वैश्विक

Prime Minister Narendra Modi की धार्मिक कूटनीति: चीन की काट माना जा रहा है भारत -नेपाल समझौते

Prime Minister Narendra Modi  बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर नेपाल के लुम्बिनी पहुंचे। भगवान बुद्ध की जन्मस्थली की यह यात्रा धार्मिक और कूटनीतिक रूप से अहम बताई जा रही है। बौद्ध कूटनीति का असर नेपाल, भूटान, श्रीलंका, म्यांमा और थाईलैंड जैसे देशों पर दिख सकता है

बड़ा असर चीन पर दिखेगा, क्योंकि चीन पहले से ही भारी निवेश के जरिए नेपाल को अपने पाले की कोशिश में लगा हुआ है। अकेले लुम्बिनी में चीन ने 2011 में तीन अरब डालर के निवेश की घोषणा की थी। अब लुम्बिनी से भारत ने नेपाल के साथ कई ऐसे समझौते किए जिन्हें चीन की काट माना जा रहा है।

लुम्बिनी दौरे से भारत-नेपाल के राजनीतिक रिश्ते तो मजबूत होंगे ही, साथ बौद्ध कूटनीति से एशिया को भी एक सूत्र में भी बांधा जा सकता है। दरअसल, दुनिया की बड़ी बौद्ध आबादी चीन, नेपाल भूटान, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों में रहती है। इसीलिए भारत बौद्ध कूटनीति से एशिया को एकता के सूत्र में बांध सकता है।

Prime Minister Narendra Modi ने लुम्बिनी में भारत की पहल पर बनाए जा रहे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर फार बौद्ध कल्चर एंड हेरिटेज की आधारशिला रखी। यहां बौद्ध परंपरा पर अध्ययन होगा।लुम्बिनी वही जगह है, जहां चीन ने तीन अरब डालर से विश्व शांति केंद्र बनाने का करार किया है। लुम्बिनी तक चीन अपनी रेलवे लाइन भी पहुंचाना चाहता है। दूसरी ओर, भारत से करीब 1850 किलोमीटर लगी लंबी सीमा रेखा नेपाल के साथ रोटी-बेटी के संबंधों का अहसास कराती रही है।

Prime Minister Narendra Modi लुम्बिनी की यात्रा पर पहुंचे हैं, ठीक उसी तरह प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के तहत भारत पहुंचे नेपाली प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने बनारस की यात्रा की थी। देउबा के काशी और प्रधानमंत्री मोदी की लुम्बिनी यात्रा से साफ है कि दोनों देशों के नेता धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के जरिए एक-दूसरे के साथ संबंधों को मजबूत करना चाहते हैं।

देउबा के पहले नेपाल में राजनैतिक अस्थिरता के बीच जब केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री बने, तो नेपाल की चीन से नजदीकियां बढ़ने लगीं थी। चीन से बढ़ती नजदीकियों की वजह से नेपाल और भारत के रिश्तों पर भी असर पड़ा। सीमा विवाद से लेकर भगवान राम के खिलाफ बयानबाजी ने भी रिश्तों में तल्खी लाने का काम किया। तब भारत-नेपाल के रिश्तों के बीच चीन सबसे बड़ी चुनौती बना और उसने इसके लिए पूंजी को हथियार बनाया।

शिन्हुआ की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2015-16 से 2020-21 के दौरान लगातार छह साल से नेपाल में सबसे बड़ा विदेशी निवेशक बन गया है। अकले 2020-21 में उसने 188 मिलियन डालर का निवेश किया है। इसके पहले कोविड-19 दौर में भी चीन ने 317 मिलियन डालर के निवेश समझौते किए थे। इसमें सबसे ज्यादा निवेश चीन ने नेपाल के पर्यटन क्षेत्र में किया, जो करीब 125 मिलियन डालर के बराबर है।

चीन ने रेल संपर्क कूटनीति का भी सहारा लिया, जिसमें तीन सौ मिलियन डालर के निवेश से तिब्बत के ल्हासा से नेपाल के काठमांडू तक रेल नेटवर्क स्थापित करना है। यह परियोजना 2025 तक पूरा होने की उम्मीद है। इसके अलावा चारों तरफ से जमीन से घिरा नेपाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भारत पर बहुत ज्यादा निर्भर है। अब इस निर्भरता में सेंध लगाने के लिए चीन, रसुवागढ़ी-केरुंगु और तातोपानी-झांगमु बार्डर प्वांइट को खोलकर चीन के रास्ते कारोबार बढ़ा रहा है।

सके अलावा बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव प्रोजेक्ट भी ऐसा कदम है, जिसके जरिए चीन नेपाल पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि मार्च 2022 चीन के विदेश मंत्री वांग यी की यात्रा पर इसको लेकर नेपाल ने ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखाई थी। और उसने चीनी विदेश मंत्री से साफ कर दिया था कि वह कर्ज नहीं लेगा।

चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच अभी भी भारत, नेपाल का सबसे बड़ा कारोबार सहयोगी है। नेपाल राष्ट्र बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2019-20 में नेपाल अपने कुल निर्यात का करीब 72 फीसद निर्यात भारत को करता है। कुल आयात का 62 फीसद भारत से आयात करता है। जाहिर है नेपाल की भारत पर निर्भरता बहुत ज्यादा है। इस बीच कोरोना के दौर में नेपाल की आर्थिक स्थिति भी डांवाडोल हुई है।

मार्च 2022 में उसका विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर 975 अरब डालर का आ गया। करीब 41 फीसद विदेशी कर्ज है।ऐसे में नेपाल का हाल श्रीलंका जैसा न हो, उसके पहले अपने व्यापार में बढ़ोतरी की जरूरत है। जब कोविड की वजह से थाईलैंड, कोरिया, और अमेरिका जैसे देश नेपाल की मदद करने से कतरा रहे थे, तब भारत ही था जिसने नेपाल की गुहार सुनते ही मदद के लिए आगे आने की घोषणा की।

चीन की लिमी घाटी में सीमा अतिक्रमण की गतिविधियों और नेपाल की राजनीति में सीधे दखल की कोशिशें नेपाल के राजनीतिज्ञों को रास नहीं आ रहीं। 13 जुलाई 2021 को शेरबहादुर देउबा के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस की वापसी के बाद से यह बड़ी वजह रही है संबंधों में सुधार की। भारत ने भी इन बदलते हालात को बारीकी से समझने की कोशिश की है।

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News-Desk

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