत स्वागत किए जाने का अर्थ यह जरूरी नहीं कि स्वागत स्वीकार करने वाला व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान बदल रहा है।

यूसुफ ने इसी संदर्भ में सोशल मीडिया पर धार्मिक टिप्पणी करने वालों को संयम बरतने की सलाह दी।


‘धर्म का मकसद इंसानों को बेहतर बनाना है’

हरिश्री यूसुफ ने अपने बयान में धर्म को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य इंसानों को एक-दूसरे से लड़ाना नहीं बल्कि उन्हें बेहतर इंसान बनाना होना चाहिए।

उन्होंने सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के खिलाफ अपशब्द लिखने और फिर उसमें धर्म को घसीटने को गलत बताया।

उनका कहना था कि कलाकारों को अलग-अलग समुदायों और संस्कृतियों के साथ जुड़कर काम करना पड़ता है। ऐसे में किसी कलाकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने या किसी पारंपरिक तरीके से स्वागत स्वीकार करने को लेकर धार्मिक विवाद खड़ा करना उचित नहीं है।

उनका यह वीडियो ममूटी के समर्थन में सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बना।


ममूटी को ‘भ्रमयुगम’ के लिए मिला नेशनल अवॉर्ड

ममूटी की बात करें तो वह भारतीय सिनेमा के सबसे चर्चित और अनुभवी अभिनेताओं में शामिल हैं। उन्हें फिल्म ‘भ्रमयुगम’ में अपने अभिनय के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

‘भ्रमयुगम’ में ममूटी की भूमिका और अभिनय की व्यापक चर्चा हुई थी। फिल्म में उन्होंने एक चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया और उनके प्रदर्शन को दर्शकों के साथ-साथ फिल्म जगत में भी सराहा गया।

राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद गुजरात में आयोजित समारोह के दौरान उनका पारंपरिक स्वागत हुआ, जिसका वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

यानी जिस दृश्य को लेकर विवाद शुरू हुआ, वह मूल रूप से एक सम्मानित अभिनेता के सार्वजनिक स्वागत से जुड़ा हुआ था।


ममूटी को पद्म भूषण से भी किया जा चुका है सम्मानित

ममूटी को भारतीय सिनेमा में उनके लंबे और उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया है।

दशकों लंबे फिल्मी करियर में ममूटी ने मलयालम के अलावा तमिल, तेलुगु और हिंदी सहित अलग-अलग भाषाओं के सिनेमा में भी काम किया है।

उनकी पहचान केवल एक अभिनेता के रूप में नहीं बल्कि मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के प्रमुख सांस्कृतिक चेहरों में भी होती है।

उनके करियर में कई महत्वपूर्ण फिल्में और पुरस्कार शामिल रहे हैं।


चार बार नेशनल अवॉर्ड जीत चुके हैं ममूटी

ममूटी ने अब तक चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते हैं। उनका करियर भारतीय सिनेमा में लंबे समय से सक्रिय रहा है और उन्होंने कई अलग-अलग तरह के किरदार निभाए हैं।

उनकी अभिनय शैली की खासियत यह रही है कि उन्होंने मुख्यधारा की फिल्मों के साथ-साथ गंभीर और प्रयोगात्मक सिनेमा में भी अपनी पहचान बनाई।

‘भ्रमयुगम’ ने उनके करियर में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जोड़ी।

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद उनके गुजरात दौरे और वहां हुए पारंपरिक स्वागत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होना इसी वजह से भी चर्चा में रहा कि ममूटी पहले से ही देशभर में बड़ी लोकप्रियता रखने वाले अभिनेता हैं।


ममूटी के आने वाले प्रोजेक्ट्स पर भी नजर

ममूटी हाल के वर्षों में लगातार अलग-अलग भाषाओं और शैलियों की फिल्मों में सक्रिय रहे हैं।

हाल ही में वह ‘पैट्रियट’ में नजर आए। इसके अलावा आने वाले समय में उन्हें धनुष के साथ तमिल फिल्म ‘ओम – चैप्टर 1: उधिरम’ में देखने की चर्चा है।

इस तरह ममूटी का फिल्मी करियर लगातार सक्रिय है और राष्ट्रीय पुरस्कार तथा पद्म भूषण जैसी उपलब्धियों के बाद उनकी सार्वजनिक गतिविधियां भी अक्सर चर्चा में रहती हैं।


