छत्तीसगढ़ी भाषा को मिलेगी नई पहचान! केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा से प्रकाशित होगा पहला विस्तृत Chhattisgarhi Trilingual Dictionary, लोकजीवन के हजारों शब्द होंगे दर्ज
Editorial Desk
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यह पहल केवल एक शब्दकोश तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए छत्तीसगढ़ी के उन शब्दों को भी संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है, जिनमें प्रदेश के गांव, खेत-खलिहान, लोकपरंपराएं, खान-पान, प्रकृति, सामाजिक रिश्ते और रोजमर्रा का जीवन सांस लेता है। भाषा के साथ बदलते समय में कई पारंपरिक शब्द धीरे-धीरे बोलचाल से बाहर होते जा रहे हैं। ऐसे शब्दों को दर्ज करना आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक स्मृति को सुरक्षित रखने जैसा होगा।
आगरा से छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए तैयार हो रहा बड़ा भाषाई दस्तावेज
केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में छत्तीसगढ़ी भाषा के विस्तृत त्रिभाषी कोश का निर्माण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य छत्तीसगढ़ी की शब्द-संपदा को व्यवस्थित रूप से संकलित करके उसे एक संदर्भ ग्रंथ का रूप देना है।
इस कोश में सिर्फ सामान्य शब्दों को जगह नहीं मिलेगी, बल्कि छत्तीसगढ़ के लोकजीवन से जुड़े अनेक क्षेत्रों की शब्दावली को भी शामिल किए जाने पर जोर दिया जा रहा है। खेती-किसानी से लेकर प्रकृति तक और खान-पान से लेकर सामाजिक संबंधों तक, अलग-अलग संदर्भों में इस्तेमाल होने वाले शब्द इस काम का हिस्सा हैं।
इस तरह तैयार होने वाला कोश भाषा के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी समाज की सांस्कृतिक पहचान को समझने का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
छत्तीसगढ़ी के शब्दों में छिपी है मिट्टी और लोकजीवन की कहानी
किसी भी भाषा की असली ताकत केवल उसके साहित्य में नहीं होती। रोजमर्रा की बातचीत में इस्तेमाल होने वाले शब्द भी उस समाज के जीवन की कहानी बताते हैं।
छत्तीसगढ़ी में ऐसे अनेक शब्द हैं, जिनका संबंध स्थानीय जीवनशैली और सामाजिक व्यवहार से है। खेतों में होने वाले काम, ग्रामीण परिवेश, मौसम, पेड़-पौधे, स्थानीय खाद्य पदार्थ, पारंपरिक रिश्ते, त्योहार और रीति-रिवाज—इन सभी क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट शब्दावली है।
कई शब्द ऐसे हैं जो लिखित साहित्य से ज्यादा मौखिक परंपरा के जरिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़े हैं। बुजुर्गों की बातचीत, लोकगीतों, कहावतों, पारंपरिक आयोजनों और ग्रामीण जीवन में इनका इस्तेमाल होता रहा है।
लेकिन आधुनिक जीवनशैली और भाषाई बदलाव के साथ इन शब्दों का इस्तेमाल कम हो सकता है। ऐसे में उनका दस्तावेजीकरण भाषा और संस्कृति दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
लोकभाषा का संरक्षण यानी सिर्फ शब्दों को बचाना नहीं
लोकभाषा किसी क्षेत्र की सामाजिक स्मृति होती है। उसमें स्थानीय लोगों के अनुभव, प्रकृति से संबंध, पारंपरिक ज्ञान और जीवन पद्धति का असर दिखाई देता है।
केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. हरि शंकर ने इसी महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि लोकभाषाओं के शब्दों में किसी क्षेत्र का जीवन और उसकी सांस्कृतिक पहचान छिपी होती है।
उनके अनुसार, लोकभाषाओं की शब्द-संपदा को सुरक्षित रखना केवल भाषा संरक्षण का कार्य नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक विरासत को बचाने का प्रयास भी है।
यही दृष्टिकोण ‘हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना’ को महज शब्दों के संग्रह से आगे ले जाता है। इसका लक्ष्य अलग-अलग लोकभाषाओं में मौजूद शब्द-संपदा को व्यवस्थित ढंग से संकलित करके आने वाली पीढ़ियों और शोधकर्ताओं के लिए सुरक्षित करना है।
