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Strait of Hormuz ने खाड़ी का तेल कारोबार हिला दिया: सऊदी-UAE ने बदले रास्ते, रेड सी से एशिया तक नए ठिकाने; ईरान के बाद तेल की दुनिया में बड़ा बदलाव

Strait of Hormuz Crisis ने खाड़ी देशों के दशकों पुराने तेल कारोबार के मॉडल को हिलाकर रख दिया है। कुछ महीने पहले तक सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देशों के लिए कच्चे तेल को वैश्विक बाजार तक पहुंचाना अपेक्षाकृत सीधा काम था। तेल जमीन से निकालिए, उसे पाइपलाइन या टर्मिनल तक पहुंचाइए, फिर दुनिया के सबसे बड़े खरीदारों तक भेजने के लिए होर्मुज स्ट्रेट पार कर लीजिए।

लेकिन ईरान के साथ सैन्य संघर्ष के बाद परिस्थितियां बदल गई हैं। समुद्री मार्गों पर बढ़ता खतरा, मिसाइल और ड्रोन हमलों की आशंका, बारूदी सुरंगों का जोखिम, सैन्य गतिविधियां और बढ़ती बीमा लागत ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यही वजह है कि अब खाड़ी के तेल उत्पादक देश केवल तेल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि तेल को सुरक्षित तरीके से बाजार तक पहुंचाने के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार करने पर भी जोर दे रहे हैं।

नई पाइपलाइनें बिछाई जा रही हैं। पुरानी पाइपलाइनों की क्षमता बढ़ाई जा रही है। रेड सी के रास्ते तेल भेजने की संभावनाओं पर काम हो रहा है। इसके अलावा भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े एशियाई बाजारों में अतिरिक्त तेल भंडारण की रणनीति भी अपनाई जा रही है।

यानी कहानी सिर्फ तेल की नहीं है। यह अब ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, युद्ध के जोखिम और वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाली सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने की कहानी बन चुकी है।

होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है। भौगोलिक रूप से यह छोटा है, लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है।

सऊदी अरब, UAE, कुवैत, इराक और ईरान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के समुद्री निर्यात के लिए यह मार्ग लंबे समय से बेहद महत्वपूर्ण रहा है।

दुनिया के बड़े तेल खरीदारों में चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इन्हीं एशियाई बाजारों की ओर जाता है।

इसलिए होर्मुज में किसी भी तरह की गंभीर बाधा का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहता। इसका असर तेल की कीमतों, शिपिंग लागत, बीमा, रिफाइनरी लागत और अंततः दुनिया भर के उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।

28 फरवरी के बाद बदली तस्वीर

दिए गए घटनाक्रम के अनुसार, 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर हमलों के बाद होर्मुज स्ट्रेट से तेल की ढुलाई लगातार प्रभावित हुई।

समुद्री बारूदी सुरंगों, मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे तथा अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव की स्थिति ने जहाजरानी कंपनियों और बीमा कंपनियों की चिंता बढ़ा दी।

इसके परिणामस्वरूप होर्मुज से गुजरने वाले कच्चे तेल की दैनिक मात्रा करीब 2 करोड़ बैरल से घटकर 37 लाख बैरल रह गई।

अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर केवल तेल निर्यातकों पर नहीं बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

खाड़ी देशों ने समझ लिया—एक ही रास्ते पर निर्भर रहना जोखिम भरा है

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक है।

खाड़ी के तेल उत्पादक देशों ने महसूस किया है कि अगर उनका अधिकांश निर्यात एक ही समुद्री मार्ग पर निर्भर रहेगा तो किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति में पूरी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।

इसलिए अब रणनीति बदल रही है।

लक्ष्य यह नहीं है कि होर्मुज को पूरी तरह छोड़ दिया जाए। बल्कि कोशिश यह है कि अगर होर्मुज में संकट पैदा हो तो तेल के पास दूसरा रास्ता पहले से मौजूद हो।

यही कारण है कि UAE, सऊदी अरब और कुवैत अपनी पाइपलाइन क्षमता तथा वैकल्पिक बंदरगाहों को लेकर तेजी से काम कर रहे हैं।

UAE बना इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण

इस बदलाव की सबसे स्पष्ट तस्वीर संयुक्त अरब अमीरात में दिखाई दे रही है।

UAE का व्यापार समुद्री मार्गों और वैश्विक लॉजिस्टिक्स से गहराई से जुड़ा है। इसलिए किसी भी प्रमुख समुद्री मार्ग में संकट उसके लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों तरह का जोखिम पैदा करता है।

इसी जोखिम को कम करने के लिए UAE अब अपने तेल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा ऐसे रास्ते से भेजने की तैयारी कर रहा है, जिसे होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की जरूरत न हो।

इस योजना के केंद्र में फुजैरा है।

फुजैरा क्यों बन रहा है इतना महत्वपूर्ण?

ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित फुजैरा UAE के लिए रणनीतिक महत्व रखता है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां से तेल टैंकरों को फारस की खाड़ी के भीतर से होकर होर्मुज स्ट्रेट पार करने की आवश्यकता नहीं होती।

यही कारण है कि फुजैरा में तेल भंडारण, पाइपलाइन और निर्यात से जुड़ी सुविधाओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

अब यहां नई पाइपलाइन और दूसरी सुविधाओं को विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

अबू धाबी से फुजैरा तक पहुंचेगा तेल

UAE की नई रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसी पाइपलाइन तैयार करना है जो अबू धाबी के तेल क्षेत्रों को सीधे फुजैरा से जोड़ सके।

इसका मतलब यह होगा कि अबू धाबी के तेल को फारस की खाड़ी के भीतर से होकर होर्मुज स्ट्रेट तक ले जाने के बजाय सीधे UAE के पूर्वी तट तक पहुंचाया जा सकेगा।

वहां से टैंकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों की ओर रवाना हो सकते हैं।

इससे UAE के लिए समुद्री निर्यात में एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता तैयार होगा।

UAE की बायपास क्षमता 36 लाख बैरल प्रतिदिन तक

प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद UAE की होर्मुज स्ट्रेट को बायपास करके तेल निर्यात करने की क्षमता बढ़कर लगभग 36 लाख बैरल प्रतिदिन होने की बात सामने आई है।

इस क्षमता का रणनीतिक महत्व काफी बड़ा है।

इससे अबू धाबी के लगभग पूरे ऑनशोर तेल उत्पादन को होर्मुज में प्रवेश किए बिना अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने की क्षमता विकसित हो सकती है।

यह UAE को क्षेत्रीय संकट के दौरान दूसरे खाड़ी देशों की तुलना में अतिरिक्त लचीलापन दे सकता है।

ऑनशोर और ऑफशोर तेल में अंतर क्या है?

ऑनशोर तेल का मतलब जमीन पर मौजूद तेल क्षेत्रों से निकाला गया कच्चा तेल है।

इसके विपरीत ऑफशोर तेल समुद्र में स्थित तेल क्षेत्रों और समुद्री कुओं से निकाला जाता है।

UAE के तेल उत्पादन और निर्यात ढांचे में ऑनशोर उत्पादन का बड़ा महत्व है। इसलिए उसे सीधे फुजैरा तक पहुंचाने वाला वैकल्पिक नेटवर्क रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन जाता है।

तेल के बाद अब गैस की सुरक्षा पर UAE का फोकस

UAE की रणनीति सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है।

सरकारी ऊर्जा कंपनी ADNOC ने प्राकृतिक गैस कारोबार के विस्तार के लिए 8.2 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है।

इसके साथ पूर्वी तट पर नया LNG निर्यात टर्मिनल विकसित करने की योजना भी सामने आई है।

इसका उद्देश्य भविष्य में गैस निर्यात को भी समुद्री जोखिमों से कम प्रभावित करना है।

यानी UAE एक साथ तेल और गैस दोनों की सप्लाई चेन में विकल्प तैयार कर रहा है।

सऊदी अरब ने रेड सी का रास्ता चुना

अगर UAE की रणनीति फुजैरा के जरिए होर्मुज को बायपास करने की है तो सऊदी अरब का मॉडल अलग है।

सऊदी अरब अपनी पुरानी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का इस्तेमाल बढ़ा रहा है।

यह लगभग 1,201 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन देश के पूर्वी तेल क्षेत्रों को रेड सी के किनारे स्थित यानबू पोर्ट से जोड़ती है।

इस पाइपलाइन का निर्माण मूल रूप से 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान किया गया था।

तब भी उद्देश्य यही था कि सऊदी अरब को फारस की खाड़ी के समुद्री रास्तों पर अत्यधिक निर्भर न रहना पड़े।

आज वही पुराना ढांचा एक बार फिर बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

