15 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में आया ऐतिहासिक फैसला: महिला और मासूम की हत्या के दोषी को फांसी, 6 लाख रुपये का जुर्माना-Muzaffarnagar News
Muzaffarnagar Double Murder Case में लगभग 15 वर्षों बाद न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए महिला और एक मासूम बच्चे की हत्या के दोषी को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने दोषी पर 6 लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे इस मामले में अदालत के फैसले को पीड़ित पक्ष और आमजन के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
मुजफ्फरनगर की एडीजे/एफटीसी कोर्ट संख्या-3 ने हत्या जैसे जघन्य अपराध में दोष सिद्ध होने के बाद आरोपी रहीश उर्फ जहूर हसन को मृत्युदंड से दंडित किया। अदालत ने अपने निर्णय में उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और अभियोजन पक्ष की प्रभावी पैरवी को महत्वपूर्ण आधार माना।
खेत में मिले थे महिला और बच्चे के शव, 2011 में दर्ज हुआ था मामला
यह मामला वर्ष 2011 का है, जब थाना चरथावल क्षेत्र में एक खेत से महिला और एक बच्चे के शव बरामद होने से इलाके में सनसनी फैल गई थी। घटना की जानकारी मिलने के बाद स्थानीय निवासी राजेन्द्र पुत्र झण्डू पाल ने थाना चरथावल में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में बताया गया था कि अज्ञात व्यक्ति द्वारा महिला और बच्चे की हत्या कर उनके शव खेत में फेंक दिए गए हैं। सूचना मिलते ही पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और हत्या व साक्ष्य मिटाने जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा पंजीकृत किया गया।
घटना ने उस समय पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था और पुलिस के सामने दोहरे हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने की बड़ी चुनौती थी।
विवेचना के दौरान सामने आया आरोपी का नाम
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने विभिन्न साक्ष्यों, परिस्थितिजन्य तथ्यों और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को एकत्र किया। विवेचना आगे बढ़ने पर रहीश उर्फ जहूर हसन पुत्र नत्थू बक्श निवासी ग्राम पराबहाउद्दीनपुर, थाना बिशारतगंज, जनपद बरेली का नाम प्रकाश में आया।
पुलिस ने जांच को गति देते हुए आरोपी को दिसंबर 2011 में गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद उसे न्यायालय में पेश किया गया और आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू की गई।
जांच अधिकारियों ने मामले से जुड़े हर पहलू की गहन पड़ताल करते हुए आवश्यक साक्ष्य एकत्र किए, जिससे अभियोजन पक्ष को अदालत में मजबूत आधार मिला।
गुणवत्तापूर्ण विवेचना और मजबूत साक्ष्यों ने मजबूत किया केस
पुलिस अधिकारियों के अनुसार मामले की विवेचना के दौरान तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को विशेष महत्व दिया गया। जांच टीम ने विभिन्न गवाहों के बयान दर्ज किए और मामले से जुड़े तथ्यों को व्यवस्थित रूप से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की तैयारी की।
विवेचना पूर्ण होने के बाद जनवरी 2012 में आरोपी के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया गया। इसके बाद मामला सुनवाई के विभिन्न चरणों से गुजरता रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चले मुकदमे में साक्ष्यों की निरंतरता बनाए रखना किसी भी जांच एजेंसी के लिए बड़ी चुनौती होती है, लेकिन इस मामले में पुलिस और अभियोजन पक्ष ने समन्वित रूप से कार्य किया।
‘ऑपरेशन कन्विक्शन’ के तहत हुई प्रभावी पैरवी
अपराधियों को सजा दिलाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे अभियान के तहत इस मामले को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया गया। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजय कुमार वर्मा के निर्देशन में पुलिस अधिकारियों ने मामले की नियमित समीक्षा की।
पुलिस अधीक्षक ग्रामीण अक्षय संजय महाडीक, पुलिस अधीक्षक अपराध इन्दु सिद्धार्थ, क्षेत्राधिकारी सदर डॉ. रविशंकर और थाना प्रभारी चरथावल सत्यनारायण दहिया के नेतृत्व में मामले की प्रभावी मॉनिटरिंग की गई।
पुलिस द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि सभी गवाह निर्धारित समय पर न्यायालय में उपस्थित हों और मुकदमे की सुनवाई के दौरान आवश्यक साक्ष्य व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किए जाएं।
अभियोजन पक्ष ने न्यायालय में रखे मजबूत तर्क
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य और तथ्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। एडीजीसी कुलदीप सिंह और कोर्ट पैरोकार हेड कांस्टेबल कुलदीप तोमर ने मामले में प्रभावी पैरवी करते हुए अभियोजन का पक्ष मजबूती से रखा।
अदालत में प्रस्तुत गवाहों के बयान, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और जांच के दौरान जुटाए गए प्रमाणों ने आरोपी के खिलाफ आरोपों को मजबूत आधार प्रदान किया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हत्या जैसे मामलों में प्रभावी अभियोजन और साक्ष्यों की निरंतरता न्यायिक प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाती है।
न्यायालय ने सुनाई मृत्युदंड और 6 लाख रुपये अर्थदंड की सजा
30 मई 2026 को एडीजे/एफटीसी कोर्ट संख्या-3 के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी रहीश उर्फ जहूर हसन को दोषी करार दिया।
अदालत ने आरोपी को मृत्युदंड की सजा सुनाई और साथ ही 6 लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया। यह फैसला लंबे समय तक चले मुकदमे और विस्तृत सुनवाई के बाद आया है।
कानूनी प्रक्रिया के अनुसार मृत्युदंड से जुड़े मामलों में आगे उच्च न्यायालय स्तर पर भी आवश्यक न्यायिक प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं।
फैसले के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली की हुई सराहना
न्यायालय के निर्णय के बाद आमजन के बीच इस मामले को लेकर चर्चा तेज रही। स्थानीय लोगों ने हत्या जैसे गंभीर मामले में दोषी को सजा दिलाने के लिए पुलिस और अभियोजन पक्ष की भूमिका की सराहना की।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अपराधियों को कानून के दायरे में लाकर सजा दिलाना ही पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी है। ऐसे मामलों में प्रभावी विवेचना और मजबूत पैरवी समाज में कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गंभीर अपराधों में दोषियों को सजा मिलने से न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बढ़ता है और अपराधियों के बीच भी कानून का संदेश जाता है।
न्याय व्यवस्था में विश्वास का मजबूत संदेश
यह मामला इस बात का उदाहरण माना जा रहा है कि गंभीर अपराधों में भले ही न्यायिक प्रक्रिया में समय लगे, लेकिन मजबूत साक्ष्य, प्रभावी जांच और सतत कानूनी प्रयासों के जरिए दोषियों को सजा तक पहुंचाया जा सकता है।
महिला और बच्चे की हत्या जैसे जघन्य अपराध में आया यह फैसला समाज को यह संदेश देता है कि कानून की नजर में अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, न्याय की प्रक्रिया जारी रहती है और दोषियों को उनके कृत्यों का परिणाम भुगतना पड़ सकता है।











