उत्तर प्रदेश

उद्घाटन के एक महीने में ही Kanpur-Lucknow Expressway बेहाल! जगह-जगह पैचवर्क, दरारें और धंसी सड़कें; 7 किमी हिस्से में चल रहा मरम्मत का काम

Kanpur-Lucknow Expressway को उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण सड़क संपर्क प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। लेकिन उद्घाटन के महज एक महीने बाद ही एक्सप्रेसवे पर बड़े पैमाने पर मरम्मत का काम सामने आने से निर्माण गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। एक पड़ताल के दौरान एक्सप्रेसवे के कई हिस्सों में सड़क की सतह पर पैचवर्क, असमतल हिस्से, नालियों में सुधार का काम, पुल में दरार भरने की प्रक्रिया और सड़क किनारे मिट्टी के बड़े ढेर दिखाई दिए।

सबसे ज्यादा समस्या कानपुर से लखनऊ की दिशा में जाने वाली सड़क पर नजर आई। कई जगह लंबे हिस्से में पैचवर्क किया जा रहा था, जबकि कुछ स्थानों पर सड़क की सतह को काटकर उसे दोबारा तैयार किया जा रहा था। सड़क निर्माण पूरा होने के कुछ ही समय बाद इतने बड़े स्तर पर मरम्मत का काम होना निश्चित रूप से परियोजना की गुणवत्ता, सामग्री, जल निकासी और निर्माण के दौरान निगरानी जैसे पहलुओं पर ध्यान खींचता है।

हालांकि किसी भी सड़क परियोजना में शुरुआती अवधि के दौरान कुछ सुधारात्मक कार्य होना असामान्य नहीं माना जा सकता, लेकिन यदि एक साथ कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर मरम्मत की जरूरत पड़ रही हो तो इसके तकनीकी कारणों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।

उद्घाटन के तुरंत बाद क्यों शुरू हुआ बड़े स्तर पर पैचवर्क?

पड़ताल में लखनऊ से कानपुर की दिशा में लगभग 28वें से 35वें किलोमीटर के बीच करीब साढ़े छह से सात किलोमीटर के हिस्से में सड़क के किनारे और साइड लेन पर मरम्मत का काम चलता मिला।

इस दौरान सड़क के किनारे निर्माण सामग्री का भारी जमाव दिखाई दिया। जगह-जगह गिट्टी, डामर के बड़े भंडार और सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली मशीनें खड़ी थीं।

सवाल यह है कि जिस एक्सप्रेसवे को हाल ही में यातायात के लिए खोला गया है, उसके इतने लंबे हिस्से में एक साथ मरम्मत की जरूरत क्यों पड़ी?

सड़क की सतह पर किया जा रहा पैचवर्क सामान्य रखरखाव का हिस्सा है या निर्माण के दौरान सामने आई किसी तकनीकी कमी को दूर करने का प्रयास, इसका स्पष्ट जवाब विस्तृत तकनीकी जांच के बाद ही सामने आ सकता है।

28 से 35 किलोमीटर के बीच सबसे ज्यादा हलचल

लखनऊ से कानपुर की ओर जाने वाले मार्ग पर 28वें किलोमीटर के आसपास से सड़क की स्थिति में कई जगह बदलाव दिखाई दिया।

35वें किलोमीटर तक पहुंचते-पहुंचते मरम्मत के कई हिस्से नजर आए। कुछ स्थानों पर सड़क के किनारे काम चल रहा था, जबकि कुछ जगह साइड लेन को दुरुस्त किया जा रहा था।

लंबे पैचवर्क और निर्माण मशीनों की मौजूदगी यह बताती है कि यहां केवल मामूली सतही सुधार नहीं बल्कि कई हिस्सों में व्यापक काम किया जा रहा है।

सड़क निर्माण विशेषज्ञों के लिए ऐसे मामलों में यह देखना महत्वपूर्ण होता है कि समस्या केवल ऊपर की डामर परत में है या उसके नीचे की बेस और सब-बेस संरचना में भी कोई कमी है।