70 लाख बैरल रोजाना रेड सी के रास्ते

उपलब्ध जानकारी के अनुसार सऊदी अरब अब इस पाइपलाइन के जरिए हर दिन करीब 70 लाख बैरल कच्चा तेल रेड सी की दिशा में भेज रहा है।

इसके अलावा पाइपलाइन की क्षमता में करीब 10 से 20 लाख बैरल प्रतिदिन और बढ़ोतरी करने की तैयारी है।

अगर यह क्षमता बढ़ती है तो सऊदी अरब के पास होर्मुज संकट के दौरान तेल निर्यात को संभालने का अतिरिक्त विकल्प होगा।

सऊदी की दूसरी रणनीति—रिफाइंड उत्पादों के लिए नई पाइपलाइन

सऊदी अरब केवल कच्चे तेल के लिए ही वैकल्पिक नेटवर्क नहीं बना रहा।

रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के लिए भी समानांतर पाइपलाइन विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है।

इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों का वैश्विक व्यापार भी समुद्री परिवहन पर निर्भर करता है।

कच्चे तेल की सप्लाई सुरक्षित होने के बावजूद अगर रिफाइंड उत्पादों का नेटवर्क कमजोर हो तो ऊर्जा सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

कुवैत के सामने सबसे बड़ी चुनौती

कुवैत की भौगोलिक स्थिति उसे होर्मुज पर विशेष रूप से निर्भर बनाती है।

इसीलिए कुवैत अब सऊदी अरब और दूसरे अरब देशों के साथ वैकल्पिक पाइपलाइन विकल्पों पर चर्चा कर रहा है।

इनमें ऐसे रास्ते शामिल हैं जो कुवैत के तेल क्षेत्रों को रेड सी या ओमान के बंदरगाहों से जोड़ सकें।

ऐसी परियोजनाएं आसान नहीं होतीं। इनमें अरबों डॉलर का निवेश, लंबा निर्माण समय और कई देशों के बीच राजनीतिक समझौते की जरूरत पड़ सकती है।

लेकिन मौजूदा संकट ने इन विकल्पों को पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

इराक भी पुराने रास्तों को फिर जिंदा कर रहा

इराक के लिए भी स्थिति चुनौतीपूर्ण है।

देश ने लंबे समय से रुकी हुई इराक-जॉर्डन पाइपलाइन परियोजना को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम तेज किए हैं।

इस योजना के तहत रोजाना करीब 10 लाख बैरल तक तेल को रेड सी के अकाबा बंदरगाह तक पहुंचाने की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है।

इसके अलावा इराक किरकुक से सीरिया के भूमध्यसागरीय तट तक जाने वाली क्षतिग्रस्त पाइपलाइन की मरम्मत भी तेज कर रहा है।

इससे इराक के पास तेल निर्यात के लिए समुद्री मार्गों का एक और विकल्प तैयार हो सकता है।

एशिया में तेल जमा करने की नई रणनीति

खाड़ी देशों की योजना सिर्फ पाइपलाइन और बंदरगाह तक सीमित नहीं है।

एक दूसरी रणनीति भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रही है—तेल को पहले से ही उपभोक्ता देशों के पास जमा रखना।

भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े एशियाई तेल आयातक देशों में अतिरिक्त स्टोरेज तैयार करने की दिशा में काम हो रहा है।

इसका सीधा फायदा यह होगा कि अगर किसी दिन होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद हो जाता है तो बाजार के पास तत्काल इस्तेमाल के लिए कुछ तेल पहले से उपलब्ध होगा।

तेल स्टोरेज क्यों बन सकता है सबसे बड़ा सुरक्षा कवच?

मान लीजिए समुद्री मार्ग अचानक बंद हो गया।

अगर पूरा तेल उत्पादन उसी समय जहाजों में लोड होना है और रास्ता बंद है तो बाजार में सप्लाई तुरंत प्रभावित होगी।

लेकिन अगर तेल पहले से ही उपभोक्ता देशों के स्टोरेज में मौजूद है तो कुछ समय तक बाजार को झटका कम किया जा सकता है।

इसीलिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और व्यावसायिक स्टोरेज दोनों की भूमिका बढ़ रही है।

भारत के लिए भी यह बदलाव महत्वपूर्ण

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और खाड़ी क्षेत्र उसका प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है।

इसलिए खाड़ी देशों द्वारा एशिया के करीब तेल भंडारण बढ़ाने की रणनीति भारत के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