यह पहली बार नहीं जब किसी मुस्लिम अभिनेता के तिलक को लेकर हुआ विवाद

ममूटी से जुड़ा यह विवाद कोई बिल्कुल नया घटनाक्रम नहीं है। इससे पहले भी कई मुस्लिम फिल्म कलाकारों को अलग-अलग मौकों पर माथे पर तिलक लगाने या हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल होने को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा है।

ऐसे मामलों में एक तरफ कलाकारों के समर्थक इसे भारतीय संस्कृति की विविधता और व्यक्तिगत आस्था या सामाजिक सहभागिता का हिस्सा बताते हैं, जबकि दूसरी तरफ कुछ सोशल मीडिया यूजर्स धार्मिक पहचान के आधार पर सवाल उठाते हैं।

बॉलीवुड के शाहरुख खान, सलमान खान, सारा अली खान और आमिर खान भी अलग-अलग मौकों पर ऐसी ऑनलाइन बहसों का सामना कर चुके हैं।


शाहरुख खान की तिलक वाली तस्वीरों पर भी हुआ था विवाद

बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान को भी कई बार माथे पर तिलक लगाए तस्वीरों के कारण सोशल मीडिया ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा है।

विशेष रूप से दिवाली और गणेश चतुर्थी जैसे मौकों पर जब शाहरुख खान ने परिवार के साथ तस्वीरें साझा कीं, तब कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी धार्मिक पहचान को लेकर सवाल उठाए।

2018 और 2019 के दौरान उनके छोटे बेटे अबराम के साथ माथे पर तिलक वाली तस्वीरों पर भी सोशल मीडिया के एक वर्ग ने आपत्ति जताई थी।

हालांकि, इन तस्वीरों को लेकर कई प्रशंसकों ने शाहरुख का समर्थन भी किया और इसे भारत की साझा सांस्कृतिक परंपराओं तथा त्योहारों में परिवार की भागीदारी से जोड़कर देखा।


सलमान खान भी गणेश पूजा को लेकर रह चुके हैं ट्रोल

सलमान खान के परिवार की गणेश पूजा में भागीदारी लंबे समय से सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा रही है।

सलमान खान को भी कई बार गणेश उत्सव और पारिवारिक धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान तिलक लगाए या पूजा में शामिल होते देखा गया है। ऐसे मौकों पर सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ भी धार्मिक पहचान से जुड़े कमेंट सामने आते रहे हैं।

दूसरी तरफ सलमान के प्रशंसकों ने इसे उनके परिवार की परंपरा और त्योहारों में भागीदारी का व्यक्तिगत मामला बताया है।

ममूटी को लेकर शुरू हुई बहस भी इसी तरह के सवालों के इर्द-गिर्द घूम रही है कि क्या किसी कलाकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होने को उसकी धार्मिक पहचान के चश्मे से देखना चाहिए।


सारा अली खान को मंदिर यात्राओं पर भी किया गया ट्रोल

अभिनेत्री सारा अली खान भी कई प्रसिद्ध मंदिरों की यात्रा को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा में रही हैं।

सारा अली खान केदारनाथ, उज्जैन के महाकाल मंदिर और काशी विश्वनाथ जैसे धार्मिक स्थलों पर दर्शन कर चुकी हैं। इन यात्राओं की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा किए जाने के बाद कुछ यूजर्स ने उनकी धार्मिक पहचान को लेकर सवाल उठाए।

विशेष रूप से माथे पर तिलक या चंदन लगाए उनकी तस्वीरों पर कुछ लोगों ने आपत्तिजनक टिप्पणियां भी कीं।

वहीं सारा के प्रशंसकों ने इन यात्राओं को उनकी व्यक्तिगत पसंद और भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में देखा।


आमिर खान भी धार्मिक आयोजनों की तस्वीरों को लेकर निशाने पर रहे

अभिनेता आमिर खान को भी फिल्म से जुड़े कुछ आयोजनों और निजी अवसरों पर पूजा या तिलक से जुड़ी तस्वीरों को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा है।

फिल्म के ऑफिस में पूजा समारोह या गृह प्रवेश जैसे मौकों पर आमिर की मौजूदगी और पूजा में शामिल होने की तस्वीरों पर कुछ लोगों ने उनकी धार्मिक पहचान को लेकर सवाल उठाए।

