श्रीमाथुर चतुर्वेद परिषद के फैसले से असहमत संरक्षक ने दिया त्यागपत्र
श्रीमाथुर चतुर्वेद परिषद के संरक्षक गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। चतुर्वेदी ने श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से जन्मभूमि के मालिकाना हक को लेकर जिला जज की अदालत में चल रहे वाद में पक्षकार बनने के लिए श्रीमाथुर चतुर्वेद परिषद द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र पर असहमति जताई है।
श्रीमाथुर चतुर्वेद परिषद और अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा ने बुधवार को जिला जज की अदालत में प्रार्थना पत्र देकर श्रीकृष्ण विराजमान के वाद में पक्षकार बनने की अपील की थी।
दाखिल किए गए प्रार्थना पत्र में 1991 में लागू हुए वर्शिप एक्ट का भी हवाला दिया था। कहा था कि ये एक्ट 15 अगस्त 1947 से लागू माना गया है। जबकि शाही मस्जिद ईदगाह पिछले तीन सौ साल से कायम चली आ रही है।
ऐसे में ये वाद प्लेस आफ वर्शिप एक्ट से बाधित है और दायर ही नहीं किया जा सकता है। ये वाद इन्हीं आधारों पर भी इसी स्तर पर निरस्त होने योग्य है। इस प्रार्थना पत्र पर असहमति जताते हुए श्री माथुर चतुर्वेद परिषद के संरक्षक गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
श्रीकृष्ण विराजमान के वाद में श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संस्थान प्रतिवादी है और गोपेश्वर नाथ संस्थान के सदस्य हैं। गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी का कहना है कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान ईदगाह वाली जमीन का एकमात्र मालिक है।
सभी सरकारी अभिलेखों में मालिक का नाम श्रीकृष्ण जन्मस्थान का ही दर्ज है । ईदगाह अवैध कब्जा है सामाजिक संगठनों को इस तरह के विवाद में नहीं पड़ना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि मंदिर तो कहीं भी बन सकता है लेकिन जन्मस्थान तो एक होता है एक ही रहेगा। मंदिर के मलबे से ईदगाह बनाई गई थी।
हिन्दूवादी नेता गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने कहा है कि 1968 में हुए कथित समझौते की जो लोग बात करते हैं उसको इलाहाबाद हाई कोर्ट तथा जनपद न्यायाधीश द्वारा नकार दिया गया था ।