भारत में रणनीतिक तेल भंडार पहले से मौजूद हैं। इसके अलावा रिफाइनरियों और निजी कंपनियों के पास भी कच्चे तेल का भंडारण होता है।

यदि खाड़ी के निर्माता और एशियाई खरीदार मिलकर सप्लाई चेन में अतिरिक्त बफर बनाते हैं तो समुद्री संकट के दौरान बाजार को कुछ राहत मिल सकती है।

लेकिन होर्मुज का विकल्प भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं

यहां कहानी का सबसे बड़ा पेंच है।

होर्मुज से बचने के लिए अगर सऊदी अरब रेड सी का रास्ता अपनाता है तो वहां एक दूसरी सुरक्षा चुनौती सामने आती है।

रेड सी और बाब अल-मंदेब क्षेत्र में यमन के हूती विद्रोहियों की गतिविधियां पहले से ही अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी के लिए चिंता का विषय रही हैं।

जहाजों पर हमले और मिसाइल-ड्रोन हमलों का खतरा इस वैकल्पिक मार्ग को भी जोखिम से मुक्त नहीं बनाता।

रेड सी बचाएगा या नया संकट खड़ा करेगा?

यही खाड़ी देशों के सामने असली चुनौती है।

अगर होर्मुज में जोखिम है तो रेड सी और बाब अल-मंदेब में भी जोखिम मौजूद है।

अगर समुद्री रास्ता बदलकर पाइपलाइन का इस्तेमाल किया जाता है तो पाइपलाइन भी युद्ध और तोड़फोड़ के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं होती।

यानी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अब कोई एक ‘जादुई रास्ता’ मौजूद नहीं है।

इस सप्ताह रेड सी में हमला और बढ़ी चिंता

दिए गए विवरण के अनुसार, इसी सप्ताह रेड सी में एक जहाज पर हुए हमले में छह लोगों की मौत हुई।

ऐसी घटनाएं इस बात को रेखांकित करती हैं कि समुद्री व्यापार के वैकल्पिक रास्ते भी सुरक्षा चुनौतियों से मुक्त नहीं हैं।

यही कारण है कि खाड़ी देश अब केवल एक वैकल्पिक मार्ग बनाने के बजाय कई स्तरों पर सुरक्षा कवच तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।

होर्मुज को पूरी तरह छोड़ा नहीं जा सकता

ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी देश होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह छोड़ना आसान नहीं होगा।

क्रिस्टोल एनर्जी की चीफ कैरोल नखले के अनुसार, होर्मुज के फायदे इतने अधिक हैं कि उसे पूरी तरह बदला नहीं जा सकता, लेकिन अब केवल उसी पर निर्भर रहना भी संभव नहीं है।

यही शायद आने वाले समय की सबसे महत्वपूर्ण रणनीति होगी।

क्यों है होर्मुज अभी भी सबसे सुविधाजनक रास्ता?

होर्मुज केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि वह मौजूद है।

इसके पीछे दशकों से तैयार हुआ विशाल समुद्री और ऊर्जा ढांचा है।

तेल उत्पादन क्षेत्र, टर्मिनल, जहाजरानी नेटवर्क, रिफाइनरियां, भंडारण सुविधाएं और एशियाई खरीदारों तक पहुंच—इन सभी ने मिलकर इस मार्ग को वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका दी है।

किसी दूसरे मार्ग को उसी स्तर पर विकसित करने के लिए विशाल निवेश और समय की जरूरत होगी।

पाइपलाइन बनाना महंगा, लेकिन युद्ध और महंगा

नई पाइपलाइन बनाने में अरबों डॉलर खर्च हो सकते हैं।

इसके अलावा जमीन अधिग्रहण, इंजीनियरिंग, सुरक्षा, पंपिंग स्टेशन, स्टोरेज टर्मिनल और सीमा पार समझौते जैसी कई चुनौतियां होती हैं।

फिर भी खाड़ी देशों के लिए यह खर्च अब शायद जोखिम प्रबंधन का हिस्सा बन चुका है।

क्योंकि अगर युद्ध या नाकेबंदी के कारण तेल निर्यात रुकता है तो नुकसान पाइपलाइन बनाने की लागत से कहीं अधिक हो सकता है।

बीमा लागत ने भी बढ़ाया दबाव

समुद्री मार्गों पर खतरा बढ़ने के साथ जहाजों का बीमा महंगा हो सकता है।

जोखिम बढ़ता है तो शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त प्रीमियम मांगती हैं।