24 से 28 अगस्त तक आगरा में चला विशेष शब्द-संकलन कार्य
छत्तीसगढ़ी कोश को आकार देने के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में 24 से 28 अगस्त 2026 तक विशेष शब्द-संकलन कार्य आयोजित किया गया।
इस प्रक्रिया में छत्तीसगढ़ी भाषा और भाषाविज्ञान के विशेषज्ञों ने भाग लिया। विशेषज्ञों की सहभागिता का उद्देश्य छत्तीसगढ़ी के शब्दों को केवल सामान्य अर्थों में दर्ज करना नहीं, बल्कि उनके वास्तविक भाषाई और सामाजिक संदर्भों को समझना भी है।
शब्दकोश तैयार करते समय किसी शब्द का अर्थ जितना महत्वपूर्ण होता है, उसका प्रयोग भी उतना ही अहम होता है। एक ही शब्द अलग-अलग परिस्थितियों में अलग अर्थ या भाव व्यक्त कर सकता है। इसलिए संदर्भ और वाक्यगत प्रयोग को शामिल करने से कोश की उपयोगिता और बढ़ जाती है।
छत्तीसगढ़ी-हिंदी-अंग्रेजी में मिलेगा शब्दों का अर्थ
इस प्रस्तावित Chhattisgarhi Trilingual Dictionary की एक खास विशेषता इसका त्रिभाषी स्वरूप है।
अनुसंधान एवं भाषा-विकास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी ने बताया कि कोश में छत्तीसगढ़ी-हिंदी-अंग्रेजी में शब्दों के अर्थ के साथ उनके वाक्यगत प्रयोग को भी महत्व दिया जा रहा है।
इससे कोश का दायरा केवल छत्तीसगढ़ी भाषी लोगों तक सीमित नहीं रहेगा। हिंदी भाषी विद्यार्थी, देश के दूसरे हिस्सों के शोधार्थी और अंग्रेजी माध्यम से भारतीय भाषाओं का अध्ययन करने वाले लोग भी इसका उपयोग कर सकेंगे।
तीन भाषाओं में जानकारी उपलब्ध होने से छत्तीसगढ़ी शब्द-संपदा को व्यापक अकादमिक संदर्भ में समझना आसान होगा।
शब्द के साथ उसका संदर्भ भी होगा महत्वपूर्ण
किसी भाषा का शब्द केवल उसका अनुवाद नहीं होता। उसके पीछे एक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी हो सकता है।
उदाहरण के लिए खेती से जुड़े शब्द किसी विशेष स्थानीय कृषि पद्धति, उपकरण या मौसम से संबंधित हो सकते हैं। इसी तरह खान-पान से जुड़े शब्द किसी स्थानीय व्यंजन या परंपरागत तरीके की जानकारी दे सकते हैं।
सामाजिक संबंधों से जुड़े शब्द परिवार और समुदाय में रिश्तों की स्थानीय समझ को सामने ला सकते हैं। प्रकृति से संबंधित शब्द यह भी बताते हैं कि किसी क्षेत्र के लोग अपने आसपास के पर्यावरण को किस तरह देखते और पहचानते हैं।
इसीलिए कोश में वाक्यगत प्रयोग को महत्व देना इसे साधारण अनुवाद सूची की तुलना में अधिक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ बना सकता है।
खेती-किसानी से लेकर खान-पान तक शब्दों का संसार
छत्तीसगढ़ की पहचान लंबे समय से उसके ग्रामीण जीवन और कृषि आधारित सामाजिक संरचना से जुड़ी रही है। ऐसे में छत्तीसगढ़ी शब्द-संपदा में खेती-किसानी से जुड़े शब्दों का बड़ा महत्व है।
खेत की तैयारी, बीज, फसल, कृषि उपकरण, मौसम, सिंचाई, कटाई और पारंपरिक कृषि गतिविधियों से संबंधित शब्द स्थानीय जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
इसी तरह छत्तीसगढ़ी खान-पान की अपनी विशिष्ट पहचान है। स्थानीय खाद्य पदार्थों और पारंपरिक व्यंजनों से जुड़े शब्द भी क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता को सामने लाते हैं।
यदि ये शब्द व्यवस्थित रूप से दर्ज होते हैं तो भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए यह समझना आसान होगा कि भाषा और स्थानीय जीवन किस तरह एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं।
प्रकृति और पर्यावरण की स्थानीय समझ भी होगी दर्ज
छत्तीसगढ़ अपनी प्राकृतिक विविधता के लिए भी जाना जाता है। जंगल, नदियां, पहाड़, खेत, स्थानीय वनस्पतियां और जीव-जंतु वहां के जीवन का हिस्सा रहे हैं।
लोकभाषाओं में प्रकृति के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द अक्सर बेहद विशिष्ट होते हैं। स्थानीय लोग किसी पेड़, पौधे, मौसम या प्राकृतिक घटना के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं जिनका सीधा समानार्थी किसी दूसरी भाषा में आसानी से न मिले।