हालांकि, ऐसी तस्वीरों को लेकर समर्थकों की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि भारत में परिवार, मित्रों और कार्यस्थल से जुड़े सांस्कृतिक अवसरों में अलग-अलग समुदायों के लोग एक-दूसरे की परंपराओं में शामिल होते रहे हैं।


सोशल मीडिया ने सांस्कृतिक स्वागत को बनाया धार्मिक बहस

ममूटी के मामले में भी विवाद का मूल एक ऐसा वीडियो है जिसमें उनका पारंपरिक स्वागत किया जा रहा है।

किसी अतिथि का स्वागत तिलक, आरती, फूलों की माला, शॉल या अन्य स्थानीय परंपराओं के माध्यम से करना भारत के अलग-अलग हिस्सों में आम सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा रहा है।

हालांकि, सोशल मीडिया की प्रकृति ऐसी है कि कुछ सेकेंड के वीडियो या एक तस्वीर को लेकर तत्काल प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। कई बार संदर्भ पीछे छूट जाता है और बहस सीधे पहचान तथा धर्म के सवाल पर पहुंच जाती है।

ममूटी के मामले में भी यही देखने को मिला।


ममूटी के समर्थकों ने कहा—सम्मान को धर्म से न जोड़ें

सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने ममूटी का बचाव करते हुए कहा कि अभिनेता के माथे पर तिलक लगाया जाना एक स्वागत समारोह का हिस्सा था।

समर्थकों के मुताबिक, भारत की सांस्कृतिक विविधता का अर्थ ही यही है कि अलग-अलग समुदायों की परंपराएं सार्वजनिक जीवन में एक-दूसरे से मिलती हैं।

उनका तर्क है कि यदि किसी व्यक्ति का स्वागत उसकी मेजबान संस्कृति की परंपरा के अनुसार किया जाता है, तो इसका सीधा अर्थ धार्मिक परिवर्तन या किसी धार्मिक विश्वास को त्यागना नहीं निकाला जाना चाहिए।


मामला सिर्फ ममूटी का नहीं, सोशल मीडिया पर पहचान की राजनीति का भी सवाल

ममूटी विवाद ने एक व्यापक सवाल फिर सामने ला दिया है—क्या किसी कलाकार की धार्मिक पहचान के आधार पर उसके हर सांस्कृतिक व्यवहार की व्याख्या की जानी चाहिए?

भारत में फिल्मों और मनोरंजन जगत से जुड़े लोग लगातार अलग-अलग भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों के साथ काम करते हैं। फिल्म सेट से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों तक कलाकारों का सामना अनेक परंपराओं से होता है।

ऐसे में किसी कलाकार के माथे पर तिलक लगाए जाने, किसी धार्मिक स्थल की यात्रा करने या किसी सांस्कृतिक उत्सव में शामिल होने को लेकर तुरंत धार्मिक निष्कर्ष निकालना बहस को अनावश्यक रूप से संवेदनशील बना सकता है।

हरिश्री यूसुफ ने भी अपने बयान में इसी व्यापक सोच की बात की है।


‘कलाकारों की सोच व्यापक होती है’—हरिश्री यूसुफ

हरिश्री यूसुफ ने अपने वीडियो में कहा कि कलाकारों की दुनिया सीमित नहीं होती। वे अलग-अलग समुदायों, संस्कृतियों और भाषाओं के लोगों के साथ काम करते हैं।

उनका कहना था कि किसी कलाकार को संकीर्ण धार्मिक सीमाओं में देखने के बजाय उसकी कला और व्यापक सामाजिक अनुभवों को समझना चाहिए।

उन्होंने सोशल मीडिया पर अपशब्दों के इस्तेमाल और धर्म को विवाद में खींचने पर भी सवाल उठाया।

उनके मुताबिक किसी असहमति को व्यक्त करने के लिए भी भाषा और मर्यादा का ध्यान रखना जरूरी है।


