Allahabad High Court का बड़ा फैसला: शादी के वादे पर सहमति से बने संबंध अपराध नहीं, चार्जशीट और मुकदमा रद्द
Allahabad High Court verdict ने एक बार फिर देशभर में कानूनी और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि शादी के वादे पर सहमति से बने यौन संबंधों को केवल बाद में विवाह न होने के आधार पर आपराधिक कृत्य नहीं ठहराया जा सकता। इस निर्णय के साथ ही कोर्ट ने अलीगढ़ से जुड़े एक चर्चित मामले में दाखिल चार्जशीट, संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया, जिससे यह मामला कानूनी रूप से समाप्त हो गया।
🔴 अलीगढ़ मामले की पृष्ठभूमि और पूरा घटनाक्रम
यह मामला अलीगढ़ के गांधी पार्क थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां जितेंद्र पाल और दो अन्य के खिलाफ एक युवती ने शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़िता का आरोप था कि याची ने उससे शादी का वादा किया और उसी भरोसे पर उसके साथ लंबे समय तक यौन संबंध बनाए। बाद में जब विवाह से इंकार किया गया तो मामला पुलिस तक पहुंचा।
एफआईआर के अनुसार, पीड़िता और याची वर्ष 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे। दोनों के बीच कॉलेज के समय से प्रेम संबंध थे, जो धीरे-धीरे गहरे होते गए। वर्ष 2021 से दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने और यह सिलसिला नवंबर 2024 तक चलता रहा। पीड़िता का कहना था कि यह सब शादी के वादे के आधार पर हुआ, जो बाद में झूठा साबित हुआ।
🔴 बीएनएस की धाराओं में दर्ज हुआ मुकदमा
पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 और 351(2) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी। इसके अलावा, पीड़िता ने याची के भाई और भाभी पर भी आपराधिक धमकी देने के आरोप लगाए थे।
जांच के दौरान जबरन गर्भपात से जुड़े आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी, जिसके चलते उस धारा में चार्जशीट नहीं लगाई गई। इसके बाद मामला कोर्ट पहुंचा और याचियों की ओर से चार्जशीट और पूरी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी गई।
🔴 सिंगल बेंच का फैसला और कानूनी विश्लेषण
जस्टिस अवनीश सक्सेना की सिंगल बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सभी तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का गहन अध्ययन किया। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष वयस्क और शिक्षित हैं तथा उनके बीच संबंध लंबे समय तक चला है।
कोर्ट के अनुसार, यह स्पष्ट है कि दोनों के बीच शुरुआत से ही प्रेम संबंध थे और विवाह का आश्वासन उस समय सही नीयत से किया गया प्रतीत होता है। ऐसा कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि शुरुआत से ही विवाह का वादा धोखाधड़ी या छल की मंशा से किया गया था।
🔴 सहमति और अपराध की कानूनी व्याख्या
Allahabad High Court verdict में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि यदि दो वयस्कों के बीच सहमति से लंबे समय तक शारीरिक संबंध बने हैं, तो केवल इस आधार पर कि बाद में विवाह नहीं हुआ, उसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपराध तभी माना जाएगा, जब यह साबित हो कि शुरुआत से ही विवाह का वादा धोखा देने की नीयत से किया गया था और पीड़िता की सहमति उसी छल के आधार पर प्राप्त की गई हो।
🔴 भाई-भाभी पर लगे आरोपों पर भी टिप्पणी
इस मामले में याची के भाई और भाभी पर लगाए गए आपराधिक धमकी के आरोपों पर भी कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
सिर्फ मौखिक आरोपों के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने उनके खिलाफ भी सभी कानूनी प्रक्रियाओं को समाप्त कर दिया।
🔴 चार्जशीट और संज्ञान आदेश रद्द
कोर्ट ने 30 मार्च 2025 को दाखिल की गई चार्जशीट और 22 मई 2025 को पारित संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही पूरे मुकदमे की कार्यवाही समाप्त कर दी गई। इस फैसले के बाद याचियों को बड़ी कानूनी राहत मिली है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जाएगा, जहां सहमति और धोखाधड़ी के बीच की रेखा को स्पष्ट करना आवश्यक होता है।
🔴 समाज और कानून के बीच संतुलन की कोशिश
Allahabad High Court verdict को लेकर समाज में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सहमति के अधिकार की जीत मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि ऐसे फैसलों से झूठे वादों पर आधारित मामलों में पीड़ितों को न्याय मिलने में कठिनाई हो सकती है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हर मामला अपनी परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाएगा और सिर्फ विवाह न होने को अपराध का आधार नहीं बनाया जा सकता।
🔴 भविष्य के मामलों पर प्रभाव
इस फैसले का प्रभाव आने वाले समय में निचली अदालतों और पुलिस जांच प्रक्रियाओं पर भी पड़ सकता है। अब ऐसे मामलों में यह देखना और जरूरी होगा कि क्या शुरुआत से ही धोखा देने की मंशा थी या संबंध सहमति और विश्वास पर आधारित थे।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे जांच एजेंसियों को अधिक सतर्कता और निष्पक्षता के साथ काम करना होगा, ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिल सके और बेबुनियाद मामलों में लोगों को अनावश्यक रूप से कानूनी प्रक्रिया से न गुजरना पड़े।
🔴 कानूनी दुनिया में गूंजता फैसला
प्रयागराज से आए इस निर्णय की चर्चा अब देशभर के कानूनी गलियारों में हो रही है। कई अधिवक्ताओं और पूर्व न्यायाधीशों ने इसे सहमति, व्यक्तिगत अधिकार और आपराधिक कानून की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला फैसला बताया है।
इस निर्णय के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह संदेश दिया है कि कानून का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि न्याय और संतुलन बनाए रखना भी है।