कई बार जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ता है, जिससे ईंधन और समय दोनों की लागत बढ़ती है।

इसका सीधा असर तेल की अंतिम कीमत पर पड़ सकता है।

लंबे रास्ते का मतलब महंगा तेल

अगर टैंकर को होर्मुज से सीधे निकलने के बजाय लंबा वैकल्पिक मार्ग लेना पड़े तो यात्रा का समय बढ़ेगा।

इसका अर्थ है अधिक ईंधन, अधिक चालक दल लागत, अधिक बीमा और अधिक जहाज क्षमता की जरूरत।

अगर बड़ी संख्या में जहाज एक साथ लंबा रास्ता अपनाते हैं तो वैश्विक शिपिंग क्षमता पर भी दबाव बढ़ सकता है।

इसका असर केवल तेल पर नहीं बल्कि अन्य समुद्री माल ढुलाई पर भी पड़ सकता है।

खाड़ी देशों की रणनीति अब ‘एक रास्ता’ नहीं, ‘कई रास्ते’ है

UAE फुजैरा के जरिए विकल्प बना रहा है।

सऊदी अरब रेड सी और यानबू का इस्तेमाल बढ़ा रहा है।

कुवैत वैकल्पिक पाइपलाइन विकल्प तलाश रहा है।

इराक अकाबा और भूमध्यसागरीय दिशा में पुराने नेटवर्क को फिर सक्रिय करने की कोशिश कर रहा है।

और एशियाई देशों में स्टोरेज बढ़ाने की रणनीति अपनाई जा रही है।

यह सब मिलकर एक नई ऊर्जा रणनीति की ओर संकेत करता है।

तेल कारोबार में आने वाला है बड़ा बदलाव

दशकों तक खाड़ी की ऊर्जा व्यवस्था का केंद्र उत्पादन और समुद्री निर्यात रहा।

अब उसके साथ एक नया सवाल जुड़ गया है—तेल किस रास्ते से सुरक्षित निकलेगा?

यह बदलाव केवल सैन्य संकट का तत्काल परिणाम नहीं हो सकता। यदि वैकल्पिक पाइपलाइन और स्टोरेज परियोजनाएं सफल रहती हैं तो भविष्य में भी खाड़ी देश अपनी सप्लाई चेन को ज्यादा विविध बनाए रख सकते हैं।

इसका मतलब होगा कि होर्मुज की अहमियत बनी रहेगी, लेकिन उस पर निर्भरता कुछ कम हो सकती है।

ईरान के लिए भी बदल सकता है रणनीतिक समीकरण

होर्मुज स्ट्रेट की भौगोलिक स्थिति ईरान को क्षेत्रीय ऊर्जा राजनीति में विशेष महत्व देती है।

यदि खाड़ी देश वैकल्पिक पाइपलाइन और निर्यात मार्ग विकसित करने में सफल होते हैं तो होर्मुज की रणनीतिक ताकत का एक हिस्सा कमजोर हो सकता है।

हालांकि, इसे पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होगा।

क्योंकि खाड़ी से निकलने वाले तेल की मात्रा और मौजूदा समुद्री बुनियादी ढांचे को देखते हुए होर्मुज लंबे समय तक वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा।

दुनिया के तेल बाजार के लिए सबसे बड़ा सवाल

आने वाले समय में बाजार की नजर इस बात पर होगी कि खाड़ी देशों की नई पाइपलाइनें कितनी जल्दी तैयार होती हैं, उनकी वास्तविक क्षमता कितनी होती है और सैन्य तनाव के बीच समुद्री परिवहन कितना सामान्य रह पाता है।

अगर होर्मुज लंबे समय तक बाधित रहता है तो वैकल्पिक मार्गों में निवेश तेजी से बढ़ सकता है।

अगर स्थिति सामान्य होती है तो भी इन परियोजनाओं को पूरी तरह बेकार नहीं माना जाएगा, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा में अतिरिक्त क्षमता हमेशा एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है।

भारत, जापान और दक्षिण कोरिया की भूमिका भी बढ़ेगी

एशिया दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता क्षेत्रों में से एक है।

भारत, जापान और दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्थाएं स्थिर ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर हैं।

इसलिए खाड़ी देशों के साथ इन देशों के ऊर्जा संबंध आने वाले वर्षों में और रणनीतिक हो सकते हैं।