37.6 किलोमीटर तक नालियों की कहानी भी सामने आई

लगभग 37.6 किलोमीटर तक पहुंचने पर पांच अलग-अलग स्थानों पर नालियों से संबंधित काम चलता मिला।

नालियां पहले से बनी हुई थीं, लेकिन जल निकासी के लिए कुछ हिस्सों को तोड़ा गया था।

यहीं से एक्सप्रेसवे की जल निकासी व्यवस्था को लेकर एक अहम सवाल सामने आता है। किसी भी हाई-स्पीड सड़क की मजबूती केवल उसकी ऊपरी सतह पर निर्भर नहीं करती। बारिश के पानी की सही निकासी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

अगर पानी सड़क की संरचना में प्रवेश करता है और समय पर बाहर नहीं निकलता तो सड़क के नीचे की मिट्टी और आधार परत कमजोर हो सकती है।

क्रैश बैरियर ने नालियों के रास्ते में खड़ी की मुश्किल

पड़ताल में यह भी सामने आया कि कई स्थानों पर क्रैश बैरियर के कारण नालियों का पानी बाहर निकलने में बाधा आ रही थी।

ऐसी स्थिति में बारिश का पानी सड़क से बाहर जाने के बजाय भीतर की ओर जाने का खतरा पैदा कर सकता है।

इसी समस्या को ठीक करने के लिए कुछ स्थानों पर नालियों को तोड़कर दोबारा काम किया जा रहा था।

सड़क इंजीनियरिंग में जल निकासी को डिजाइन का बुनियादी हिस्सा माना जाता है। इसलिए यदि सड़क और क्रैश बैरियर के बीच जल निकासी का तालमेल ठीक नहीं बैठता तो लंबे समय में इसका असर सड़क की संरचना पर पड़ सकता है।

पुल में भी मिली दरार, 39.5 किलोमीटर पर चल रहा था काम

लगभग 39.5 किलोमीटर पर एक पुल में दरार भरने का काम चलता मिला।

पुल जैसे महत्वपूर्ण ढांचे में दरार दिखाई देने पर उसकी प्रकृति और कारण को समझना जरूरी होता है। हर दरार संरचनात्मक खतरे का संकेत हो, यह जरूरी नहीं है। कई बार सतही दरारें भी हो सकती हैं, जिन्हें समय रहते उपचारित करना आवश्यक होता है।

लेकिन नई परियोजना में इतनी जल्दी किसी पुल पर दरार भरने की जरूरत पड़ना तकनीकी जांच की मांग जरूर करता है।

यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि दरार केवल सतही है या संरचना के किसी महत्वपूर्ण हिस्से से जुड़ी है।

39.8 किलोमीटर पर सड़क की मरम्मत, एक लेन से चला ट्रैफिक

39.8 किलोमीटर के आसपास सड़क की मरम्मत चल रही थी।

काम के दौरान चार लेन में से केवल एक लेन से यातायात संचालित होता दिखाई दिया।

एक्सप्रेसवे जैसी तेज गति वाली सड़क पर निर्माण या मरम्मत के दौरान यातायात प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। अचानक लेन कम होने से वाहन चालकों के लिए जोखिम बढ़ सकता है, खासकर तब जब सड़क पर वाहन अपेक्षाकृत अधिक गति से चलते हों।

इसलिए ऐसे स्थानों पर पर्याप्त चेतावनी संकेत, बैरिकेडिंग, रिफ्लेक्टर और गति नियंत्रण की व्यवस्था जरूरी होती है।

41.4 किलोमीटर पर मिट्टी के बड़े ढेर

लगभग 41.4 किलोमीटर के आसपास सड़क किनारे मिट्टी के भारी ढेर दिखाई दिए।

पूरे एक्सप्रेसवे पर दोनों ओर ऐसे करीब 42 स्थान देखे जाने की बात सामने आई।

सड़क किनारे बड़ी मात्रा में मिट्टी का जमा होना अपने आप में हमेशा निर्माण दोष साबित नहीं करता। निर्माण और सुधार कार्यों के दौरान मिट्टी का अस्थायी भंडारण सामान्य प्रक्रिया हो सकता है।