ऐसी शब्दावली को दर्ज करना भाषाविज्ञान के साथ-साथ लोकज्ञान के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
रीति-रिवाज और परंपराएं भी शब्दों के जरिए बचेंगी
भाषा और संस्कृति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। किसी क्षेत्र के त्योहार, विवाह परंपराएं, सामाजिक आयोजन, धार्मिक मान्यताएं और सामुदायिक व्यवहार अक्सर स्थानीय शब्दावली में प्रतिबिंबित होते हैं।
छत्तीसगढ़ी कोश में ऐसे शब्दों को शामिल किए जाने से भाषा के साथ उन परंपराओं की स्मृति भी संरक्षित हो सकती है जिनका संबंध किसी विशेष समुदाय या क्षेत्र से रहा है।
कई बार किसी शब्द का अर्थ समझने के लिए उस समाज की परंपरा को समझना जरूरी होता है। यही कारण है कि लोकशब्दकोश किसी भाषा के सांस्कृतिक दस्तावेज की भूमिका भी निभा सकता है।
छत्तीसगढ़ी के बदलते स्वरूप के बीच संरक्षण की जरूरत
समय के साथ हर भाषा बदलती है। नई पीढ़ी के साथ नए शब्द आते हैं, पुरानी शब्दावली का इस्तेमाल कम होता है और दूसरी भाषाओं के शब्द रोजमर्रा की बातचीत में शामिल होते जाते हैं।
यह भाषा के स्वाभाविक विकास का हिस्सा है। लेकिन इसके साथ एक चुनौती यह भी रहती है कि पारंपरिक लोकशब्द कहीं उपयोग से बाहर होकर सामूहिक स्मृति से गायब न हो जाएं।
छत्तीसगढ़ी के पुराने और प्रचलित शब्दों को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने का प्रयास इसी चुनौती के बीच महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
किसी शब्द का इस्तेमाल भविष्य में कम हो जाए, तब भी यदि वह प्रमाणिक रूप से दर्ज है तो शोधकर्ता उसके अर्थ, प्रयोग और सांस्कृतिक संदर्भ को समझ सकेंगे।
भाषाई विविधता भारत की बड़ी ताकत
डॉ. अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी ने कहा कि भारत की भाषाई विविधता उसकी बड़ी ताकत है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में बोली जाने वाली लोकभाषाओं में स्थानीय जीवन और परंपराओं से जुड़े हजारों शब्द मौजूद हैं। ये शब्द केवल बातचीत का माध्यम नहीं हैं, बल्कि भारत के अलग-अलग समाजों के अनुभवों को भी अभिव्यक्त करते हैं।
लोकभाषाओं की शब्द-संपदा का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण भारतीय भाषाओं की व्यापक समृद्धि को समझने में मदद कर सकता है।
छत्तीसगढ़ी कोश इसी व्यापक भाषाई दृष्टिकोण का एक हिस्सा है।
‘हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना’ का व्यापक उद्देश्य
केंद्रीय हिंदी संस्थान की ‘हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना’ के माध्यम से विभिन्न लोकभाषाओं की शब्द-संपदा को संकलित करने का प्रयास किया जा रहा है।
इस परियोजना का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि लोकभाषाओं की बहुत सी शब्द-संपदा मौखिक परंपरा में जीवित रहती है। लिखित दस्तावेज कम होने की स्थिति में किसी शब्द का अस्तित्व स्थानीय बोलचाल और स्मृति पर निर्भर हो सकता है।
व्यवस्थित शब्द-संकलन इस मौखिक विरासत को स्थायी दस्तावेज में बदल सकता है।
छत्तीसगढ़ी कोश इसी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए बनेगा उपयोगी संदर्भ-स्रोत
छत्तीसगढ़ी भाषा का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को सबसे बड़ी सुविधा यह होगी कि उन्हें शब्दों के अर्थ और उनके प्रयोग के लिए एक व्यवस्थित संदर्भ सामग्री उपलब्ध होगी।
भाषाविज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए भी यह कोश महत्वपूर्ण हो सकता है। वे छत्तीसगढ़ी की शब्द संरचना, स्थानीय शब्दावली, भाषाई संपर्क और अर्थ परिवर्तन जैसे विषयों पर अध्ययन कर सकते हैं।