धर्म के नाम पर ट्रोलिंग पर फिर उठे सवाल

ममूटी विवाद ने सोशल मीडिया पर धार्मिक ट्रोलिंग की समस्या को भी सामने ला दिया है।

किसी सार्वजनिक व्यक्ति की किसी तस्वीर या वीडियो पर असहमति व्यक्त करना अलग बात है, लेकिन धार्मिक पहचान के आधार पर अपमानजनक टिप्पणी करना अलग विषय है।

फिल्म कलाकारों के मामले में यह समस्या अक्सर और अधिक दिखाई देती है क्योंकि उनकी तस्वीरें और वीडियो तेजी से लाखों लोगों तक पहुंचते हैं।

ऐसे मामलों में किसी भी प्रतिक्रिया से पहले पूरा संदर्भ समझना और किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान के बारे में अनुमान लगाने से बचना जिम्मेदार सोशल मीडिया व्यवहार का हिस्सा हो सकता है।


ममूटी विवाद में फिलहाल दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने

इस पूरे विवाद में सोशल मीडिया पर मोटे तौर पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं दिखाई दे रही हैं।

एक पक्ष का कहना है कि मुस्लिम अभिनेता को माथे पर तिलक नहीं लगवाना चाहिए था और इसे धार्मिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

दूसरा पक्ष इसे केवल पारंपरिक स्वागत मानता है और कहता है कि इसका उद्देश्य अतिथि का सम्मान करना था, न कि किसी धर्म को स्वीकार या अस्वीकार करवाना।

इन दोनों प्रतिक्रियाओं के बीच ममूटी ने स्वयं इस विवाद पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी है या नहीं, यह अलग विषय है। फिलहाल सबसे मुखर प्रतिक्रिया हरिश्री यूसुफ की ओर से सामने आई है।


फिल्मों से बाहर भी ममूटी की लोकप्रियता बरकरार

ममूटी की लोकप्रियता केवल मलयालम सिनेमा तक सीमित नहीं है। लंबे करियर और विभिन्न भाषाओं में काम के कारण उन्हें देशभर में पहचाना जाता है।

उनका राष्ट्रीय पुरस्कार जीतना और पद्म भूषण से सम्मानित होना उनके लंबे फिल्मी योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता के रूप में देखा जाता है।

यही कारण है कि उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों की तस्वीरें और वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होते हैं।

गुजरात में स्वागत का यह वीडियो भी इसी वजह से बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचा और फिर धार्मिक बहस का विषय बन गया।


ममूटी के तिलक विवाद पर हरिश्री यूसुफ का संदेश चर्चा में

फिलहाल Mammootty Tilak Controversy में सबसे ज्यादा चर्चा हरिश्री यूसुफ के उस वीडियो की हो रही है, जिसमें उन्होंने तिलक को भारतीय अतिथि-सत्कार की परंपरा बताते हुए धार्मिक विवाद खड़ा करने वालों पर सवाल उठाया।

उनका संदेश मूल रूप से सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक सह-अस्तित्व और सोशल मीडिया पर जिम्मेदार व्यवहार के आसपास केंद्रित रहा।

ममूटी की ओर से किसी व्यक्ति के धर्म के बारे में कोई सार्वजनिक टिप्पणी किए बिना केवल एक सांस्कृतिक स्वागत को आधार बनाकर विवाद खड़ा होना इस बात की याद दिलाता है कि सोशल मीडिया पर किसी तस्वीर या वीडियो का संदर्भ कितना महत्वपूर्ण होता है।

ममूटी के माथे पर लगाया गया तिलक अब सोशल मीडिया बहस का विषय जरूर बन गया है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह उनके गुजरात दौरे के दौरान हुए पारंपरिक स्वागत का हिस्सा था। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे धार्मिक नजरिए से लेकर आलोचना की, जबकि कई प्रशंसकों ने इसे भारतीय अतिथि-सत्कार और सांस्कृतिक परंपरा बताया। मलयालम अभिनेता और फिल्ममेकर हरिश्री यूसुफ ने भी इसी आधार पर ट्रोलिंग की आलोचना की और कहा कि धर्म का उद्देश्य लोगों को आपस में लड़ाना नहीं बल्कि बेहतर इंसान बनाना होना चाहिए। ममूटी, जो राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्म भूषण जैसी प्रतिष्ठित उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं, फिलहाल इस विवाद से ज्यादा अपनी फिल्मों और लंबे सिनेमाई योगदान के लिए जाने जाते हैं।

 

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