लेकिन यदि यही मिट्टी सड़क के किनारे ढलानों, जल निकासी या संरचनात्मक हिस्सों को प्रभावित कर रही हो तो समस्या गंभीर हो सकती है।

47 किलोमीटर तक तीन बड़े पैचवर्क

लगभग 47 किलोमीटर तक तीन बड़े पैचवर्क भी दिखाई दिए।

पैचवर्क सड़क की खराब सतह को सुधारने का सामान्य तरीका है, लेकिन नई बनी सड़क पर बड़े पैचवर्क की आवश्यकता क्यों पड़ी, यह सवाल स्वाभाविक है।

यदि सड़क की ऊपरी परत में स्थानीय स्तर पर खराबी हुई है तो उसकी मरम्मत अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। लेकिन यदि खराबी बार-बार उसी क्षेत्र में दिखाई देती है तो उसके मूल कारण की जांच जरूरी होती है।

60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर भी असमतल सड़क

पड़ताल के दौरान लगभग 60 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर एक्सप्रेसवे के सात स्थानों पर सड़क असमतल महसूस हुई।

एक्सप्रेसवे की खासियत ही यह होती है कि वाहन चालक अपेक्षाकृत अधिक गति पर भी स्थिर और सुरक्षित तरीके से यात्रा कर सके।

सड़क की सतह में अचानक ऊंच-नीच या असमतलपन वाहन के संतुलन को प्रभावित कर सकता है। खासकर दोपहिया वाहन, छोटे वाहन और तेज गति से चलने वाले वाहनों के लिए सड़क की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है।

सिर्फ डामर नहीं, नीचे की संरचना भी होती है अहम

सड़क की मजबूती को केवल उसकी काली डामर सतह देखकर तय नहीं किया जा सकता।

एक आधुनिक एक्सप्रेसवे कई परतों से मिलकर बनता है। नीचे की प्राकृतिक मिट्टी, उसके ऊपर तैयार की गई सबग्रेड, फिर सब-बेस, बेस और अंत में बिटुमिनस सतह—हर परत की गुणवत्ता सड़क के प्रदर्शन को प्रभावित करती है।

अगर नीचे की परतों में पर्याप्त मजबूती नहीं है या पानी उनमें प्रवेश कर जाता है तो ऊपर की सड़क में दरार, धंसाव, गड्ढे और पैचवर्क जैसी समस्याएं समय के साथ दिखाई दे सकती हैं।

इसीलिए शुरुआती दौर में सामने आई सड़क की खामियों के मूल कारण की तकनीकी जांच महज ऊपरी मरम्मत से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।

किनारे की पट्टियां भी बन सकती हैं अहम कमजोरी

एक्सप्रेसवे के दोनों ओर सड़क के किनारे पट्टियां बनाई जाती हैं। इनका काम केवल सड़क का किनारा सुंदर दिखाना नहीं है।

ये सड़क की संरचना, पानी के बहाव और किनारे की स्थिरता से भी जुड़ी होती हैं।

पड़ताल में कई स्थानों पर इन पट्टियों के आसपास लंबी घास दिखाई दी। कुछ जगहों पर घास की लंबाई करीब दो फीट तक बताई गई।

घास का होना अकेले किसी निर्माण दोष का प्रमाण नहीं है, लेकिन यदि इसके साथ पानी जमा होने, मिट्टी के कटाव या जल निकासी की समस्या भी मौजूद हो तो सड़क के किनारे की संरचना की निगरानी जरूरी हो जाती है।

पानी सड़क के लिए कितना बड़ा खतरा है?