तेल खरीद के साथ-साथ स्टोरेज, पाइपलाइन, टर्मिनल और आपातकालीन सप्लाई व्यवस्था भी ऊर्जा कूटनीति का हिस्सा बन सकती है।

अब तेल सिर्फ commodity नहीं, strategic asset है

तेल को लंबे समय से वैश्विक बाजार में एक commodity के रूप में देखा जाता रहा है।

लेकिन युद्ध और समुद्री संकट ने फिर साबित किया है कि तेल केवल खरीद-बिक्री का सामान नहीं है।

जिस देश के पास तेल है, उसके लिए उसे सुरक्षित बाजार तक पहुंचाना जरूरी है।

और जिस देश को तेल चाहिए, उसके लिए सुरक्षित सप्लाई सुनिश्चित करना उतना ही जरूरी है।

यही वजह है कि ऊर्जा सुरक्षा अब विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ रही है।

होर्मुज संकट का सबसे बड़ा सबक

खाड़ी देशों ने शायद सबसे बड़ा सबक यही सीखा है कि सस्ता उत्पादन पर्याप्त नहीं है।

तेल दुनिया के सबसे बड़े बाजारों तक तभी पहुंच पाएगा जब उसके लिए सुरक्षित परिवहन नेटवर्क मौजूद हो।

इसलिए अब निवेश जमीन के नीचे मौजूद तेल के साथ-साथ जमीन के ऊपर मौजूद पाइपलाइनों, बंदरगाहों, टैंकरों और स्टोरेज सुविधाओं में भी हो रहा है।

क्या भविष्य में होर्मुज की जगह रेड सी लेगा?

पूरी तरह नहीं।

रेड सी में भी सुरक्षा जोखिम हैं। बाब अल-मंदेब भी संवेदनशील है। लंबी दूरी और समुद्री जोखिम अलग चुनौती पेश करते हैं।

लेकिन भविष्य में दोनों रास्ते एक-दूसरे के विकल्प के रूप में काम कर सकते हैं।

यही ऊर्जा सुरक्षा का नया मॉडल है—एक ही रास्ते पर निर्भर रहने के बजाय कई रास्ते खुले रखना।

खाड़ी की नई तेल रणनीति का अंतिम लक्ष्य क्या है?

लक्ष्य बहुत स्पष्ट है—अगर एक समुद्री रास्ता बंद हो जाए तो तेल का कारोबार पूरी तरह बंद न हो।

UAE फुजैरा को मजबूत करके यही करना चाहता है।

सऊदी अरब अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और यानबू के जरिए यही सुरक्षा कवच बना रहा है।

कुवैत और इराक वैकल्पिक पाइपलाइन तलाश रहे हैं।

और एशियाई देश स्टोरेज बढ़ाकर सप्लाई में संभावित झटके से बचने की तैयारी कर रहे हैं।

होर्मुज संकट ने खाड़ी के तेल कारोबार की सबसे बड़ी कमजोरी सामने ला दी है—दुनिया का विशाल ऊर्जा कारोबार एक बेहद संवेदनशील समुद्री रास्ते पर कितना निर्भर है। इसी वजह से सऊदी अरब, UAE, कुवैत और इराक अब वैकल्पिक पाइपलाइनों, बंदरगाहों और भंडारण सुविधाओं पर निवेश बढ़ा रहे हैं। UAE फुजैरा के जरिए होर्मुज को बायपास करने की क्षमता बढ़ा रहा है, जबकि सऊदी अरब अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के माध्यम से रेड सी तक तेल पहुंचाने पर जोर दे रहा है। भारत, जापान और दक्षिण कोरिया में अतिरिक्त तेल भंडारण की रणनीति भी इस बदलती ऊर्जा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। हालांकि रेड सी और बाब अल-मंदेब जैसे वैकल्पिक समुद्री रास्ते भी सुरक्षा चुनौतियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। इसलिए आने वाले समय में होर्मुज की जगह कोई एक नया रास्ता लेने के बजाय खाड़ी देशों की रणनीति कई विकल्प तैयार करने की होगी। युद्ध खत्म हो या तनाव बना रहे, एक बात साफ है—अब खाड़ी के लिए तेल निकालना ही काफी नहीं, उसे सुरक्षित रास्ते से दुनिया तक पहुंचाना भी उतना ही बड़ा रणनीतिक सवाल बन चुका है।

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