उत्तर प्रदेश

बिना लाइसेंस हथियार बांटने पर अड़े मंत्री Om Prakash Rajbhar, बोले– 18 जनवरी को होगा कार्यक्रम, भारत में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा

Om Prakash Rajbhar arms statement ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर तेज हलचल पैदा कर दी है। योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने बिना लाइसेंस हथियार बांटने से जुड़े अपने पुराने बयान को न सिर्फ दोहराया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि वे अपने इस वादे से पीछे हटने वाले नहीं हैं।


🔴 दोहराया विवादित दावा

राजभर ने कहा कि उन्होंने एक नई “राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना” बनाई है, जिसे उन्होंने संक्षेप में ‘आरएसएस’ बताया। राजभर के मुताबिक, 18 जनवरी को इस संगठन के कमांडरों को बिना लाइसेंस हथियार दिए जाएंगे।

राजभर ने साफ शब्दों में कहा कि वे अपने बयान पर कायम हैं और तय तारीख पर कार्यक्रम होगा। इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।


🔴 “भारत का अन्न खाते हैं तो भारत की भाषा बोलनी पड़ेगी”

अपने बयान के दौरान राजभर ने राष्ट्रवाद और पहचान से जुड़े मुद्दों को भी जोर-शोर से उठाया। उन्होंने कहा कि जो लोग भारत का अन्न खाते हैं, उन्हें भारत की भाषा बोलनी पड़ेगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत में रहना है तो “वंदे मातरम” कहना होगा।

उनके इस बयान को लेकर समर्थकों और आलोचकों के बीच बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे सख्त राष्ट्रवादी रुख बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे समाज को बांटने वाला बयान मान रहे हैं।


🔴 राजभर समुदाय को बताया ‘लड़ाकू कौम’

राजभर ने अपने समाज का जिक्र करते हुए कहा कि राजभर समुदाय ऐतिहासिक रूप से जुझारू रहा है और विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ लड़ता आया है। उन्होंने कहा कि उनका समाज संघर्ष से पीछे हटने वाला नहीं है।

उन्होंने दावा किया कि जरूरत पड़ने पर उनकी बनाई गई ‘राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना’ देश की सीमाओं की रक्षा के लिए भी तैयार है।


🔴 पाकिस्तान और चीन बॉर्डर पर लड़ने का दावा

अपने बयान को और तीखा बनाते हुए राजभर ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी और एके-47 जैसे हथियार दिए गए, तो उनकी सेना पाकिस्तान और चीन की सीमा पर भी लड़ने को तैयार है। उन्होंने यहां तक दावा किया कि उनकी सेना जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान और चीन को “उलट” सकती है।

इस तरह के बयान ऐसे समय में सामने आए हैं, जब सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय रक्षा जैसे मुद्दे बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।


🔴 पहले भी दे चुके हैं ऐसे बयान

यह पहला मौका नहीं है जब ओमप्रकाश राजभर अपने बयानों को लेकर चर्चा में आए हों। इससे पहले भी वे पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों को मारने जैसे बयान दे चुके हैं। हाल ही में निषाद पार्टी के संकल्प दिवस कार्यक्रम में भी उन्होंने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को बिना लाइसेंस हथियार देने की बात कही थी।

उस कार्यक्रम में उन्होंने लोगों को 18 जनवरी को आजमगढ़ पहुंचने का न्योता भी दिया था, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई थी।


🔴 कानूनी पहलू पर उठे सवाल

बिना लाइसेंस हथियार वितरण भारत के कानून के तहत अपराध है। ऐसे में राजभर के इस बयान पर कानूनी कार्रवाई की संभावना को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विपक्षी दलों ने इस बयान को कानून व्यवस्था के लिए खतरा बताते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है।

हालांकि, सत्ताधारी गठबंधन की ओर से इस बयान पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।


🔴 योगी सरकार में मंत्री होने से बढ़ी गंभीरता

राजभर न सिर्फ एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष हैं, बल्कि योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री भी हैं। ऐसे में उनके बयान को एक जिम्मेदार पद से जुड़ा हुआ माना जा रहा है, जिससे इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मंत्री पद पर रहते हुए इस तरह के बयान सरकार की छवि और कानून-व्यवस्था दोनों पर असर डाल सकते हैं।


🔴 विपक्ष का हमला, सियासी घमासान तेज

राजभर के बयान के बाद विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। विपक्ष का कहना है कि यह बयान न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि कानून का खुला उल्लंघन करने की बात करता है।

कुछ नेताओं ने इसे जनता को भड़काने वाला बयान बताया है, जबकि कुछ ने कहा कि इस पर तुरंत जांच और कार्रवाई होनी चाहिए।


🔴 18 जनवरी पर टिकी निगाहें

अब सभी की निगाहें 18 जनवरी पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या यह बयान सिर्फ राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है या वास्तव में कोई कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां भी इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए हैं।


ओमप्रकाश राजभर का यह बयान उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बयानबाज़ी और जिम्मेदारी की सीमा को लेकर बहस छेड़ रहा है। बिना लाइसेंस हथियार बांटने जैसे दावे न सिर्फ कानूनी सवाल खड़े करते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों मोर्चों पर कितना गर्म रहने वाला है।

 

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