सड़क निर्माण विशेषज्ञ लंबे समय से जल निकासी को किसी भी हाईवे या एक्सप्रेसवे की उम्र के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

बारिश का पानी यदि तेजी से सड़क से बाहर निकल जाए तो नुकसान सीमित रहता है। लेकिन पानी सड़क की परतों के भीतर पहुंच जाए तो समस्या गंभीर हो सकती है।

मिट्टी में पानी का प्रवेश उसकी मजबूती को प्रभावित कर सकता है। इसके बाद ऊपर की सड़क पर दबाव पड़ता है और डामर की सतह में दरारें या असमतलपन दिखाई दे सकता है।

यही वजह है कि नालियों और सड़क के किनारे की संरचना को एक्सप्रेसवे की कुल गुणवत्ता से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

मिट्टी के ढलान कई जगह कटे हुए मिले

एक्सप्रेसवे के कुछ हिस्सों में मिट्टी के ढलान भी कटे हुए दिखाई दिए।

मिट्टी के कटाव को सामान्य तौर पर बारिश, पानी के बहाव, अपर्याप्त ढलान संरक्षण या निर्माण के बाद पर्याप्त स्थिरीकरण न होने जैसी परिस्थितियों से जोड़ा जा सकता है।

यदि सड़क के किनारे की मिट्टी लगातार बहती रहे तो वहां दोबारा मिट्टी भरने की जरूरत पड़ सकती है।

इसके अलावा सड़क की किनारी संरचना पर भी दबाव पड़ सकता है।

सड़क किनारे कटाव को नजरअंदाज करना पड़ सकता है महंगा

एक्सप्रेसवे की मुख्य सड़क भले ही मजबूत दिखाई दे, लेकिन उसके किनारे का हिस्सा कमजोर होने पर धीरे-धीरे समस्या मुख्य कैरिजवे तक पहुंच सकती है।

मिट्टी का कटाव बढ़ने पर सड़क के किनारे खाली जगह बन सकती है। पानी उसी रास्ते से नीचे जा सकता है और सड़क की नींव के आसपास की मिट्टी को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए शुरुआती चरण में दिखाई देने वाले कटाव और मिट्टी के ढलानों की मरम्मत भविष्य के बड़े नुकसान को रोकने के लिए जरूरी हो सकती है।

एक्सप्रेसवे पर सुरक्षा और निर्माण गुणवत्ता दोनों सवालों में

यह मामला केवल निर्माण गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। मरम्मत के दौरान यातायात प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

जहां चार लेन में से केवल एक लेन पर यातायात चल रहा हो, वहां वाहन चालकों को पहले से जानकारी मिलना जरूरी है।

तेज गति से आने वाले वाहनों को अचानक लेन बदलनी पड़े तो दुर्घटना की संभावना बढ़ सकती है।

इसलिए मरम्मत के प्रत्येक स्थान पर स्पष्ट साइनेज, बैरिकेड, रिफ्लेक्टिव मार्किंग और पर्याप्त चेतावनी व्यवस्था की जरूरत होती है।

नई सड़क पर मरम्मत से उठता है निगरानी का सवाल

किसी भी बड़ी सड़क परियोजना में निर्माण पूरा होने के बाद गुणवत्ता की जांच और दोष सुधार की व्यवस्था रहती है।

अगर उद्घाटन के कुछ ही समय बाद कई किलोमीटर में पैचवर्क और अलग-अलग स्थानों पर सुधारात्मक कार्य की जरूरत पड़ती है तो निर्माण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण और अंतिम निरीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि किसी परियोजना की वास्तविक तकनीकी गुणवत्ता का निर्णय केवल दृश्य निरीक्षण से नहीं किया जा सकता। इसके लिए सड़क की परतों, सामग्री, मोटाई, घनत्व, जल निकासी और संरचनात्मक परीक्षणों की विस्तृत जांच आवश्यक होती है।

कौन जिम्मेदार, यह जांच के बाद ही साफ होगा

सड़क में सामने आई किसी भी कमी के लिए तुरंत किसी एक एजेंसी, ठेकेदार या विभाग को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

निर्माण में ठेकेदार के साथ-साथ डिजाइन, सामग्री, साइट सुपरविजन, गुणवत्ता परीक्षण और अंतिम निरीक्षण जैसे कई स्तर शामिल होते हैं।

