जांच समिति का हिस्सा बनने के लिए किसी सिटिंग जज को नहीं दे सकते-उच्चतम न्यायालय
गैंगस्टर विकास दुबे और उसके उसके साथियों की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की अदालत की निगरानी में जांच की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सोमवार को उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई।
इस मामले पर उत्तर प्रदेश सरकार दोबारा जांच समिति गठित किए जाने पर राजी हो गई है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई सुनवाई में अदालत ने यूपी सरकार को शीर्ष अदालत के एक पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी को जांच समिति में शामिल करने का आदेश दिया।
PILs seeking court-monitored probe in encounter of #VikasDubey &his aides: SC says, there's difference b/w those killed here, & in Hyderabad where rapists didn't have any arms but you (UP) as state govt are responsible to maintain rule of law. It requires arrests,trial&sentencing pic.twitter.com/P28Xi8Ably
— ANI (@ANI) July 20, 2020
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि हम जांच समिति का हिस्सा बनने के लिए शीर्ष अदालत के किसी सिटिंग जज (आसीन न्यायाधीश) को नहीं दे सकते हैं।
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि आपको एक राज्य के रूप में कानून का शासन बरकरार रखना होगा। ऐसा करना आपका कर्तव्य है। सर्वोच्च न्यायालय ने यूपी सरकार को जांच समिति में शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश और एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी को शामिल करने पर विचार करने को कहा।
यूपी सरकार की तरफ से अदलाक में पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामले की जांच के लिए राज्य सरकार ने जांच समिति का गठन किया है।
मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि यह हैदराबाद एनकाउंटर से अलग कैसे है? उनके पास हथियार नहीं थे। लेकिन आपके ऊपर (यूपी) राज्य सरकार के तौर पर कानून का शासन बनाए रखने की जिम्मेदारी है। इसके लिए गिरफ्तारी, ट्रायल और सजा सुनाई जानी चाहिए।
यूपी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया है कि वह विकास दुबे मुठभेड़ मामले की जांच के लिए समिति का पुनर्गठन करने के लिए तैयार है। सरकार ने अदालत को बताया कि वो 22 जुलाई तक पूछताछ पैनल में सुझाए गए परिवर्तनों के संबंध में मसौदा अधिसूचना तैयार करेगी।

