39 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 1983 के Farrukhabad दोहरे हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा, जीवित बचे आरोपी रमाकांत बरी
News-Desk
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खंडपीठ ने वर्ष 1983 के फर्रुखाबाद के चर्चित दोहरे हत्याकांड में जीवित बचे एकमात्र आरोपी रमाकांत को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने माना कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्य और गवाहों की विश्वसनीयता गंभीर प्रश्नों के घेरे में है।
39 साल बाद आया हाईकोर्ट का अहम फैसला
यह फैसला न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने सुनाया।
मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा वर्ष 1987 में सुनाए गए निर्णय के खिलाफ अभियुक्तों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील पर अंतिम निर्णय आने में लगभग 39 वर्ष का समय बीत गया।
इस दौरान मामले के तीन अभियुक्तों का निधन हो गया। इसलिए अंतिम सुनवाई केवल जीवित बचे आरोपी रमाकांत की अपील पर हुई।
क्या था 1983 का फर्रुखाबाद दोहरा हत्याकांड?
मामला वर्ष 1983 में फर्रुखाबाद जिले में हुए चर्चित दोहरे हत्याकांड से जुड़ा है।
घटना के बाद पुलिस ने मामले की जांच करते हुए कई लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि अभियुक्त हत्या की घटना में शामिल थे और उपलब्ध साक्ष्य उनके अपराध की पुष्टि करते हैं।
मामला ट्रायल कोर्ट में चला और विस्तृत सुनवाई के बाद निर्णय सुनाया गया।
1987 में ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद
मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद 29 जून 1987 को ट्रायल कोर्ट ने हरिराम सहित चार आरोपियों को हत्या के अपराध में दोषी ठहराया था।
अदालत ने सभी दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
इस फैसले को चुनौती देते हुए अभियुक्तों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और ट्रायल कोर्ट के निर्णय को गलत बताते हुए अपील दाखिल की।
अपील लंबित रहने के दौरान तीन आरोपियों की हो गई मौत
हाईकोर्ट में अपील कई वर्षों तक लंबित रही।
इस लंबे अंतराल के दौरान मामले के तीन अभियुक्तों की मृत्यु हो गई। उनके निधन के बाद उनके विरुद्ध अपील स्वतः समाप्त हो गई।
इसके बाद अदालत ने केवल जीवित बचे आरोपी रमाकांत की अपील पर सुनवाई जारी रखी और उपलब्ध रिकॉर्ड, साक्ष्यों तथा कानूनी पहलुओं का विस्तृत परीक्षण किया।
प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की मौजूदगी पर हाईकोर्ट ने जताया संदेह
फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के दोनों प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की घटनास्थल पर मौजूदगी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं प्रतीत होती।
अदालत ने पाया कि गवाहों के बयानों में ऐसी परिस्थितियां मौजूद हैं, जिनके कारण उनकी उपस्थिति और उनके कथनों पर संदेह उत्पन्न होता है।
कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में केवल गवाहों का बयान पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उनका विश्वसनीय और भरोसेमंद होना भी आवश्यक है।
जांच और साक्ष्यों में मिली गंभीर खामियां
हाईकोर्ट ने मामले की जांच प्रक्रिया और प्रस्तुत साक्ष्यों का भी परीक्षण किया।
अदालत ने माना कि जांच में कई ऐसी कमियां मौजूद हैं, जिनके कारण अभियोजन पक्ष का पूरा मामला कमजोर पड़ जाता है।
कोर्ट के अनुसार, जब उपलब्ध साक्ष्य आरोपी के खिलाफ स्पष्ट और निर्विवाद रूप से अपराध सिद्ध नहीं करते, तब केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि को बनाए नहीं रखा जा सकता।
‘संदेह से परे अपराध सिद्ध करना अभियोजन की जिम्मेदारी’
फैसले में हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराया।
अदालत ने कहा कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष की यह जिम्मेदारी होती है कि वह आरोपी के अपराध को संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) सिद्ध करे।
यदि उपलब्ध साक्ष्यों से उचित संदेह उत्पन्न होता है और अभियोजन उस संदेह को दूर करने में असफल रहता है, तो आरोपी को कानून के अनुसार संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।
दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद्द
मामले में उपलब्ध तथ्यों, गवाहों के बयान और जांच रिकॉर्ड का विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन आरोपों को आवश्यक कानूनी मानकों के अनुरूप साबित नहीं कर पाया।
इसी आधार पर जीवित बचे आरोपी रमाकांत को सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया गया।
आपराधिक मामलों में साक्ष्यों की गुणवत्ता पर अदालत का जोर
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला इस सिद्धांत को फिर से रेखांकित करता है कि किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह या अधूरे साक्ष्यों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
आपराधिक न्याय व्यवस्था में अदालतें साक्ष्यों की गुणवत्ता, गवाहों की विश्वसनीयता और जांच की निष्पक्षता को अत्यधिक महत्व देती हैं। यदि इन पहलुओं में गंभीर कमियां पाई जाती हैं, तो अदालत आरोपी को संदेह का लाभ देने के लिए बाध्य होती है।
39 साल पुराने मामले में न्यायिक प्रक्रिया पर भी रही नजर
यह मामला उन मामलों में शामिल हो गया है जिनमें अंतिम न्यायिक निर्णय आने में कई दशक लग गए।
हालांकि अदालत ने अपने निर्णय में केवल उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर फैसला सुनाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत प्रमाण दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
यह निर्णय एक बार फिर इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि तभी कायम रह सकती है, जब आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से संदेह से परे सिद्ध किया गया हो।