यदि तकनीकी जांच में किसी स्तर पर कमी मिलती है तो उसके आधार पर जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

यही वजह है कि सड़क की स्थिति पर सवाल उठने के बाद पारदर्शी तकनीकी ऑडिट महत्वपूर्ण हो जाता है।

यात्रियों के लिए फिलहाल सबसे जरूरी सावधानी

जब तक विभिन्न हिस्सों में मरम्मत का काम जारी है, वाहन चालकों को निर्माण क्षेत्रों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

जहां लेन बदली गई हो वहां अचानक ओवरटेक करने से बचना, निर्धारित गति का पालन करना और संकेतों को ध्यान से देखना जरूरी है।

मरम्मत के दौरान सड़क की सामान्य स्थिति बदल सकती है, इसलिए वाहन चालकों को विशेष रूप से रात के समय अधिक सतर्क रहना चाहिए।

क्या बारिश के बाद बढ़ सकती है समस्या?

एक्सप्रेसवे की जल निकासी व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा बारिश के दौरान होती है।

अगर नालियों में पानी रुकता है या क्रैश बैरियर और सड़क किनारे की संरचना के कारण पानी बाहर नहीं निकलता, तो बारिश के बाद सड़क की स्थिति प्रभावित हो सकती है।

इसीलिए नालियों की मरम्मत और जल निकासी के रास्तों को दुरुस्त करना केवल सौंदर्य या छोटे रखरखाव का काम नहीं माना जाना चाहिए।

एक्सप्रेसवे की लंबी उम्र के लिए जरूरी है मूल समस्या का समाधान

पैचवर्क सड़क की सतह को तत्काल ठीक कर सकता है, लेकिन अगर मूल समस्या नीचे की परत, जल निकासी या मिट्टी की मजबूती से जुड़ी है तो केवल ऊपर से नया डामर डालने से समस्या दोबारा लौट सकती है।

इसलिए जहां सड़क को काटकर दोबारा बनाया जा रहा है, वहां यह जांचना जरूरी है कि ऐसा करने की वास्तविक वजह क्या है।

अगर समस्या मूल निर्माण से जुड़ी है तो स्थायी समाधान उसी स्तर पर करना होगा।

कानपुर और लखनऊ के बीच तेज कनेक्टिविटी की बड़ी उम्मीद

कानपुर और लखनऊ उत्तर प्रदेश के दो महत्वपूर्ण शहर हैं। इनके बीच बेहतर सड़क संपर्क का सीधा फायदा यात्रियों, कारोबारियों, उद्योगों और रोजाना आने-जाने वाले लोगों को मिल सकता है।

एक्सप्रेसवे से यात्रा समय और यातायात दबाव कम करने की उम्मीद की जाती है।

इसी कारण इस तरह की परियोजना की गुणवत्ता केवल एक सड़क के रूप में नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के परिवहन ढांचे के हिस्से के रूप में देखी जानी चाहिए।

लोगों की उम्मीद सिर्फ चमकती सड़क नहीं, टिकाऊ सड़क से है

नई सड़क का उद्घाटन होना किसी परियोजना की अंतिम उपलब्धि नहीं है। असली परीक्षा तब होती है जब वह सड़क लगातार भारी यातायात, बारिश, गर्मी और बदलते मौसम का सामना करती है।

लोगों की अपेक्षा ऐसी सड़क से होती है जो वर्षों तक सुरक्षित और सुचारु रहे।

अगर शुरुआती चरण में कमियां सामने आती हैं तो उन्हें छिपाने के बजाय तकनीकी रूप से पहचानना और स्थायी समाधान करना ही बेहतर रास्ता है।

Kanpur-Lucknow Expressway की गुणवत्ता पर अब तकनीकी जांच की जरूरत

उद्घाटन के करीब एक महीने बाद कई स्थानों पर मरम्मत, लंबे पैचवर्क, पुल में दरार भरने का काम, असमतल सड़क, नालियों में सुधार और सड़क किनारे मिट्टी के कटाव जैसी तस्वीरें सामने आने के बाद सबसे महत्वपूर्ण जरूरत व्यापक तकनीकी मूल्यांकन की है।