हिंदी और अंग्रेजी के साथ तुलनात्मक अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं के लिए भी त्रिभाषी प्रारूप उपयोगी साबित हो सकता है।
इस तरह एक भाषा के शब्दकोश का महत्व केवल भाषा सीखने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शोध और अकादमिक अध्ययन का आधार भी बन सकता है।
लोकशब्दों के साथ सांस्कृतिक स्मृतियों को भी मिलेगा स्थायित्व
छत्तीसगढ़ी के लोकशब्दों के पीछे कई पीढ़ियों की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।
किसी पारंपरिक वस्तु का नाम, किसी स्थानीय खाद्य पदार्थ का नाम, खेती की किसी पद्धति का शब्द या किसी सामाजिक परंपरा के लिए इस्तेमाल होने वाला विशेष शब्द—इनमें से हर एक अपने भीतर एक कहानी रख सकता है।
जब ऐसे शब्द दर्ज होते हैं तो उनके साथ जुड़ी सांस्कृतिक स्मृति को भी संरक्षित करने का रास्ता खुलता है।
इसी वजह से प्रस्तावित कोश को भाषा संरक्षण के साथ सांस्कृतिक संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रो. सुधीर शर्मा होंगे कोश के संपादक
छत्तीसगढ़ी कोश के संपादन की जिम्मेदारी प्रो. सुधीर शर्मा के साथ जुड़ी है। इस कार्य में डॉ. माणिक विश्वकर्मा, विजय मिश्र और आकाश भगत ने भी सहभागिता की।
विशेषज्ञों और सहयोगियों की यह टीम शब्द-संकलन और भाषाई सामग्री को व्यवस्थित करने के काम में जुटी है।
किसी विस्तृत लोकभाषा कोश को तैयार करना केवल शब्दों की सूची बनाने का काम नहीं होता। इसमें शब्दों की प्रमाणिकता, अर्थ, स्थानीय प्रयोग, संदर्भ और भाषाई स्वरूप की सावधानीपूर्वक जांच आवश्यक होती है।
केंद्रीय हिंदी संस्थान की टीम ने भी दिया सहयोग
इस परियोजना में केंद्रीय हिंदी संस्थान की प्रो. सपना गुप्ता, डॉ. मीनाक्षी दूबे, डॉ. जोगेंद्र सिंह मीणा, डॉ. परमान सिंह, सुष्मिता बारिक और दीपेंद्र कुमार शर्मा सहित अन्य सहयोगियों ने विभिन्न स्तरों पर योगदान दिया।
विशेषज्ञों और संस्थान की टीम के संयुक्त प्रयास से शब्द-संकलन और कोश निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है।
इस तरह तैयार होने वाला दस्तावेज छत्तीसगढ़ी के मौजूदा भाषाई स्वरूप को दर्ज करने के साथ-साथ भविष्य के अध्ययन के लिए भी आधार तैयार कर सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से भी जुड़ता है प्रयास
भारतीय भाषाओं और स्थानीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में विशेष जोर दिया गया है।
लोकभाषाओं की शब्द-संपदा का दस्तावेजीकरण इस दिशा में व्यावहारिक कदम माना जा सकता है। जब किसी भाषा के शब्द व्यवस्थित रूप से दर्ज होते हैं, तो उनके अध्ययन, शिक्षण और शोध के लिए नई संभावनाएं बनती हैं।
छत्तीसगढ़ी कोश का निर्माण भी इसी व्यापक उद्देश्य से जुड़ा हुआ है।
स्थानीय भाषा और संस्कृति को शिक्षा तथा शोध के क्षेत्र में स्थान देने से विद्यार्थियों को अपने भाषाई और सांस्कृतिक परिवेश को समझने का अवसर मिल सकता है।
छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए भविष्य में खुल सकते हैं नए रास्ते
एक विस्तृत त्रिभाषी कोश के प्रकाशित होने से छत्तीसगढ़ी भाषा के अध्ययन को नई दिशा मिल सकती है।
भाषा के विद्यार्थी इसे संदर्भ सामग्री के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। शोधकर्ता छत्तीसगढ़ी की शब्द-संपदा और उसके सामाजिक संदर्भों पर नए अध्ययन कर सकते हैं। हिंदी और अंग्रेजी भाषी लोग भी छत्तीसगढ़ी शब्दों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।
इसके अलावा साहित्य, लोककला, लोकगीत और सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े लोगों के लिए भी ऐसी सामग्री उपयोगी हो सकती है।
डिजिटल युग में जब भाषाओं के बीच संपर्क तेजी से बढ़ रहा है, किसी क्षेत्रीय भाषा की प्रमाणिक शब्द-संपदा का दस्तावेज उपलब्ध होना उसकी पहचान को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
लोकभाषा से जुड़े शब्दों को किताब में जगह मिलना क्यों खास है?
