अल्ला अलख एकै अहै,दूजा नाही कोय : जगजीवन साहेब, पत्थर और कांस्य की पूजा से मोक्ष प्राप्ति संभव नहीं – कृष्ण कुमार यादव
बाराबंकी-यह जनपद आदि काल से ही अपनी वक्ष स्थली में अपने गौरवशाली अतीत को संजोए हुई है जहां पर अनेकों सूफी संतो व सिद्ध महात्माओं ने संपूर्ण मानव जाति को सांप्रदायिक सद्भावना का संदेश दिया ।
इन सिद्ध महात्माओं में जो रब है वही राम है का संदेश देने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त देवा के सूफी संत हाजी वारिस अली शाह बाबा कस्बा बदोसराय के हजरत मलामत शाह बाबा हेतमापुर के बाबा नरायन दास श्री कोटवा धाम के सतनामी संप्रदाय के संस्थापक समर्थ साई जगजीवन साहेब ने सांप्रदायिक सदभावना की अलख जगाई ।
आज से करीब साडे 3 50 वर्ष पहले जब देश में सबसे क्रूरतम व अत्याचारी औरंगजेब का शासन था लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थी समाज में छुआछूत पाखंड सती प्रथा बाल विवाह मूर्ति पूजा तथा अन्य कर्मकांडों का प्रचलन अपनी चरम सीमा पर था ऐसी विषम परिस्थितियों में ग्राम शारदा की पवित्र माटी में ठाकुर गंगाराम के यहां विक्रमी संवत 1727 माघ मास की शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि को समर्थ साई जगजीवन साहब का अवतार हुआ
आप की माता का नाम केवला देवी था जो चंदेल वंशी क्षत्रिय कहलाते थे 18 वर्ष की अवस्था में आपका विवाह मोतिन देवी के साथ हुआ जिससे आपको चार पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई चार पुत्र स्वामी जी के समय में ही स्वर्गवासी हो गए आप के पुत्रों में जलाली दास उच्च कोटि के संत हुए हैं ।
करीब 38 वर्ष की अवस्था में गोंडा जिले के गुड़सरी नामक ग्राम में विश्वेश्वर पुरी से आपने दीक्षा लिया तत्पश्चात 4 पावा 14 गद्दी 33 महंत 36 सुमिरिनी सहित आपने सतनामी संप्रदाय की नीव डाली
जिसमें सभी वर्ग के लोगों को स्थान मिला जीवन पर्यंत सांप्रदायिक सद्भावना का संदेश देते हुए करीब 90 वर्ष की अवस्था में आप विक्रमी संवत 1817 में ब्रह्मलीन हो गए ।
जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर पूरब रामनगर टिकैतनगर रोड पर कोटवाधाम में समर्थ साई जगजीवन साहेब की तपोभूमि है जहां माघ मास की शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि व कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मेला लगता है
जिसमें देश के कोने-कोने से सतनामी संप्रदाय के भक्त आ करके माथा टेकते हैं लोगों के द्वारा सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं यहां पर अवश्य पूर्ण होती है ऐसा लोगों का विश्वास है । परंतु इस बार कोरोना महामारी के चलते अभी मेले जैसी कोई भी रूपरेखा दिखाई नहीं दे रही है
गृहस्थ जीवन में रहकर ईश्वर की भक्ति किए जाने पर बल देते आप ने कहा –
हर जोतै हरि का भजै , सत्य का दाना खाय ।
जगजीवनदास सांची कहै , सो नर वैकुंठै जाय ।।
एक ईश्वर की भक्ति पर बल देते हुए आपने कहा ‘
अल्ला अलख एकै अहै , दूजा नाही कोय ।
जगजीवन जो दूजा कहै दोज़ख़ परखिए सोय ।।
सभी धर्मों की कौमी एकता पर बल देते हुए आपने सही कहा था –
हाड़ चाम का पीजरा , तामें कियों अचार ।
एक बरन मा सब अहैं , ब्राह्मण तुरक चमान ।।
कलयुग में ब्राह्मणों के द्वारा मांस भक्षण का विरोध करते हुए आप ने संदेश दिया –
पोथी पढि पढि जग मुआ , पंडित भये प्रवीन ।
नेम अचार षट कर्म करि भछै मांसु अरु मीन ।
कलयुग केरे ब्रहाना , सूखे हाड़ चबाहि ।
पै लागत सुख मानहीं राम कहत मरि जाहि ।।
इस प्रकार स्वामी जी का जीवन दर्शन आज मानव जीवन के मध्य में प्रासंगिक बना हुआ है स्वामी जी का विचार था कि पत्थर और कांस्य की पूजा से मोक्ष प्राप्ति संभव नहीं है ईश्वर की रूप में की गई भक्ति उसके मोक्ष का कारण बन सकती है ।