यह पता लगाना जरूरी है कि सामने आई समस्याएं सामान्य प्रारंभिक रखरखाव का हिस्सा हैं या निर्माण के दौरान किसी गंभीर कमी का परिणाम।

एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता पर अंतिम राय केवल देखकर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग परीक्षणों के आधार पर ही बनाई जानी चाहिए।

जनता के पैसे और सुरक्षा दोनों का सवाल

इतनी बड़ी सड़क परियोजना में सार्वजनिक धन का निवेश होता है। इसलिए गुणवत्ता में किसी भी तरह की कमी केवल निर्माण एजेंसी का तकनीकी मामला नहीं रह जाती।

यह यात्रियों की सुरक्षा और सार्वजनिक संसाधनों के सही इस्तेमाल से भी जुड़ जाता है।

यदि शुरुआती मरम्मत किसी मामूली सतही समस्या के कारण है तो उसे समय रहते ठीक करना अच्छी बात है। लेकिन अगर बार-बार वही समस्या लौटती है तो उसके मूल कारण तक पहुंचना जरूरी होगा।

अब देखना होगा मरम्मत से समस्या स्थायी रूप से दूर होती है या नहीं

फिलहाल एक्सप्रेसवे के विभिन्न हिस्सों में सुधार और मरम्मत का काम चल रहा है।

अगली बड़ी परीक्षा यह होगी कि इन मरम्मतों के बाद सड़क की स्थिति कैसी रहती है और बारिश तथा भारी यातायात के बाद क्या दोबारा वही समस्याएं सामने आती हैं।

यदि मरम्मत के बाद सड़क की सतह, नालियों और किनारे की संरचना लंबे समय तक स्थिर रहती है तो यह माना जा सकता है कि सुधारात्मक कार्रवाई प्रभावी रही।

लेकिन अगर कुछ ही समय में पैचवर्क दोबारा उखड़ने लगे, पानी जमा होने लगे या सड़क असमतल होने लगे तो मामले की गहराई से जांच जरूरी होगी।

Kanpur-Lucknow Expressway पर उद्घाटन के करीब एक महीने बाद कई स्थानों पर मरम्मत और पैचवर्क का काम सामने आने से निर्माण गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे हैं। लखनऊ से कानपुर की दिशा में करीब 28वें से 35वें किलोमीटर तक साढ़े छह से सात किलोमीटर के हिस्से में सड़क किनारे और साइड लेन पर काम चलता मिला। करीब 37.6 किलोमीटर तक कई स्थानों पर नालियों में सुधार किया जा रहा था, जबकि 39.5 किलोमीटर के आसपास पुल में दरार भरने का काम और 39.8 किलोमीटर पर सड़क की मरम्मत मिली। कुछ हिस्सों में चार लेन में से केवल एक लेन से यातायात संचालित हो रहा था। करीब 41.4 किलोमीटर पर सड़क किनारे मिट्टी के बड़े ढेर और पूरे मार्ग पर कई स्थानों पर मिट्टी के कटाव की स्थिति भी देखी गई। 47 किलोमीटर तक तीन बड़े पैचवर्क और करीब 60 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर सात स्थानों पर असमतल सड़क महसूस होने की बात सामने आई। सड़क के किनारे जल निकासी, क्रैश बैरियर और नालियों के बीच तालमेल भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर सामने आया है। हालांकि इन खामियों के वास्तविक कारण और जिम्मेदारी का निर्धारण केवल विस्तृत तकनीकी जांच के बाद ही किया जा सकता है। एक्सप्रेसवे जैसी महत्वपूर्ण परियोजना में स्थायी मरम्मत, प्रभावी जल निकासी और निर्माण गुणवत्ता की पारदर्शी निगरानी यात्रियों की सुरक्षा तथा सड़क की दीर्घकालिक मजबूती के लिए बेहद जरूरी है।

 

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