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मशहूर शायर हकीम सैय्यद राशिद अली की मौत से जनपद में शोक की लहर

बुढ़ाना। कस्बे के मशहूर शायर हकीम सैय्यद राशिद अली शादां बुढ़ानवी सब्जवारी का बीती शुक्रवार की देर रात हार्ट अटेक के चलते निधन हो गया। उनकी उम्र ७० साल की थी।

आज शनिवार की सुबह मात्र १० आदमियों की मौजूदगी में उनको सुपुर्द ए खाक कर दिया गया। उनके निधन से उनके करीबी लोग हैरत में हैं। मिली जानकारी के अनुसार समीपवर्ती जनपद शामली के कस्बा कैराना में जन्में शायर राशिद अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी से फारिग थे। उन्होंने यहां के शायर तमन्ना जमाली की शागिर्दी में शायरी की शुरूआत की।

उनको सन १९७० से शायरी करने का चस्का लगा। उनका एक शायरी है कि कितना तल्ख है हयात का माहौल और जिंदगी खुशगवार कैसे हो, बैठे बैठे तो कुछ नहीं होता हाथ हिलाओ तो कुछ मयस्सर हो। उनकी एक हास्य कविता है जिसमें उन्होंने कहा है कि एक डाक्टरनी के लिए एक मनचला, नाहगान्नी एक मुसीबत बन गया

जब क्लीनिक पर जाकर अपने बैठती, घूर के नजरों से उसको देखती, तंग आकर उसने डॉक्टर से कहा, रोज तकता है ये मुझे कलमुंहा, डॉक्टर ने सुना जब ये वाक्या, वाक्यातन वो हवन्नक हो गया, जब मिली मनचले की डॉक्टर से नजर, तो उसने जाके फोड़ डाला उसका सर, पिट चुका जब मनचला तो कहा, खता मेरी क्या है मुझको बता दिजियेगा जरा, में अमल उस बोर्ड पर करता हूं यार, देखने का वक्त सुबह नौ से चार। उनकी शायरी में दम था तो उनके करीबी भी उनकी शायरी मुशायरों और कवि सम्मेलनों में पढ़ लिया करते थे।

उनके चार बच्चे जिनमें तीन लड़कियां और एक लड़का सभी की शादी से फ्री हो चुके थे। ग़रीबी के चलते अपना आशियाना बुढ़ाना की कांशीराम आवास कालोनी को बना रखा था। एक पुराने से स्कूटर पर उनका घूमना आज भी लोगों को याद आ रहा है। बुढ़ाना की तंग गलियों में उनका फर्राटा भरता स्कूटर वैसे काफी दिनों से दिखाई नहीं दे रहा था।

इसकी वजह साफ थी कि वे बीमारी के चलते रेस्ट पर थे। उनकी एक और शायरी जो दिल को छूती है जिसमें उन्होंने कहा है कि अलटा पलटी चित पट बाजी, नेताओं में धम्मक धूं, अब तो हवन्नक भी सोचे है कैसे ये सरकार चले। उनकी एक बात याद करते हुए शायर इजहार आलम बुढ़ानवी बताते हैं कि उन्होंने कभी सरकारी अवार्ड नहीं लिया। उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी भाषाऐं उनको फर्राटेदार बोलनी और लिखनी आती थी।

वे एक खुशमिजाज और अच्छे अखलाक के इंसान थे। उनकी पत्नि बानो यहीं की बेटी हैं। वे खुद्दार इंसान थे। कभी किसी से उधार नहीं लिया। उनकी एक और शायरी जिसमें उन्होंने कहा कि बड़ी हैरतों की ये बात है, कि वो अभी तलक भी हयात है, वो जो खा गया था कल मेरी गोलियां, तेरी शान जल्ले जलालहु।

उनकी एक और शायरी जो आज कि भ्रष्ट राजनीति को बेनकाब करती दिखती है जिसमें वे कहते हैं कि बंदरों को तो जबरदस्ती निकाला था मगर, घुसके अब लंगूर ले रहे हैं खर मस्तियां।

कुल मिलाकर उनकी शायरी का कोई तोड़ नहीं था। उनके निधन पर उनके करीबी डॉक्टर जावेद उस्मानी, तोसीफ राही, अयाजुद्दीन सिद्दीकी, साहिल जमाली, हाजी यासीन, इर्तजा नेताजी, फसीह अख्तर व अतहर उस्मानी आदि लोग गमजदा हैं।

 

News Desk

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