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निःशुल्क योग साधना केंद्र में समाधि पाद के सूत्र-१२ अभ्यास

मुजफ्फरनगर। अभ्यास और वैराग्य से ही चित्त की वृत्तियों का निरोध होता है। चित्त का स्वाभाविक बहिर्मुखी प्रवाह वैराग्य से, आत्मोन्मुख आन्तरिक प्रवाह अभ्यास से स्थिर होता है।

वैराग्य से तमोगुणी वृत्ति और अभ्यास से रजोगुणी वृत्ति निरूद्ध होती हैं। उक्त विचार भारतीय योग संस्थान के तत्वावधान में ग्रीन लैंड माडर्न जू०हाई स्कूल मुजफ्फर नगर में संचालित निःशुल्क योग साधना केंद्र में समाधि पाद के सूत्र-१२ अभ्यासवैराग्याभ्याम ’तन्निरोधःतन्निरोधः की व्याख्या करते हुए योगाचार्य सुरेन्द्र पाल सिंह आर्य ने व्यक्त किए।

उन्होंने बताया कि चित्त वृत्ति की एक धारा कल्याण के लिए बहती है और दूसरी धारा पाप के लिए बहती है जो चित्त की वृत्ति मोक्ष की ओर उन्मुख हो जाती हैं और विवेक ख्याति की ओर जाने वाली होती हैं वहीं कल्याण की ओर बहती है

और जो चित्त वृत्ति सांसारिक विषय भोगो की ओर झूक जाती हैं और अज्ञान मार्ग की ओर जाने वाली होती है,वह पाप की ओर बहती है।उन्होंने बताया कि अष्टांग योग के पाँच बहिअर्ंगो की साधना से वैराग्य बढ़ेगा और शेष तीन अंगों से अभ्यास में वृद्धि होगी।

योग शिक्षक यज्ञ दत्त आर्य ने कहा कि अभ्यास और वैराग्य को दृढ़ बनाने हेतु यत्न करना ही अभ्यास है।केंद्र प्रमुख राजसिह पुण्डीर ने कहा कि लम्बे समय तक,निरन्तर अभ्यास और ठीक ठीक सत्कार पूर्वक सेवन किया हुआ अभ्यास ही योग में सिद्धि दिला सकता है। इस अवसर पर अनेक साधक एवं साधिकाओं ने अपने विचार व्यक्त किए।

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