आज मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल संचार के कारण भाषा के इस्तेमाल का तरीका तेजी से बदल रहा है। नई पीढ़ी कई बार स्थानीय शब्दों की जगह हिंदी या अंग्रेजी के अधिक प्रचलित शब्द इस्तेमाल करने लगती है।
इस बदलाव को रोकना जरूरी नहीं है, क्योंकि भाषा स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। लेकिन पुराने शब्दों और उनके सांस्कृतिक संदर्भों को सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
एक बार कोई शब्द रोजमर्रा की बातचीत से बाहर हो जाए तो आने वाली पीढ़ियों के लिए उसका अर्थ समझना मुश्किल हो सकता है।
ऐसे में शब्दकोश उस भाषा की सामूहिक स्मृति का दस्तावेज बन जाता है।
छत्तीसगढ़ी के लिए यह सिर्फ शब्दकोश नहीं, पहचान का दस्तावेज भी
छत्तीसगढ़ी की शब्द-संपदा में वहां के लोकजीवन की अलग पहचान दिखाई देती है। गांवों की बातचीत से लेकर खेतों तक, लोकगीतों से लेकर पारंपरिक आयोजनों तक और प्रकृति से लेकर सामाजिक रिश्तों तक भाषा हर जगह मौजूद है।
इसलिए छत्तीसगढ़ी का विस्तृत कोश तैयार होना केवल अकादमिक गतिविधि नहीं है। यह उस लोकजीवन को दर्ज करने का प्रयास भी है जिसने पीढ़ियों तक भाषा को जीवित रखा।
शब्द किताब में दर्ज होंगे तो उनके साथ उन शब्दों से जुड़ी सामाजिक स्मृतियों के संरक्षण की संभावना भी बढ़ेगी।
आगरा से निकलेगा छत्तीसगढ़ी शब्द-संसार का बड़ा संदर्भ ग्रंथ
केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा तैयार किया जा रहा यह त्रिभाषी कोश छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री के रूप में सामने आ सकता है। इसमें आम बोलचाल की शब्दावली के साथ खेती-किसानी, प्रकृति, खान-पान, सामाजिक संबंधों, रीति-रिवाजों और परंपराओं से जुड़े शब्दों को जगह देने का प्रयास किया जा रहा है।
24 से 28 अगस्त 2026 तक आयोजित विशेष शब्द-संकलन कार्य ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। प्रो. हरि शंकर, डॉ. अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी, प्रो. सुधीर शर्मा सहित विशेषज्ञों और संस्थान की टीम की सहभागिता से कोश निर्माण का काम आगे बढ़ रहा है।
आने वाले समय में जब यह कोश प्रकाशित होगा, तब यह केवल छत्तीसगढ़ी शब्दों के अर्थ जानने का माध्यम नहीं होगा। यह शोधकर्ताओं को भाषा के विकास को समझने में मदद करेगा, विद्यार्थियों को संदर्भ सामग्री देगा और लोकभाषा के उन शब्दों को स्थायी रिकॉर्ड प्रदान करेगा जो लंबे समय से लोगों की जुबान पर जीवित हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छत्तीसगढ़ी के शब्दों के साथ उस मिट्टी की आवाज भी दर्ज होगी, जहां से ये शब्द निकले हैं।

